कोलेस्ट्रोल क्या है ? इसके फायदे नुकसान के बारे में क्या जानते हैं आप ?

कोलेस्ट्रोल यह एक यूनानी शब्द है जो कोले और स्टीरियो (ठोस) से बना है और ओल प्रत्यय लगाकर कोलेस्ट्रॉल बना …

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जीव विज्ञान की शाखाएँ व इनके जनक Father of Branches of Biology

जीव विज्ञान की अनेक शाखाएँ हैं। इन विभिन्न शाखाओं के जनक भी भिन्न-भिन्न हैं। इस लेख में हम आपको जीव विज्ञान की कुछ शाखाओं व उनके जनक के बारे में बता रहे हैं। 

शाखाएँ        जनक

जीव विज्ञान- अरस्तु

सूक्ष्म जीव विज्ञान- लुइस् पाश्चर

आयुर्वेद- चरक

भारतीय ब्रायोलॉजी- एस.आर.कश्यप

भारतीय पारिस्थितिकी- आर. मिश्रा

भारतीय कवक विज्ञान- जे.बटलर

भारतीय शैवाल विज्ञान- एम.ओ.ए.अय्यंगर

आनुवांशिकी- ग्रेगर जॉन मेंडल

आधुनिक आनुवांशिकी- टी. एच. मॉर्गन

विकिरण आनुवांशिकी- एच. जे. मुलर

वनस्पति विज्ञान- थियोफ्रेस्टस

आधुनिक वनस्पति विज्ञान- लीनियस

वर्गिकी- लीनियस

शरीर रचना विज्ञान (शारीरिकी)- हेरोफिलस

आधुनिक शारीरिकी- एंड्रियास विसैलियस

रक्त परिसंचरण- विलियम हार्वे

उत्परिवर्तनवाद- ह्युगो डी. ब्रिज

प्रतिरक्षा विज्ञान- एडवर्ड ज़ेनर

कोशिका विज्ञान- रॉबर्ट हुक

सूक्ष्म जीव विज्ञान- ल्यूवेन हॉक

जीवाणु विज्ञान- रॉबर्ट कोच

पादप शारीरिकी- एन. ग्रेयु

कवक विज्ञान- माइकेले

सुजननिकी- फ्रांसिस गॅल्टन

चिकित्सा शास्त्र- हिप्पोक्रेट्स

औतिकी- मार्सेलो मैलपिगी

भ्रूण विज्ञान- फ्रेडरिक वोल्फ

आधुनिक भ्रूण विज्ञान- कार्ल इ.वॉन बेयर

जीवाश्म विज्ञान- लियोनार्डो दी विन्ची

आधुनिक जीवाश्म विज्ञान- कुवियर्

बैक्टीरियोफेज- टवार्टव दी हेरिल

एंडोक्राइनोलॉजी- थॉमस एडिसन

पादप क्रिया विज्ञान- स्टीफन हेल्स

पादप रोग विज्ञान- जे.बटलर

एंटीसेप्टिक(रोगाणुरोधक) सर्जरी- जे.लिस्टर

प्रतिजैविकी- एलेक्जेंडर फ्लेमिंग

ब्रायोलॉजी- जॉन हेडविग

कीमोथेरेपी- पॉल एर्लिक जॉर्ज

डी.एन. ए. फिंगर प्रिंटिंग- एलेक् जेफ्री

ईलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी- ऐंथोवन कैस्पर

महामारी विज्ञान- जॉन स्नो कोनरेड

आधुनिक विकृति विज्ञान- रुडोल्फ विरकॉ

तनाव शरीर क्रिया विज्ञान- हेन्स स्ल्ये

स्टेम सेल के बारे में रोचक तथ्य Interesting Facts about Stem Cell

स्टेम सेल सम्बन्धी कुछ रोचक तथ्य इस प्रकार हैं-

स्टेम सेल (कोशिका) को प्रायः भ्रूण से प्राप्त किया जाता है।

स्टेम सेल मुख्य रूप से दो प्रकार के हैं- प्ल्यूरिपोटेंट स्टेम सेल व मल्टीपोटेंट स्टेम सेल।

प्ल्यूरिपोटेंट स्टेम सेल सभी कोशिकाओं के रूप में विकसित होने की क्षमता रखती है, जबकि मल्टीपोटेंट स्टेम सेल कुछ कोशिकाओं के रूप में ही विकसित हो सकती हैं।

स्टेम सेल को ब्लैंक सेल भी कहा जाता है।

स्टेम सेल में शरीर में पायी जाने वाली कोशिकाओं के समान विकास करने की क्षमता पायी जाती है।

शरीर के किसी भी भाग में यदि किसी कोशिका में कोई कमी या खराबी आ जाती है तो स्टेम सेल पूर्णतया उस कमी व खराबी को दूर कर क्षतिपूर्ति करती है।

स्टेम सेल को 300 तरह की कोशिकाओं में परिवर्तित किया जा सकता है।

स्टेम सेल में विभाजन की प्रवृति पायी जाती है।

स्टेम सेल तकनीक की खोज 1998 में अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा की गयी थी।

स्टेम सेल तकनीक की सहायता से शरीर में अनुपयोगी व खराब हो चुकी कोशिकाओं को नष्ट करके नव कोशिकाओं का निर्माण किया जा सकता है। इस तकनीक को “एम्ब्रॉयनिक स्टेम सेल तकनीक” के नाम से जाना जाता है।

इस तकनीक में स्टेम सेल का प्रवेश शरीर में इंजेक्शन के माध्यम से करवाया जाता है।

डायबिटीज, लीवर, किडनी, दिल के रोग, एड्स, ट्यूमर, रीढ़ की हड्डी सम्बन्धी परेशानी तथा आनुवांशिक रोगों जैसी अनेक घातक बीमारियों से बचाव करने व इनसे होने वाले  प्रभाव में कमी लाने में स्टेम सेल काफी हद तक सहायक होती है।

वर्तमान समय में अपनी स्टेम सेल को सुरक्षित रखने के लिए “स्टेम सेल बैंकिंग” की सुविधा भी उपलब्ध करवाई जा रही है।

स्टेम सेल बैंकिंग में इस सेल को सुरक्षित तरीके से जीवित रखने के लिए -196℃ तापमान पर संग्रहित किया जाता है।

भ्रूण से प्राप्त की जाने वाली स्टेम सेल में 75 से भी अधिक प्रकार के रोगों से बचाव करने की क्षमता पायी जाती है और इसमें 5000 के करीब प्रोटीन पाये जाने की पुष्टि हुई है।

विज्ञान की माने तो स्टेम सेल से दिल का वॉल्व, कृत्रिम शुक्राणु व धमनियाँ भी बनाई गयी हैं।

“होप- इन विट्रो” नामक उपन्यास भी स्टेम सेल पर आधारित है।

गर्भावस्था के दौरान यदि स्त्री के जननांग में कोई घाव या जख्म हो जाता है तो गर्भस्थ शिशु की सहायता से स्टेम सेल द्वारा उसका स्वतः ही प्राकृतिक रूप से उपचार हो जाता है।

वर्तमान समय में स्टेम सेल सम्बन्धी विषय पर भविष्य में रोजगार के भी कई विकल्प उपलब्ध हैं|

About cat in Hindi – बिल्ली के बारे में जानकारी

वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत (Kingdom) : (Animalia ) जंतु
संघ (Phylum) : (Chordata) कौरडेटा
वर्ग (Class) : (Mammalia) स्तनधारी
गण (Order) : (Carnivora) मांसाहारी
कुल (Family) : (Felidae) फ़ेलिडाए
वंश (Genus) : (Felis) फ़ीलिस
जाति : फ़ीलिस कैटस

बिल्ली – एक ऐसी चार पैरो वाली जानवर जिसे हम अक्सर देखते है, ये बिल्लियाँ बंदरो से कम नही हैं कही भी चढ़ जाती हैं दूध पिने के लिए या फिर चूहे मारने के लिए।

कुछ लोग बिल्लियों को पालते भी हैं वहीं कुछ लोग इसे असुभ जानवर मानते है। चलिए आइये इस पोस्ट में हम बिल्लियों के बारे में अधिक जानकारी इक्कठा कर के ये पता लगाये की क्या बिल्लियाँ सचमुच में असुभ हैं या फिर एक शानदार जानवर है।

बिल्ली का वैज्ञानिक नाम Felis catus ( फ़ीलिस कैटस ) है। ये हजारो सालो से इंसानों के साथ रहती आयीं हैं। आज से 4000 साल पहले पहली बार इनको Egypt में पालतू बनाया गया था

ऐसा माना जाता है की इनकी चूहों को मारने की काबिलियत से इन्सान इन्हें पालतू बनाने लगे

Egypt में तो बिल्लियों को पूजा भी जाता था और उनका mummy भी तैयार किया जाता था साथ में चूहे का भी mummy तैयार करके रखा जाता था।

बिल्ली एक स्तनधारी और मांसाहारी जानवर है जिसकी सुनने और सूंघने की छमता अतुलनीय है

बिल्लियों के बारे में कुछ रोचक तथ्य

बिल्ली रात में भी देख सकती है।

बिल्लियों की औसतन आयु 15 साल है।

बिल्लियों का शरीर बहुत ही लचीला होता है और इनका दांत छोटे जानवरों का शिकार करने के लिए बना है जैसे की चूहा।

इनकी सूंघने और सुनने की छमता काफी अचूक है। इनकी स्वाद चखने की छमता हम इंसानों से काफी कम होती है , ये मीठा स्वाद का पता नही लगा सकती क्यों की इनके पास मीठे स्वाद का taste bud है ही नही।

अपनी जिन्दगी के 70 % समय बिल्ली सोने में बिता देती है, ऐसा माना जाता है की सोकर बिल्लियाँ एनर्जी को संचित करती हैं ।

Egypt में बिल्ली को मरना अवैध था क्यों की बिल्लियाँ चूहों पर नियंत्रण रखती थी

एक बिल्ली अपने height से 6 गुना ज्यादा दुरी तक उछल सकती है और रेस में उसेन बोल्ट जैसे धावक को हरा भी सकती है

एक बिल्ली एक बार में लगभग 2 से 5 बच्चे को जन्म दे सकती है

एक पालतू बिल्ली, जंगली बिल्ली के हिसाब से आकर के छोटी होती है तथा उसका वजन लगभग 4 से 5 किलो तक हो सकता है

बिल्ली के दांत बहुत ही तेज होते हैं और इस वजह से वह अपने शिकार के गले में दांत डालकर उसके स्पाइनल कॉर्ड को क्षति पंहुचा देती है जिससे की शिकार अपाहिज होकर तुरंत मर जाता है

एक बिल्ली ऐसे चलती है ताकि उसके पैर से आवाज़ न आये

बिल्ली दिन की अपेक्षा रात में ज्यादा सक्रीय होती है

Male Cat, Female Cat को पाने के लिए अक्सर लड़ाई करते है और इसमें जीत उन्ही की होती है भरी भरकम और मजबूत होता है

मछली पानी में कैसे सांस लेती है

हम सभी फेफड़े के द्वारा हवा में साँस लेते है, फेफड़ा ऑक्सीजन को खून में मिला देता है और खून फिर पुरे शरीर में ह्रदय के द्वारा पंहुचा दिया जाता है लेकिन क्या कभी आपने सोचा है की मछलियाँ ये सब पानी के अन्दर रहकर कैसे करती है ?

जिस तरह हमारे पास फेफड़ा होता है उसी तरह मछली के पास गिल होता है जिससे वह पानी में से घुला हुआ ऑक्सीजन निकालती है

गिल पानी से निकला ऑक्सीजन खून में मिला देता है और फिर यह पुरे शरीर को पहुचाया जाता है

हम मछली का गिल उसके सिर के पीछे देख सकते है , यह दिखने में झिल्लीदार स्पंज जैसा होता है

जैसा की हम जानते है की पानी ऑक्सीजन और हाइड्रोजन से बना है लेकिन मछली पानी को तोड़कर ऑक्सीजन नही ले सकती क्यों की ऐसा करने के लिए बहुत एनर्जी की आवस्यकता पड़ेगी, इसके बजाये मछली पानी में घुला हुआ ऑक्सीजन लेती है

क्या सभी मछलियों के पास गिल होता है ?

हाँ और नही, क्यों की हम मानते है की ब्लू व्हेल मछली है, डॉलफिन मछली है लेकिन ये दोनों मछली नही बल्कि मैमल्स में आते हैं और दोनों ही बच्चे को जन्म देते है न की अंडे

व्हेल और डॉलफिन के पास गिल नही होता उन्हें साँस लेने के लिए पानी के ऊपर आना पड़ता है

हालाँकि सभी मछलियों में गिल पाया जाता है, (व्हेल और डॉलफिन को छोड़कर क्यूँ की ये मछली नही हैं ) लेकिन सभी मछलियाँ अपने गिल का उपयोग नही करती जैसा की Lungfish  (लंग फिश ) जो मीठे पानी में रहती है उसके पास लंग्स भी होता है, ये मछली लंग्स से साँस लेती है

अक्सर रुका हुआ पानी में घुले हुए ऑक्सीजन की मात्रा इतनी कम हो जाती है की एक मछली उसमे गिल से साँस नही ले सकती इसलिए वह अपने लंग्स का इस्तेमाल करती है और पानी के ऊपर आकर साँस लेती है

सभी मछलियों में गिल्स होता है लेकिन सभी मछलियों में लंग्स नही होता

भारतीय विशाल गिलहरी

इस गिलहरी को मालाबार विशालकाय गिलहरी भी कहा जाता है। यह भारत में पेड़ की गिलहरी की सबसे बड़ी प्रजाति है।

स्रोत: विकिपीडिया

इस गिलहरी का आकार 25.4-45.7 सेमी तक होता है और इनका वजन होता है 
1.5-2 किग्रा

वे भारत के विभिन्न राज्यों जैसे गुजरात, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं।

वे पेड़ों पर रहते हैं और सर्वाहारी हैं। वे स्वभाव से शर्मीले हैं जिससे उन्हें जंगल में ढूँढना मुस्किल हो जाता है

उनका संभोग अक्टूबर से जनवरी के महीने में शुरू होता है। 
इनका गर्भकाल अवधि 21-25 दिनों की होती है

जीवन अवधि जंगल में कम हो सकती है लेकिन इनकी अधिकतम जीवन अवधि (कैप्टिव – बंदी ) 20 वर्ष पाई गई।

स्रोत: animalpot.net

वे क्या खाते है?

चूंकि वे सर्वाहारी हैं। वे फल, नट, फूल, कीड़े, पक्षियों के अंडे का भोजन करते हैं।

वे पेड़ों में अपना आश्रय बनाते हैं और कभी-कभी एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर चले जाते हैं।

वे दो पैरों पर खड़े होकर और 2 हाथों का उपयोग करके खाते हैं। और अपने शरीर को संतुलित करने के लिए पूंछ का उपयोग भी करते हैं

वे अपने द्वारा खाए जाने वाले बीजों को फैलाते हैं, जो वनीकरण में मदद करता है।

ये एकान्त जानवर हैं जो ज्यादातर प्रजनन के समय एक साथ आते हैं।

स्रोत: सौम्यदीप चटर्जी 

आनुवंशिकता का सिद्धांत Genetics in Hindi

मेंडल के वंसागति के नियम को अनुवांशिकता का नियम कहते है। अनुवांशिकता के सिद्धांत के अनुसार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के लक्षणों का स्तनांतरण होता है। मेंडल ने ये प्रयोग मटर के पौधे पे किया था। उन्होंने सात जोड़ी ऐसे लक्षणों को ले के प्रयोग किया। और नयी पीढ़िया प्राप्त की या फिर आप कह सकते है की नयी पीढ़ियों की खोज की। मेंडेल को हम अनुवांशिकता का जनक भी कहते है। इन्होने 1856 से 1865 तक अनुवांशिकता पर प्रयोग किये। इसे हम मेंडल  के नियम से भी जानते है। अगर हम आसान भाषा में बात करे तो यह विज्ञानं की एक शाखा है जिससे अनुवांशिक कारको और लक्षणों का अध्यन किया जाता है। अनुवांशिक को हम जीव विज्ञानं की शाखा के रूप में भी जानते है। मेंडल का पूरा नाम ग्रेगर जॉन मेंडेल था। हमारे दुनिया में जितने भी जीव है वो सब अपने पूर्वजो के प्रतिरूप होते है। माता पिता के गुणों का अपने बच्चो में आना आनुवांशिकता का रूप है । तो चलिए जान लेते है मेंडल के नियमो के बारे में।

पहला नियम (प्रभाविकता का नियम):-

प्रथम नियम के अनुसार मेंडल ने बताया की किसी जीव की अनुवंशकिता उसके परिजनों यानि माता पिता की जनन द्वारा होती है। इसका प्रयोग इन्होने मटर के पौधे पर किया था। यदि कोई दो कारक हो ओर अगर वो दोनों सामान न हो तो इनमे से एक कारक दूसरे कारक पर आसानी से प्रभावी हो जायेगा। इसे प्रभाविकता का नियम भी कहते है। इसमें अगर एक गुण प्रकट होता है तो उसके दूसरे गुण दिखाई नहीं देते। चलिए इसे एक उद्धरण के तौर पर समझ लेते है। जब हम एक लम्बे पौधे और एक बौने पौधे का संलंग्न करवाते है तो पहली पीढ़ी के पौधे समानुगी लंबे पाए गए और इसे प्रभावी माना गया जबकि बौने पौधे को अप्रभावी पाया गया।

दूसरा नियम (विसंयोजन का नियम):-

जोड़ा बनने के बाद हम इसे युगम भी कह सकते हैं। एलिल के सदस्य अलग हो जाते हैं। इसे हम सुधता का नियम भी कहते हैं। इसमें जोड़े अलग होकर दूसरे युमों में चले जाते हैं।

चलिए, इसे भी उदहारण से समझ लेते हैं। पहली पीढ़ी में लम्बे पौधे में जब स्वनिषेचन कराया जाता है, दूसरी पीढ़ी के युग्म में संकरण हो जाता है। अलग पौधे वाले लक्षण प्राप्त होते हैं।

तीसरा नियम (स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम):-

इस नियम को दयिसंकर का प्रयोग भी कहा जाता है। इस नियम के अनुसार दो जोड़ी विप्रयासी पौधों का मध्य संकरण करवाया जाता है। इसमें गोलाकार और पीले मटर के बीज तथा झुर्रीदार बीज वाले मटर के बीच संकरण करवाया जाता है। इसमें सभी पौधे पीले और गोल आकार के मिलते हैं।

अनुवांशिक का प्रयोग पालतू पसुओं, कृषि, पौधों आदि के रूप में किया जाता है। इस नियम में पौधे संकरण किए जाते हैं। मंडल ने जब इसका प्रयोग मटर के बीज में किया तो पाया की इसमें नयी पीढ़ी है। जिस प्रकार माता पिता के गुण उनके बच्चो में आते हैं, उसी प्रकार उन्होंने पाया की मटर का संकरण होता है। अनेक वैज्ञानिकों ने बताया की अनुवांशिक अध्ययन जटिल नहीं है। इसका मुख्य कारण यह पाया गया की एक शिशु को पैदा होने में नौं महीने लग जाते हैं और उसका विकास करने में कम से कम बीस साल लग जाते हैं। पीढयों के अध्ययन के लिए कम से कम सौ साल से दो सौ साल लग जाते हैं। इंसानो के जीवरासायनिक का अध्यन पहली बार लंदन में किया गया था। अगर हम बिलकुल आसान भाषा में कहना चाहें तो हम कह सकते हैं की अनुवांशिक वह विज्ञान है जिसमें अनुवांशिक के जीवों तथा उनकी उत्पति को विकसित होने की सम्भावनाओं का अध्यन किया जाता है।

वनस्पति व कवक में अंतर

वनस्पति:

जमीन पर प्राकृतिक रूप से किसी जगह पर पैदा हुए पेड़ व पौधे तथा वे पेड़-पौधे जिनकी पैदावार के लिए मानव प्रयत्न की आवश्यकता पड़ती है, इन सबको ही वनस्पति कहा जाता है।

साधारण शब्दों में, सभी पेड़, पौधे, खेतों में उगने वाले या उगाये जाने वाले फूल, पादप आदि वनस्पति में सम्मिलित है। जहाँ ये सब पाये जाते हैं; ऐसे क्षेत्र विशेष को वनस्पतिलोक या वनस्पतिजगत भी कहा जाता है।

वनस्पति को कुछ हिस्सों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जैसे- 

प्राकृतिक वनस्पति- इसमें वे सभी वनस्पतियाँ सम्मिलित की जाती है, जो किसी स्थान पर अपने आप उग आती है। इसमें मनुष्य द्वारा कोई प्रयास नही किये जाते, न बीज डाला जाता है, न देखरेख की जाती है। इसके बावजूद भी प्रकृति की गोद में ये स्वतः पैदा होती है। इसी कारण इसे प्राकृतिक वनस्पति कहा जाता है। घास वनस्पति इसका उदाहरण है। घास वनस्पतियाँ प्रचुरता में पायी जाती हैं।

मानव जनित वनस्पति- इसमें वे सभी पैदावार शामिल की जाती है, जिनको उगाने के लिए मनुष्य द्वारा मेहनत की जाती है, प्रयास किये जाते हैं (जैसे-बीज बोना, पानी देना, हल चलाना, कटाई करना आदि) तथा देखरेख की जाती है। इसे मानव जनित वनस्पति कहते हैं। जैसे- कृषि व उद्यान वनस्पति। 

स्थानीय वनस्पति- इसे देशी वनस्पति भी कहा जा सकता है। यह केवल स्थान विशेष पर उगने वाली वनस्पति होती है। यह प्राकृतिक भी हो सकती है और मानव-जनित भी, क्योंकि किसी स्थान विशेष या किसी देश की जलवायु व मिट्टी मे पाये जाने वाले गुणों के कारण ही पैदा होती है।

प्रत्येक जगह (देश व राज्य) में पायी जाने वाली प्राकृतिक भिन्नता व मृदा की उर्वरकता के गुणों की भिन्नता के कारण वनस्पति में भी भिन्नता पायी जाती है।

कवक

कवक को फंफूद भी कहा जाता है। इनमें हरितलवक का अभाव पाया जाता है। इनमें ऊत्तक भी नही पाये जाते हैं। इनमें जनन क्रिया बीजाणुओं के माध्यम से सम्पन्न होती है। ये मृत जीवों व अवशिष्ट कार्बनिक पदार्थों व कचरे आदि को विनष्ट करने में अत्यधिक सहयोगी होते हैं, क्योंकि ये अपमार्जन का कार्य करते हैं।

इनमे सामान्य पादपों की भाँति तना, पत्तियाँ व जड़ आदि नही पायी जाती तथा पर्णहरित न होने के कारण इनमे अपना भोजन स्वयं निर्मित करने की क्षमता नही पायी जाती। ये भिन्न-भिन्न स्त्रोतों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं, जिस कारण इन्हें विविधपोषी भी कहा जाता है।

कवक तीन प्रकार के होते हैं- 

सहजीवी- ये कवक अपने पास की वनस्पति के साथ-साथ पैदा होकर बड़े होते हैं व उन्हीं से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं तथा इनका जीवन उसी पर निर्भर करता है। 

परजीवी- ऐसे कवक दूसरे जीव-जन्तुओं व पादपों से अपने भोजन की पूर्ति करते है तथा इनका जीवन दूसरे जीव-जन्तुओं व पादपों की जीवित अवस्था पर निर्भर करता है।

मृतोपजीवी- ऐसे कवक मरे हुए जीव-जन्तुओं एवम् मृत पौधों व सड़े हुए पदार्थों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं|

ऑक्टोपस के बारे में हम क्या जानते हैं

octopus image

ऑक्टोपस का अर्थ होता है आठ पैर। ऑक्टोपस को डेविलफिश भी कहते हैं। ऑक्टोपस एक समुन्द्र में पाए जाने वाला प्राणी है। पृथ्वी पर लगभग 200 से अधिक ऑक्टोपस की प्रजातियां पायी जाती है। ये हमे महासागरों में मिलते है और वही पाए जाते है।

ऑक्टोपस में हड्डिया नहीं होती है। ये बिना हड्डियों वाले प्राणी होते है। ये ठन्डे पानी में रहते है। एक ऑक्टोपस के पास छह हाथ और दो पैर होते है। जो उसे दूसरे प्राणियों से भिन्न बनाते है।

समंदर में पाए जाने वाला सबसे जेह्रीला प्राणी है। आपको यह जानकर हैरानी होगी की ऑक्टोपस का खून नीला होता है। आपको यह जानकार भी हैरानी होगी की इसकी त्वचा एक घंटे में 177 बार रंग बदल सकती है जोकि इसे बहुत ही रोचक जीव बनता है।

ऑक्टोपस के पास तीन दिल होते है जो इसे और ज्यादा खास बनाते है.जन्म के समय इसका आकार मात्र पिस्सू जितना होता है।

ऑक्टोपस इतने जेहरीले होते है की मात्र एक बार काटने पर किसी आम आदमी की उसी समय मृतयु हो सकती है।

इस बात से आप अंदाजा लगा सकते है किये कितना खतरनाक प्राणी है। एक विशालकाय ऑक्टोपस 16 फूट लम्बे और करीब 50 किलोग्राम के होते है.

आपको शायद ये ना पता हो की ऑक्टोपस को सबसे बुद्धिमान जीव माना जाता है। ये बाकि जीवो के लिए बहुत बड़ा खतरा माना जाता है।

ये किसी भी समस्या को आसानी से सुलझाने के लिए जाने जाते है और यह कोई भी काम बड़ी ही आसानी से सिख लेते है।

ये बाकि के प्राणियों से भिन्न और बहुत ही खतरनाक जीव होते है। इसकी सबसे रोचक बात यह है की इसकी भुजा अगर कट भी जाती है तो वह कुछ ही समय बाद वापस आ जाती है।

ये एक से पांच साल तक जीवित रह सकते है.

ऊँट के कूबड़ में कितना पानी होता है

ऊंट कार्टून

जैसा की हम सभी जानते है कि ऊँट को रेगिस्तान का जहाज़ कहा जाता है। इसका इस्तेमाल बोझ को धोने के लिए और भी बहुत से कामो के लिए किया जाता है. यह रेगिस्तान में करीब सात दिन तक बिना पानी पिए रह सकता है।  एक ऊँट का जीवनकाल चालीस से पच्चास वर्ष तक का होता है।

ऊँट की रफ़्तार 65 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है। ऊँट की ऊंचाई 1.85 मी और कूबड़ तक 2.15 मी  होती है।  ऊँट के शरीर के ऊपर एक कूबड़ होता है. जो की एक बहुत ही दिलचस्प बात है। ऐसा सुनने में आता है की ऊँट के कूबड़ में पानी होता है।

ये बात कहा तक सही है। कई लोगो को ये ग़लतफहमी होती है की ऊँट अपने कूबड़ में पानी भरके रखता है. लेकिन ऐसा नहीं है। ऊँट अपने कूबड़ में पानी नहीं बल्कि वसा संग्रह करके रखता है। ये अपने कूबड़ में लगभग 36.6 किलों तक वसा एकत्रित करके रखता है।

जब भी ऊँट को भोजन की जरूरत होती है  तो वह अपनी शारीरिक प्रक्रिया से भोजन इसी से मिलता है। ऊँट पानी की कमी को भी पूरा करने के लिए कूबड़ की वसा का इस्तेमाल करता है।

ऊँट अपनी अमाशय की थैली में भी पानी को इक्कठा करके रखता है। इसका भी इस्तेमाल यह पानी की कमी को पूरा करने लिए करता है।  मै आपको बता दू की ऊँट में कूबड़ पैदा होने के समय से नहीं होता बल्कि जैसे जैसे उसका विकास होता है।  वैसे वैसे उसका कूबड़ बढ़ता रहता है।

ऊँट के मुँह में लगभग 34 दांत होते है। लगभग बहुत समय पहले लोगो ने ऊँटो को पालतू बनाया था और इसका इस्तेमाल वह बोझा और सामान धोने के लिए करते है। ऊँट एक बार में 100 से 150 लीटर तक पानी पी जाते है। ऊँट को कभी भी पसीना नहीं आता क्युकी इसकी चमड़ी मोटी होती है।

डंक मारने के बाद मधुमक्खी मर क्यों जाती है ?

honey bee image

क्या आपको पता है की डंक मारने के बाद मधुमक्खी मर जाती है ? अगर नही तो चलिए आइये हम इस दुखद घटना के बारे में चर्चा करे 

मधुमक्खी जो हमे शहद देती है, जो फूलो पर मंडराती है वो डंक मारने के बाद मर जाती है, है न अजीब बात 

मधुमक्खी डंक मरते हुए 

दरअसल मधुमक्खी जब डंक मरती है तो उसका स्टिंगर (डंक मरने वाला भाग )  टूट जाता है क्यों की वो अपना स्टिंगर वापस नही खीच पाती और इसी चक्कर में न सिर्फ उसका स्टिंगर टूटता है बल्कि उसके साथ उसकी आंत, पाचन तंत्र और मांसपेशियां भी क्षतिग्रस्त हो जाती है या फिर टूट कर बहार आ जाती है और इसी कारन मधुमक्खी डंक मरने के बाद मर जाती है 

इसलिए अगर आपको मधुमक्खी काटे तो सबसे पहले उसका स्टिंगर अगर छुट गया हो तो निकाल कर नष्ट कर दे ताकि आपको ज्यदा परेशानी न हो 

मधुमक्खी ऐसे ही नही किसी को काट लेती है बल्कि अगर उसके शहद के छाते पर किसी प्रकार का अगर खतरा महसूस होता है तो ही वो कटती है या फिर अगर आपको उसको अच्छे से हैंडल नही करे तो भी वो काट लेती है 

ऐसे मधुमखियाँ जो अपने छाते की रक्षा करती है वो वर्कर मधुमखियाँ होती है जो प्रजनन नही करती है अपने रानी की रक्षा करती हैं 

सजीव और निर्जीव में क्या अंतर है

very cute elephant

सजीव की विशेषताए प्रमुख है

  1. आकर में बढ़ना – सजीव का शरीर का आकार बदलता है
  2. गति करना – सजीव हमेशा एक जगह बैठे नही रह सकता
  3. प्रजनन करना – सजीव अपने जैसे बच्चे पैदा करते हैं
  4. साँस लेना – सजीव साँस लिए बिना जिन्दा नही रह सकता
  5. पोषण प्राप्त करना – सजीव को खाना खाने की जरूरत पड़ती है
  6. अपने परिवेश की ओर प्रतिक्रिया करना – जैसे की किसी सजीव को अगर तेज धुप लगे तो वो छाव की तलाश करने लगती है
  7. सजीव कोशिका से बना होता है

निर्जीव की विशेषता सजीव जैसा बिलकुल भी नही है

  1. निर्जीव आकर में समय के साथ नही बढ़ता
  2. निर्जीव खुद से गति नही कर सकता, जब तक की उसपर कोई बहरी बल न लगे
  3. निर्जीव प्रजनन नही कर सकता
  4. निर्जीव वस्तु साँस नही ले सकती
  5. निर्जीव वस्तु को खाना खाने की जरूरत नही पड़ती
  6. निर्जीव वस्तु परिवेश की ओर कोई प्रतिक्रिया नही करती, जैसे की अगर हम लकड़ी को आग से जला दे तो वो आग देखकर भागती नही
  7. निर्जीव वस्तु कोशिका से नही बनी होती – जैसे की आपका फ़ोन वह कोशिका से नही बना है बल्कि मेटल और प्लास्टिक से बना है