पानीपत का युद्ध Panipat ka Yudh

भारत का इतिहास अत्यधिक बड़ा व विविधताओं वाला है| प्राचीन होने के कारण यह रुचिकर है और प्रसिद्ध भी| आज के इस लेख में हम पानीपत के युद्ध के बारे में बताएँगे|

पानीपत के युद्ध इतिहास में अपनी अलग छवि के नाम से प्रसिद्ध है| अभी तक के इतिहास में पानीपत के तीन युद्ध हुए है| प्रथम व द्वितीय युद्ध सन 1500 इस्वी के काल में और सन 1700 इस्वी के काल में तीसरा व अन्तिम युद्ध पानीपत के मैदान में हुआ| प्रत्येक युद्ध अपना अलग महत्व एवं भूमिका रखता है| पानीपत के तीन युद्ध ये है:

प्रथम युद्ध- बाबर एवं इब्राहीम लोदी के मध्य  

द्वितीय युद्ध- बैरम खान एवं हेमू के मध्य

तृतीय युद्ध- मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली के मध्य

पानीपत का प्रथम युद्ध- बाबर व् इब्राहीम लोदी:

21 अप्रैल 1526 को आज के समय में हरियाणा कहे जाने वाले राज्य के एक छोटे से गाँव पानीपत में बाबर और इब्राहीम लोदी के मध्य लड़ा गया| इसी युद्ध के फलस्वरूप भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना की शुरूआत हुई|

इस युद्ध में पहली बार बारूद एवं आग से बने हथियारों का प्रयोग किया गया था एवं काफी बड़े पैमाने पर नए शस्त्रों का इस्तेमाल किया गया|

बाबर काबुल का एक शक्तिशाली शासक था जिसका पूरा नाम जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर था| इब्राहीम लोदी उस समय दिल्ली सल्तनत पर राज कर रहा था|

हरियाणा राज्य के कई हिन्दू राजा इस युद्ध में शामिल हुए एवं ग्वालियर के कई राजा इब्राहीम लोदी की तरफ से युद्ध में सम्मिलित हुए|

बाबर ने इस युद्ध में तुलुगुमा युद्ध पद्धति अपनाई, जो अन्य युद्ध नीतियों में से एक उत्तम युद्ध प्रणाली मानी जाती है|

इब्राहीम लोदी की सेना में लगभग एक लाख लोग सम्मिलित थे, जबकि बाबर की सेना में 20,000 के करीब सैनिक मौजूद थे एवं यह काफी बड़ा अंतराल था फिर भी इस युद्ध में जीत बाबर की हुई|

युद्ध का परिणाम:

सेना के एक विशाल अंतराल होने के बावजूद मुग़ल साम्राज्य एवं दिल्ली सल्तनत के बीच हुए इस युद्ध में बाबर अपनी कूटनीति एवं युद्ध नीति के कारण विजयी हुआ|

इस युद्ध के बाद बाबर ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया एवं मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक के रूप में जाना जाने लगा|

पानीपत का द्वितीय युद्ध- बैरम खान एवं हेमू:

5 नवम्बर 1556 ई. को पानीपत के मैदान ने फिर से एक विशाल युद्ध देखा, जो कि अकबर के सेनापति बैरम खान एवं आदिलशाह के सेनापति हेमू जिसका पूरा नाम हेमचन्द्र विक्रमादित्य के मध्य लड़ा गया|

युद्ध की पृष्ठभूमि:

1556 में मुग़ल साम्राज्य के द्वितीय शासक हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसके पुत्र अकबर ने बहुत ही कम आयु तेरह वर्ष में मुग़ल सत्ता अपने हाथ में ली, किन्तु उस समय उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी, इसलिए बैरम खान उनके सरंक्षक के रूप में सामने आया|

हेमू उस समय अफगान शासक आदिलशाह के सेनापति के पद पर कार्यरत था एवं हुमायु की मृत्यु का लाभ उठाते हुए उत्तर भारत पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया एवं दक्षिण के तरफ भी कई युद्ध जीते|

6 अक्तूबर के दिन हेमू ने दिल्ली की लड़ाई में 3000 मुग़ल सैनिको को मौत के घाट उतार दिया, जिससे मुगलों में आक्रोश उत्पन्न हो गया एवं बैरम खान ने हेमू को ईट का जवाब पत्थर से देने की ठानी| हालंकि अकबर इस युद्ध के पक्ष में नहीं था|

अंतत: पानीपत के प्रथम युद्ध के 30 वर्ष बाद फिर से एक और युद्ध का ऐलान किया गया| दोनों सेनाएं 5 नवम्बर को पानीपत के मैदान में आमने-सामने आई एवं इस युद्ध में भी मुगलों का सैनिक बल कम था|

युद्ध के परिणाम:

इस युद्ध में बैरम खान विजयी हुआ एवं हेमू को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा| हेमू का सिर धड से अलग करके दिल्ली के दरवाजे पर टांग दिया गया एवं बाकी शरीर को दिल्ली के पुराने दुर्ग पर लटका दिया गया, जिससे अन्य विद्रोहियों के मन मे मुगलों के प्रति भय पैदा हो सके|

अकबर ने एक बार फिर दिल्ली सल्तनत को अपने हाथ में लिया और साथ ही अन्य विद्रोहियों को पकड़कर उन्हें भी मौत की सजा सुनाई गई|

युद्ध के कुछ समय बाद हेमू के पिता को भी अलवर से गिरफ्तार करके उन्हें भी मार दिया गया|

पानीपत का तृतीय युद्ध- मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली:

यह युद्ध मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ एवं दुर्रानी साम्राज्य के शासक एवं संस्थापक अहमदशाह अब्दाली के बीच 14 जनवरी 1761 ई. में लड़ा गया|

अहमदशाह अब्दाली अफगान शासक था, जो कई बार भारत आ चुका था| इसी समय पंजाब का सूबेदार किसी लड़ाई में बूरी तरह परास्त हुआ, जिससे दिल्ली साम्राज्य ने पंजाब को अफगान के हवाले कर दिया और अब्दाली ने पिछले सूबेदारों को हटाकर अपने अधिकारयों को उनका पद दे दिया एवं अफगान लौट गया|

अब्दाली की गैर मौजूदगी का लाभ उठाकर मराठो ने पंजाब पर हमला कर दिया एवं लाहौर पर कब्जा कर लिया| इसी बात से नाराज होकर अब्दाली ने मराठा साम्राज्य से युद्ध करने की योजना बनाई|

इस युद्ध में पेशवा बालाजी बाजीराव ने अपने सेनापति सदाशिव राव के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी एवं 14 जनवरी को दोनों सेनाएं पानीपत के मैदान में आमने-सामने इकठी हुई|

युद्ध के परिणाम:

इस युद्ध में काफी नुक्सान के साथ मराठों की बुरी तरह से हार हुई| इस हार का कारण ये था कि अब्दाली का सैनिक बल मजबूत था और उत्तरी भारत के सभी मुस्लिम शक्ति ने अब्दाली का साथ दिया| इसके अलावा मराठाओं द्वारा पंजाब पर आक्रमण करने की वजह से वहाँ के सिख व् राजपूत सैनिकों ने भी मराठा के विरुद्ध होकर लड़ाई लड़ीं व मराठा सेना के मध्य संगठन शक्ति व समता की कमी भी पराजय का कारण बनी|  

निष्कर्ष:

युद्ध की विजय या पराजय सेनानायक व सैनिकों की कुशलता, बुद्धिमता व युद्धनीति पर निर्भर करती है| ऊपर दिए गए उल्लेख में यह तथ्य तो सिद्ध हो ही गया कि केवल सैनिकों की संख्या अधिक होने से विजय हासिल नहीं की जा सकती|  

हमारा इतिहास काफी गौरवपूर्ण रहा है| हालांकि कभी कहीं नुकसान झेलना पड़ा तो कहीं लाभ भी हुआ| इतिहास के कुछ पन्ने भयभीत व निराश करने वाले हैं तो कुछ गर्व महसूस करवाने वाले| परन्तु हार व जीत का सिलसिला हमेशा से चलता आया है और चलता रहेगा|   

तुगलक वंश एवं दिल्ली सल्तनत Tughlak Vansh Evm Delhi Saltnat

तुगलक वंश ने दिल्ली सल्तनत पर काफी समय तक शासन किया एवं इसमें तीन शासक ऐसे हुए जिन्हें आज भी उनकी नीतियों एवं कार्यों के कारण जाना जाता है| तुगलक वंश का शासन काल 1320 से लेकर 1414 तक माना गया है|

खिलजियो के अंत के साथ ही दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश का राज शुरू हुआ एवं इसके अनेक महान शासकों में से तीन प्रमुख शासक थे:-

गयासुद्दीन तुगलक

मुहम्मद बिन तुगलक

फिरोज शाह तुगलक

गयासुद्दीन तुगलक 1320-1325

तुगलक गाजी या गाजी मालिक के नाम से प्रसिद्ध गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलक वंश की स्थापना की| गयासुद्दीन का शासनकाल 5 वर्ष तक चला एवं यह पहला ऐसा सुल्तान था जिसने अपने नाम के साथ ‘गाजी’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है काफ़िरो को मारने वाला|

गयासुद्दीन ने कुल 29 वार मंगोल सेना द्वारा किये गये आक्रमण को विफल कर दिया एवं उन्हें दिल्ली में प्रवेश करने से रोके रखा एवं कैदियों के प्रति सख्त रुख अपनाया| गयासुद्दीन तुगलक के शासनकाल में तुगलकाबाद किले का निर्माण कार्य शुरू हुआ एवं उसने 1323 में अपने बेटे मुहम्मद बिन तुगलक को गद्दी का भार सौंप दिया|

गयासुद्दीन तुगलक द्वारा किये गये सुधार:
गयासुद्दीन ने कई आर्थिक सुधार किये जिसमे उसने ‘रस्म-ए-मियान’ यानी सख्ती एवं नरमी के बीच का संतुलन वाली नीति अपनाई|

उसने उपज में से लिए जाने वाले लगान कर को कम कर दिया एवं जमीदारों को उनके पुराने अधिकार वापस लौटा दिए|

इसने कई नहरों का निर्माण करवाया जो सिंचाई कार्य में काम आती थी एवं नहरे बनवाने का श्रेय सर्वप्रथम गयासुद्दीन तुगलक को दिया जाता है| इसके साथ ही इसने कई बाग़, किले, एवं सड़के भी बनवाई|

गयासुद्दीन के समय में डाक व्यवस्था काफी अच्छे स्तर पर थी एवं उसने अलाउद्दीन द्वारा लागू कठोर नीतियों में नरमी अपनाई|

चूँकि गयासुद्दीन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था एवं कठोर इस्लाम धर्म में यकीन रखता था अत: वह अपनी जनता से भी ऐसी ही कामना रखता था|

मृत्यु:

1325 में गयासुद्दीन तुगलक बंगाल अभियान से लौट रहा था एवं रास्ते में विश्राम के लिए एक लकड़ी से बने महल में रुका जिसकी नीव काफी कमजोर थी एवं वह ध्वस्त हो गया जिसमे दबने के कारण गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु हो गई|

मुहम्मद बिन तुगलक 1325-1351

गयासुद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गद्दी पर विराजमान हुआ उसका वास्तविक नाम जूना खान था एवं गद्दी पर बैठने के बाद उसे मुहम्मद बिन तुगलक की उपाधि धारण की| तुगलक वंश के सभी शासकों में मुहम्मद बिन तुगलक सबसे अधिक शिक्षित एवं योग्य शासक के रूप में जाना जाता है|

कई इतिहासकार उसे पागल या सनकी शासक के रूप में देखते है क्योकि इसने कुछ इसे काम किये जो अजीब प्रतीत होते थे| गद्दी पर बैठने के बाद मुहम्मद ने कई व्यक्तियों को अनेक उपाधियों से शोभित किया| जैसे इसने मालिक कबूल को ‘वजीर-ए-मुमालिक’ का पद देकर उसे ‘खान-ए-जहाँ’ की उपाधि से शोभित किया|

मुहम्मद बिन तुगलक ने बिना किसी पक्षपात के सभी योग्य अधिकारीयों को उनकी कार्यक्षमता एवं दक्षता के आधार पर पद सौंपे| जूना खान कई प्रकार की कलाओं में निपुण था एवं उसे चिकित्सा, खगोल शास्त्र, ज्योतिष विज्ञानं, गणित आदि कलाओं एव् विषयों में रूचि थी|

मुहम्मद बिन तुगलक ने नस्ल भेदभाव को पूरी तरह समाप्त कर दिया किन्तु फिर भी उसे इतिहास में वह योग्य स्थान नहीं प्राप्त हो पाया जिसका वह सच्चा हकदार था|

मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियाँ:

दिल्ली सल्तनत का सबसे ज्यादा विस्तार मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में हुआ उस समय दिल्ली साम्राज्य 23 भागों में विभाजित था जिसके अंतर्गत गुजरात, बिहार, लाहौर, कन्नौज, दिल्ली, उड़ीसा, मुल्तान, कश्मीर, जाजनगर, एवं बलूचिस्तान सम्मिलित थे|

कर वृद्धि एवं सांकेतिक मुद्रा चलवाना:

तुगलक ने दोआब क्षेत्रों के करो में वृद्धि कर दी किन्तु प्रक्रति ने उसका साथ नहीं दिया एवं उस वर्ष अकाल की स्थिति पैदा हो गई जिससे दोआब वसूल करने के लिए जनता को विवश किया गया जिससे जनता में क्रोध पैदा होने लगा|

इसके साथ मुहम्मद बिन तुगलक ने दोकानी नामक मुद्रा का प्रचलन करवाया जिसे सांकेतिक मुद्रा भी कहा जाता है एवं इसी कृत्य के लिए तुगलक को सबसे ज्यादा अपमान झेलना पड़ा| उसने ताम्बे एवं पीतल के सिक्के चलवा दिए जिनकी कीमत चांदी के सिक्को के बराबर मानी जानी थी|

इस योजना के बाद लोगों ने घरों में ही नकली टकसाल बनानी आरम्भ करदी एवं जल्द ही उसे रद्द कर दिया गया|

राजधानी परिवर्तन:

इसने दिल्ली से अपनी राजधानी को देवगिरी में परिवर्तित कर दिया जिसका नाम इसने कुतुबबाद रखा एवं इस कार्य के लिए भी इसे काफी आलोचना झेलनी पड़ी|  

मृत्यु:

गुजरात में चल रहे विद्रोह को खत्म करके सिंध की और बढ़ते हुए रास्ते में सुल्तान गंभीर रूप से बीमार होंने के कारण मार्च 1351 को मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गई|

फिरोजशाह तुगलक 1351-1388:

फिरोजशाह तुगलक भी तुगलक वंश का अच्छा शासक माना जाता है एवं यह 45 वर्ष की उम्र में दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना| इसने शरियत के नियमो को राज्य में लागू किया एवं सभी अनावश्यक करों को खत्म कर दिया|

फिरोजशाह तुगलक के महत्वपूर्ण कार्य:

4 करों को छोडकर फिरोजशाह ने 24 करों को खत्म कर दिया| सिंचाई पर सुल्तान ने केवल एक कर लगाया जो उपज का 1/10 भाग वसूलना था|

किसानों को सिंचाई में दिक्कत न ही इसलिए इसने 5 बड़ी नहरों का निर्माण करवाया एवं 1200 उद्यानों का निर्माण करवाया|

नये नगर बनाये गये एवं एक सरकारी अस्पताल का निर्माण करवाया गया जहाँ मुफ्त चिकित्सा प्रदान करवाई जाती थी|

इस समय दास प्रथा का काफी प्रचलन था एवं दासों की संख्या 2 लाख के पास पहुँच गई थी| केवल दासों की देखभाल हेतु ‘दीवान-ए-बन्दगान’ की स्थापना की गई|

गरीब लाचार एवं विधवा महिलाओ के लिए ‘दीवान-ए-खैरात’ नामक समुदाय की स्थापना की गई जो हर तरह से उनकी सहायता करता था|

सम्राट अशोक द्वारा स्थापित शिलालेखों को दिल्ली में लाकर स्थापित किया गया एवं आन्तरिक व्यापार को बढ़ाने हेतु कई योजनाये बनाई गई|

मृत्यु:

सितम्बर 1388 में फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु हो गई एवं इसकी मौत के बाद मोहम्मद खान दिल्ली की गद्दी पर बैठा किन्तु वह अधिक समय तक शासन नहीं कर पाया एवं जल्द ही उसकी हत्या कर दी गई|

मोहनजोदड़ो सभ्यता का उद्भव एवं विनाश MohanjoDaro Sabhyta ka Udbhav evm Vinash

सिन्धु घाटी सभ्यता का नाम तो आप सभी ने सुना ही होगा, इसी सभ्यता से जुड़ा एक नगर है-मोहनजोदडों। आज से लगभग 2600 ईसा पूर्व इस नगर का विकास हुआ था। इसके भिन्न-भिन्न उच्चारण हैं- मुअन जोदडों, मोहनजोदरों, मोहेंजो दारों। सिन्धी भाषा के इस शब्द का मतलब है- ‘मुर्दों का टीला’। यह दुनिया के प्राचीनतम नगरों में से एक माना जाता है। यह पाकिस्तान में सिन्धु नदी के पास पश्चिम की तरफ़ बसा एक नगर है। यह सिन्ध के लरकाना ज़िले के क्षेत्र में आता है। आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व राखालदास बनर्जी द्वारा यह नगर खोजा गया था।

संरचना व निर्माण

मोहनजोदडों को एक व्यवस्थित शहर की संज्ञा दी जाती है। पक्की ईंटों व मज़बूत दीवारों के बने घर यहाँ आज भी स्थित हैं। स्नानगृह व कुएँ तथा जल के निकास के लिये नालियों की भी व्यवस्था थी। आवागमन के लिए बड़ी-चौड़ी सड़कें भी बनाई गयी थीं, जो कि आज भी वैसे ही मौजूद हैं।

यहाँ एक ओर स्थान प्रसिद्ध है, जिसे कुछ लोग विशाल स्नानगृह कहते हैं और कुछ वृहत जल कुंड के नाम से बताते हैं। यह 8 फुट गहराई, 24 फुट चौड़ाई व 30 फुट लम्बाई वाला स्तंभों से घिरा हुआ है। यह अत्यन्त पक्की ईंटों से बनाया गया है और इसके दो तरफ़ सीढ़ियाँ बनी हैं। इससे सटी पानी निकलने के लिए बनाई गयी नालियाँ भी कच्ची मिट्टी की नही हैं और उन्हें ढका भी गया है।

इस नगर में भिन्न-भिन्न स्थानों व कुंड का निर्माण काफ़ी समझदारी व मेहनत के साथ किया गया था। इससे हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय केवल स्त्रोतों की कमी थी, परन्तु लोग काफ़ी  बुद्धिमान हुआ करते थे और कार्य भी पूरी क्षमता के साथ करते थे। निर्माण विधि देखकर यह सिद्ध होता है कि गणित और विज्ञान से भी अवगत थे।

ख़ुदाई में मिले तथ्य

vintage pottery on wooden surface

आज तक मोहनजोदडों के लगभग एक तिहाई क्षेत्र को खोदा जा चुका है। यह तो सर्व विदित ही है कि यहाँ सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष मिले थे। इसके अतिरिक्त ख़ुदाई में कुछ ऐसी चीज़ें मिली हैं, जिनसे यह प्रतीत होता है कि उस समय नगर के लोग कृषि कार्य भी करते थे और पशु भी पालते थे। देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई और कुछ चित्रात्मक छापे भी मिली, जो शायद किसी भाषा के रूप मे प्रयोग की जाती होंगी। यहाँ एक स्थान ऐसा भी खोजा गया, जहाँ रंग का इस्तेमाल होता था। यह कपड़ों की रंगाई या किन्ही वस्तुओं की रंगाई का हो सकता है।

संगीत व गाने-बजाने के कुछ सामान मिले, जो इस ओर इंगित करते हैं कि इस सभ्यता के लोग नाचने-गाने से अपना मनोरंजन करते होंगे। यहाँ कुछ ऐसे चीजें भी पायी गई, जिसमें चारकोल का इस्तेमाल किया गया था।  कांसे के बर्तन व मूर्तियाँ, मुहर, सिक्के व अन्य मुद्राएँ, शीशा, खेलने के सामान, मिट्टी के सामान, औज़ार, गहने, गेहूँ पीसने की चक्की आदि अनेक प्रकार की वस्तुएँ मिली, जो कि आज के समय में लोगों के देखने के लिये अजायबघर में संग्रहित कर दी गयी। 

विस्मित कर देने वाली बात यह है कि इतने सारे अवशेषों में किसी भी हथियार का कोई सबूत नही मिला। मानो उस समय में नगर के लोगों द्वारा या राजा के द्वारा हथियारों का प्रयोग ही नही किया जाता था।

किसी प्रकार की हिंसा होती ही नही होगी, न दण्ड देने के लिये कोई हथियार थे। यह काफ़ी सकारात्मक पहलू सिद्ध होता है, जो कि मोहनजोदडों की शान्त व परोपकारी शासनकाल और अहिंसा व आपसी स्नेह व भाईचारे वाली संस्कृति की ओर इशारा करता है। आज भी विशेषज्ञ इस विषय पर कार्य कर रहे हैं।

पूर्णतः इसे भी सत्य नही माना गया क्योंकि अभी तक इस नगर की ख़ुदाई का कार्य अधूरा है। यह भी सम्भव है कि आगे कोई ऐसे सबूत मिल जाये, जो आज की हमारी इस विचारधारा में परिवर्तन कर दे।

आज की स्थिति

मोहनजोदडों आज बसा हुआ नगर नही है, परन्तु इसकी गालियाँ व सड़कें आज भी विचरण के लिये मौजूद हैं और घर व इमारतों की दीवारें पुरानी होकर खंडहर बन गयीं है, लेकिन यह वहाँ की सभ्यता व विकास को आज भी ज़ाहिर करती हैं। दोनों ओर घर व बीच में सड़क की चौड़ाई इतनी है कि आसानी से दो बैलगाड़ियाँ गुजर सकती हैं। यहाँ एक ओर विशेष बात यह भी देखी गयी कि घरों के दरवाज़े मुख्य सड़कों पर न होकर भीतर की गलियों की तरफ खुलते हैं। यह नगर टेढ़ा-मेढ़ा व संकरी गलियों वाला न होकर पूरे प्रबंधित तरीक़े से निर्मित किया गया था। 

सभ्यता का विनाश

मोहनजोदडों की सभ्यता का विनाश होने के सही कारणों का पता आजतक नही चल पाया है। इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। खोजकर्ताओं के अपने ज्ञान के आधार पर इसके अंत के अनेक कारण बताए जा चुके हैं। 

कुछ विद्वान कहते हैं कि पृथ्वी की भीतर संरचना में हुए बदलावों के कारण वहाँ की जलवायु परिवर्तित हुई। तब अकाल पड़ने से यह क्षेत्र सूखा ग्रस्त हो गया और इसी वजह से धीरे-धीरे लोग मरने लगे और सभ्यता ख़त्म हो गयी। 

वहीं दूसरी ओर कुछ कहते हैं कि जलवायु और भौगोलिक परिवर्तन होने से पृथ्वी में हलचल हुई और भीषण भूकम्प आने के कारण मोहनजोदडों का विनाश हुआ।

इसके अतिरिक्त कुछ शोधकर्ताओं ने यह बात भी कही कि इस नगर की खुदाई के समय कुछ मानव कंकाल पाए गये और जाँच के परिणाम स्वरूप उन कंकालों पर रेडियोधर्मी किरणों के परिणाम पाये गये। परन्तु उस समय परमाणु विस्फोट होने के आसार उचित प्रतीत नही होते। लेकिन यह भी कहा गया कि हो सकता है कि महाभारत के युग में युद्ध के दौरान ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया गया होगा और ब्रह्मास्त्र को परमाणु बम के समान ही माना जाता था, जिसमें किसी भी सभ्यता का विनाश करने की शक्ति होती थी।

महाभारत काल के लगभग 1000-1100 वर्षों के पश्चात् ही मोहनजोदडों का विकास हुआ और वहाँ ब्रह्मास्त्र का असर तब भी मौजूद रहा होगा। परन्तु अभी तक इसकी सत्यता प्रमाणित नही हुई है। 

इतने अध्ययन के पश्चात् यही निष्कर्ष निकलता है कि आजतक मोहनजोदडों के विनाश की असलियत सामने नही आयी है। अभी तक इस नगर की ख़ुदाई पूरी नही हुई है और इसके विकास व विनाश सम्बन्धी विषयों पर आज़ भी खोज कार्य व चर्चा जारी है|

वीर छत्रपति शिवाजी Veer Chatrpati Shivaji

मराठा साम्राज्य की नीव रखने वाले भारत के महान सम्राटों में से एक नाम वीर शिवाजी का भी सम्मिलित किया गया है| इन्होने अपने समय में कई युद्ध किये एवं हर बार अपनी वीरता का परिचय देते हुए किसी के सामने घुटने नहीं टेके|

शिवाजी ने कई युद्ध प्रणालियाँ भी विकसित की, जो काफी प्रसिद्ध हुई एवं हिन्दू संस्कृति को नए आयाम दिए| आज हम वीर छत्रपति शिवाजी के विषय में विस्तारपूर्वक जानेंगें|

प्रारम्भिक जीवन:

शिवाजी का जन्म 1627 में पुणे के पास स्थित शिवनेरी दुर्ग में हुआ था| हालांकि कुछ इतिहासकार इनका जन्म 1630 में मानते है| इनके पिता का नाम शाहजी भोंसले एवं माता का नाम जीजाबाई था| इनका एक और बड़ा भाई जिसका नाम सम्भाजी था|

शिवाजी ने अपना बचपन का अधिक समय माता के साथ गुजारा एवं उनके बड़े भाई ने पिता के साथ| बचपन से ही शिवाजी वीर एवं साहसी थे और गुलामी एवं अपने से नीचे वर्ग के प्रति बुरा बर्ताव उन्हें बेचैन कर देता था|

शिवाजी ने सईबाई निम्बालकर के साथ 1640 में विवाह किया एवं उसके बाद उन्होंने 7 विवाह और किये, जो की मराठा राज्य को एकजुट करने के लिए किये गये थे|

कुछ इतिहासकार मानते है कि शिवाजी ने अपने समय में मुस्लिमो का विरोध किया, जबकि यह बात सत्य प्रतीत नहीं होती, क्योकि तथ्यों के अनुसार शिवाजी के राज्य में कई अच्छे मुस्लिम सेनानायक थे, जिनके साथ शिवाजी के उत्तम सम्बन्ध रहे|

शिवाजी ने 1674 में अपने राज्याभिषेक के दौरान ‘छत्रपति’ की उपाधि धारण की| शिवाजी ने सबसे पहले छापामार युद्ध पद्धति या गुर्रिल्ला युद्ध प्रणाली को विकसित किया|

किलों पर विजय प्राप्त करना:

शिवाजी के शासनकाल के समय बीजापुर मुगलों के आतंक से परेशान था एवं वहां का सुल्तान भी काफी क्रूर था, जिसका नाम आदिलशाह था| आदिलशाह की सेहत खराब होने पर शिवाजी ने मौके का लाभ उठाया एवं बीजापुर के किले रोहिदेश्वर दुर्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया|

इसके बाद शिवाजी ने तोरणा दुर्ग जो कि यहाँ से 30 किमी. दूरी पर था, उसपर भी राजनितिक सूझ से अधिकार कर लिया| इसके बाद इन्होने राजगढ़ के किले पर अपना अधिकार कर लिया एवं शिवाजी के लगातार दुर्ग जीतने से आदिलशाह क्रोधित हो गया एवं उसने शिवाजी के पिता को बंधी बना लिया|

शिवाजी ने अपने आसपास के लगभग 23 किलों पर एकाधिकार कर लिया| शिवाजी के पिता को बंदी बनाये जाने के बाद शिवाजी को विवश किया किया गया कि वे बीजापुर के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाएंगे एवं उनके मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, जिसे मजबूरी में शिवाजी को मानना पड़ा|

मुगलों से टक्कर:

बीजापुर के साथ-साथ शिवाजी के कड़े दुश्मन थे मुग़ल| शिवाजी के समय औरंगजेब केवल एक सूबेदार था एवं आदिलशाह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया एवं शिवाजी ने इससे खफा होकर औरंगजेब पर धावा बोल दिया, जिससे औरंगजेब नाराज हो गया क्योकि वह शिवाजी से मैत्री की उम्मीद रखता था|

अपने पिता शाहजहाँ के कहने पर औरंगजेब ने बीजापुर से संधि करना स्वीकार कर लिया, किन्तु जल्द ही उसने कूटनीति दिखाते हुए अपने ही पिता को बंदी बना लिया एवं स्वयं मुगल सिहांसन पर विराजमान हो गया|

शिवाजी ने जल्द ही कोंकण क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाया एवं कई अन्य स्थानों को भी मराठा साम्राज्य में मिला लिया|

शिवाजी की बढती हुई शक्ति से औरंगजेब को चिंता होने लगी थी, इसलिए उसने दक्षिण में अपने मामा सूबेदार शाइस्ता खान को भेजा, जिसने वहाँ जाकर काफी लूट मचाई| शाइस्ता जल्दी ही अपने डेढ़ लाख सैनिको के साथ पूना पहुँच गया एवं चाकन व सुपन के किलों पर अपना अधिकार कर लिया|

शिवाजी को जब इस बात की सूचना मिली तो उन्होंने मावलों के साथ रात को शाइस्ता के कबीले पर हमला बोल दिया, जिसमे शाइस्ता किसी तरह बचकर भाग निकला, किन्तु उसकी 4 उंगलिया कट गई| इसके बाद औरंगजेब ने उसे वहाँ से हटाकर बंगाल का सूबेदार नियुक्त कर दिया|

मुगलों से संधि का प्रस्ताव भेजना:

शाइस्ता खान द्वारा 6 साल तक लूटपाट करने के बाद शिवाजी को धन का काफी नुकसान हुआ, जिसकी भरपाई करने के लिए शिवाजी ने धनी व्यापारियों को लूटना आरम्भ कर दिया|

उस समय सूरत समृद्ध नगर था, जो कि बन्दरगाह होने के कारण व्यापार का प्रमुख केंद्र भी था एवं शिवाजी ने यही से अपनी लूट की शुरुआत की जो 6 दिन तक चली|

शिवाजी की इस हरकत ने औरंगजेब को क्रोधित कर दिया एवं उसने नए सूबेदार गयासुद्दीन को सूरत में नियुक्त किया| औरंगजेब के आदेश पर राजा जयसिंह ने अन्य सामंतों के साथ मिलकर शिवाजी पर आक्रमण कर दिया, जिससे शिवाजी को काफी नुकसान उठाना पड़ा एवं उन्होंने मुगलों के पास संधि का प्रस्ताव भेजा|

यह संधि 1665 में की गई, जिसके अंतर्गत शिवाजी अपने 23 किले मुगलों को देंगे एवं 12 स्वंय रखेंगे| शिवाजी को हर वर्ष 5 लाख हूण राजस्व के रूप में मुगल खजाने में जमा करवाने होंगे|

शिवाजी मुगल दरबार से दूर रह सकते है, किन्तु उनके पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार की खिदमत में हमेशा उपस्थित रहना पड़ेगा|

संधि के अनुसार शिवाजी को हमेशा बीजापुर के किसी भी विरोध में मुगलों का साथ देना होगा|

शिवाजी की मृत्यु:

शिवाजी की मृत्यु विष दिए जाने के कारण 3 अप्रैल 1680 को हुई| शिवाजी की मृत्यु के बाद राज्य का कार्यभार उनके बड़े पुत्र शम्भाजी ने संभाला| शिवाजी की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मौके का फायदा उठाया एवं अपने 5 लाख सैनिको के साथ दक्षिण पर आक्रमण कर दिया|

शिवाजी से रंजिश के चलते औरंगजेब ने शम्भाजी को मार दिया एवं मराठा साम्राज्य के बचे हुए वंश को भी खत्म कर दिया|

निष्कर्ष:

शिवाजी को एक कुशल एवं साहसी राजा के रूप में देखा जाता है| कहते है कि मुगल सम्राट औरंगजेब भी शिवाजी की वीरता से डर गया था, इसलिए उसने उन्हें धोखे से मारने की योजना बनाई|

शिवाजी के समय आठ मंत्रियों की परिषद बनाई गई थी, जिसे अष्ठप्रधान कहा जाता था| इनके प्रधान मंत्री को पेशवा कहते थे, जिसका राजा के बाद दूसरा स्थान था| सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे|

मराठा साम्राज्य कई भागों में विभक्त था एवं प्रत्येक प्रान्त में प्रान्तपति नियुक्त किया जाता था| ये प्रान्तपति प्रान्त से जुड़े हर मामले के लिए जिम्मेदार होते थे|

मुगल साम्राज्य की स्थापना, शाहजहाँ एवं औरंगजेब Mugal samrajay ki Sthapana Shahjahan evn Aurangzeb

मुग़ल साम्राज्य के अंतर्गत कई ऐसे महान शासक हुए जिन्हें आज भी इतिहास उनकी उदारता एवं कला से प्रेम के कारण याद रखता है| बाबर से लेकर औरंगजेब तक मुगल साम्राज्य सबसे अधिक शक्तिशाली माना जाता रहा एवं इसने सम्पूर्ण भारत पर अधिकार करते हुए अनेक जगह अपनी विजय का परचम लहराया|

बाबर:

मुगल साम्राज्य की स्थापना का श्रेय बाबर को दिया जाता है जो कि तैमुर लंग एवं चंगेज खान के वंशज थे एवं 1526 ई. में पानीपत के युद्ध वे जीत हासिल करके मुगल राज को स्थापित किया|

बाबर का शासनकाल 1530 ई. तक रहा एवं उनके बाद उनके पुत्र हुमायूँ ने गद्दी का भार संभाला|

हुमायूँ:

बाबर के बाद उसके बेटे हुमायूँ ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ली किन्तु वे इतने योग्य शासक नहीं बन पाए एवं काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा| शेरशाह सूरी जो कि एक अफगानी शासक था, द्वारा हुमायूँ को बुरी हार का सामना करना पड़ा एवं 1556 ई. में हुमायूँ की मौत हो गई|

शेरशाह सूरी:

1540 ई. में मुगल शासक हुमायूँ को बूरी तरह हराकर शेरशाह सूरी ने मुगल शासन अपने हाथ में लिया एवं इनका शासनकाल काफी अच्छा एवं विकसित माना जाता है| शेरशाह ने 5 वर्ष तक राज किया जिसके दौरान उसने कई सराय, सड़के, एवं इमारतों का निर्माण करवाया, दिल्ली की GT रोड या ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माण भी शेरशाह सूरी ने करवाया था|

अकबर:

हुमायूँ के पुत्र अकबर का शासनकाल सबसे उत्तम माना जाता है| छोटी उम्र में पिता को खोने के बाद चाचा द्वारा पालन पोषण किया गया एवं मात्र 13 वर्ष की आयु में जलाल ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ली|

अकबर ने लगभग सभी हिन्दू राजाओं से उदारता एवं मैत्री की नीति अपनाई एवं कई सन्धिया की| उन्होंने सुंदर इमारते बनाई एवं मनसबदार प्रथा एवं कर वसूली में कटौती की| अकबर ने 50 साल तक राज किया एवं उनकी मृत्यु 1605 ई. में हुई|

अकबर के समय में कई महान कलाकर उसके राज्य की शोभा बढाते थे जिन्हें अकबर के नवरत्न कहा जाता है जिसमे तानसेन, बीरबल आदि का नाम सम्मिलित है|

जहाँगीर:

अकबर के बाद उनके बेटे जहाँगीर या जिसे सलीम के नाम से भी जाना जाता है, ने राज्य भार सम्भाला किन्तु वो अपने पिता के तरह महान शासक नहीं बन सका| जहाँगीर अपनी बेगम मेहरुन्निसा से बहुत अधिक प्रेम करता था| जहाँगीर के हुक्म पर ही सिक्खों के गुरु अर्जन देव की हत्या कर दी गई जिससे सिक्खों के साथ उनके सम्बन्ध खराब हो गये| 1627 में जहाँगीर की मौत हो गई थी|

शाहजहाँ:

शाहजहाँ या खुर्रम नाम से प्रसिद्ध जहाँगीर के पुत्र ने 1628 में शासन अपने हाथ में लिया| शाहजहाँ का जन्म लाहौर में हुआ था एवं उन्हें अपनी कलाप्रेम एवं उदार नीतियों के कारण जाना जाता है|

शाहजहाँ के काल को मुगल साम्राज्य के इतिहास में स्थापत्य कला का स्वर्ण युग कहा जाता है क्योकि जितनी सुंदर एवं अद्भुत इमारते शाहजहाँ से बनवाई इतनी किसी अन्य मुगल शासक ने नहीं बनवाई|

शाहजहाँ का विवाह बानो बेगम से 1612 ई. में किया गया किन्तु प्रथम प्रसव के दौरान ही उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई|

इसके बाद भी शाहजहाँ ने कई शादियाँ की किन्तु उनकी सबसे प्रिय पत्नी मुमताज महल थी जिनकी याद में उन्होंने ताजमहल बनवाया जो कि सफ़ेद संगेमरमरी इमारत है, आज भी आगरा का प्रसिद्ध पर्यटन केंद्र है| कहते है कि शाहजहाँ ने ताजमहल बनाने वाले मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे जिससे भविष्य में ऐसी इमारत फिर से न बनाई जा सके|

शाहजहाँ के 4 बेटे थे जिनके नाम थे दाराशिकोह, औरंगजेब, शाह्शुजा, एवं मुराद्बक्स एवं उनकी 3 पुत्रियाँ थी जिनके नाम थे जहाँनारा, गौहरारा, एवं रोशनारा|

शाहजहाँ के शासनकाल में युद्ध न के बराबर हुआ क्योकि उसका सारा ध्यान वास्तुकला एवं स्थापत्य कला में रहा| ताजमहल के साथ-साथ शाहजहाँ ने दीवाने आम, दिल्ली का लाल किला जिसे बनाने में 10 साल लगे, दीवान-ए-खास, मोटी मस्जिद, एवं दिल्ली की जामा मस्जिद का निर्माण करवाया|

1657 ई. में शाहजहाँ के बीमार पड़ने के बाद उनके बेटों दारा एवं औरंगजेब में गद्दी को लेकर झगड़ा प्राम्भ हो गया| औरंगजेब ने अपने ही पिता को बंदी बना लिया एवं जेल में बंद कर दिया|

अपने बड़े भाई दारा को शिकस्त देकर औरंगजेब ने सत्ता हथिया ली| शाहजहाँ ने अपने जीवन के अंतिम साल कारावास में बिताये एवं 1666 में उनकी मृत्यु हो गई|

औरंगजेब:

शाहजहाँ एवं मुमताज महल के पुत्र औरंगजेब का पूरा नाम ‘अबुल मुजफ्फर मुहियुद्दीन मुहम्मद औरंगजेब’ था जिन्होंने 1658 ई. में दिल्ली में अपना शाही राज्याभिषेक करवाया| औरगंजेब इस्लाम धर्म में यकीन रखता था एवं कट्टर सुन्नी नीतियाँ अपनाने में विश्वास रखता था|

सिक्खों के गुरु तेग बहादुर सिंह ने औरंगजेब की क्रूर नीतियों का विरोध किया इसलिए औरंगजेब ने उन्हें बंदी बनाकर उनकी जेल में हत्या करवा दी|

औरंगजेब ने हिन्दुओ पर जजिया नामक कर लगा दिया जिसे बिल्कुल पसंद नहीं किया गया|

लाहौर में औरंगजेब ने शाही मस्जिद का निर्माण करवाया एवं दिल्ली के लाल किले में मोती मस्जिद का निर्माण करवाया| अपने पिता के जैसे औरंगजेब कला प्रेमी था किन्तु उनके तरह दयालु एवं उदार नहीं था|

औरंगजेब के पास 337 मनसबदार थे जो अब तक रहे मुगल सम्राटों में सबसे ज्यादा माने जाते है|

अपने 50 वर्ष के शासन काल में औरंगजेब ने मुगल साम्राज्य को चोटी तक ले जाने के लिए हर सम्भव प्रयास किया एवं कभी समझौता नहीं किया न किसी के आगे झुका|

औरंगजेब कुरान को अधिक मानता था इसलिए उसने सिक्कों पर कलमा खुदवा दिया जिसने कई अन्य धर्मो के लोगों को नाराज कर दिया|

औरंगजेब की मृत्यु 1707 में स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण हुई| औरंगजेब के 5 पुत्र थे किन्तु उसने अपने सभी पुत्रों को शासन सम्बन्धित कोई प्रशिक्ष्ण नहीं दिया जिससे आगे चलकर उनमे से कोई भी मुगल सत्ता को सम्भाल नहीं सका एवं जल्द ही मुगल शासन का अंत नजदीक था एवं अन्य शासकों ने इस बात का फायदा उठाते हुए मुगल शासन को पूरी तरह से नष्ट कर दिया| इस प्रकार औरंगजेब को मुग़ल शासन का अंतिम शासक माना जाता है जिसके समय में मुगल शासन अपने चरम पर रहा|

झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई Jhansi ki Rani Laxmi Bai

बचपन एवं विवाह:

रानी लक्ष्मी बाई का जन्म का वास्तविक नाम ‘मणिकर्णिका’ था और प्यार से इन्हें मनु कहकर बुलाया जाता था| इनका जन्म मराठी ब्राह्मण परिवार में 19 नवम्बर 1828 ई. को उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी में हुआ था और मृत्यु 29 वर्ष की आयु में जून 1858 ई. को ग्वालियर के कोटा की सराय में हुई थी|

इनके पिता मोरोपंत ताम्बे मराठा में बाजीराव के दरबार में कार्यरत थे, इनकी माता भागीरथी साप्रे एक बुद्धिमान स्त्री थी| लक्ष्मी बाई जब अपनी आयु के चौथे वर्ष में थी तब उनकी माता का देहावसान हो गया था|

वर्ष 1842 ई. में झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से विवाह के सूत्र में जुड़कर मणिकर्णिका नेवालकर घराने की वधू और झाँसी क्षेत्र की रानी के पद पर विराजी|

विवाहोपरांत इन्हें लक्ष्मीबाई के नाम से संबोधित किया जाने लगा| वर्ष 1853 में इनके पति गंगाधर राव की शारीरिक स्थिति अत्यंत खराब होने के कारण इन्होने दत्तक पुत्र ग्रहण किया, जिसका नाम दामोदर राव ररखा| हालांकि इससे पहले 1851 ई. में लक्ष्मीबाई को पुत्र रत्न प्राप्ति हुई थी, परन्तु जन्म के चार माह में उसकी मृत्यु हो गई थी|

उस समय के दौरान ब्रिटिश सरकार के सरकार के दत्तक पुत्र ग्रहण करने से सम्बन्धित नियमो की पालना की गई, जिसमे ईस्ट इंडिया कम्पनी के राजनैतिक एजेंट मेजर एलिस की उपस्थिति में दत्तक ग्रहण की कागजी प्रक्रिया की गई|

महाराजा गंगाधर ने एलिस को अपनी लिखित वसीयत व् अन्य आवश्यक दस्तावेज सौंपकर इन्हें लार्ड डलहौजी तक पहुचाया|

रानी के पति की मृत्यु के बाद की विकट परिस्थितयां:

नवम्बर 1853 में गंगाधर राव की मृत्यु हो गई और अंग्रेजो ने इस विकट स्थिति का गलत फायदा उठाने के बारे में सोचा| तत्पश्चात 1854 ई. में ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल डलहौजी द्वारा राज्य हडप नीति अपनाई गई, जिसे अंग्रेज ‘डोक्ट्रिन ऑफ़ लेप्स’ कहते थे, जिसमे झाँसी राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में एकीकृत करने का निर्णय लिया गया और दामोदर राव को झाँसी का उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया गया|

इसके विरुद्ध लक्ष्मी बाई द्वारा अदालत की सहायता ली गई और ब्रिटिश वकील जॉन लेंग के साथ भी परामर्श किया गया, किन्तु वे अपने प्रयासों में सफल नहीं हो सकी और अंतत: 7 मार्च 1854 ई. को अंग्रेजो ने झाँसी राज्य व् इसके शाही खजाने पर कब्जा करके लक्ष्मी बाई को किले को छोड़कर जाने पर मजबूर कर दिया| इसके अलावा रानी लक्ष्मी बाई पर अपने पति गंगाधर राव द्वारा लिए गये कर्ज को चुकाने का भी आदेश जारी कर दिया गया|

इस कर्ज की कटौती इनके वार्षिक खर्चे में से देने का आदेश था| इसके बाद वे किला छोडकर रानी महल में रहने चली गई|

अंग्रेजो से टक्कर:

इसके बाद से लक्ष्मी बाई के मन में अपने राज्य को वापस लेने की इच्छा जागृत हुई और वे अपने पुत्र के अधिकारों व् अपने राज्य को लेकर चिंतित रहने लगी| रानी को यह बात समझ आने लगी थी कि बिना लड़ाई लड़े या बिना किसी संघर्ष के वे अपना राज्य वापस नहीं ले सकती, इसी विचार पर आगे बढ़ते हुए उन्होंने इस हेतु तैयारी करनी शुरू की|

सर्वप्रथम लक्ष्मी बाई ने एक स्वयं सेवी सेना बनाने की कोशिश प्रारंभ की, जिसमे स्त्रियों को भी शामिल किया गया और तलवार बाजी, शत्रु से सुरक्षा और युद्ध सम्बंधित अनेक गुर सिखाये जाने लगे|

सेना में झाँसी राज्य के साधारण नागरिको ने भी शामिल होने का साहस दिखाया| तब झलकारी बाई नाम की एक स्त्री को सेना प्रमुख बनाया गया, जिसका कारण यह था कि वह दिखने में रानी लक्ष्मी बाई जैसी थी, जो युद्ध के दौरान एक सकारात्मक पहलू सिद्ध हो सकता था|

समयावधि बीतने के साथ-साथ लक्ष्मी बाई के पुत्र की आयु 7 वर्ष की होने पर उनका उपनयन संस्कार करने की घड़ी आई, इस अवसर पर रानी लक्ष्मी बाई ने आसपास के राजाओं, महाराजाओं एवं मित्रगणों को आमंत्रित करने की सोची, ताकि वे अवसर के बहाने उनके साथ अपनी युद्ध नीति के सम्बन्ध में चर्चा कर सके और भविष्य में अपनी नीति संचालन के विषय में अन्य कुशल लोगों की राय प्राप्त कर सके|

उस समय राजसी बैठक में युद्ध सम्बन्धी विचार-विमर्श में तरह-तरह के सुझावों व् परामर्शों का आदान-प्रदान हुआ| तात्या टोपे भी तब अप्रत्यक्ष रूप से उनकी सहायता के लिए तत्पर थे|

समय के साथ-साथ रानी लक्ष्मी बाई की अपने राज्य को पाने की इच्छा प्रबल होती जा रही थी और वे अपने सेनाबल को मजबूत करने के लिए निरंतर कार्यरत थी| अब उनमे देशभक्ति की भावना दिनोदिन बढती जा रही थी|    

आखिर वर्ष 1858 ई. में वह समय आ गया था, जब ब्रिटिश सेना ने युद्ध करने के पथ पर आगे बढने की सोची और इस वर्ष की शुरुआत में जनवरी माह में ही अंग्रेजो की सेना ने युद्ध के उद्देश्य से झाँसी राज्य की तरफ अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए|

मार्च माह में ब्रिटिश सेना ने झाँसी तक पहुंचकर इसकी घेराबंदी कर ली और अंग्रेजो एवं लक्ष्मी बाई की सेना के मध्य युद्ध आरम्भ हुआ, जो लगभग 2 सप्ताह तक चला| लड़ाई के दौरान लक्ष्मी बाई अपने बेटे के साथ कालपी में तात्या टोपे तक पहुँच चुकी थी|

मई माह में अंत में रानी अपने सहयोगियों व् सेना के साथ ग्वालियर पहुंची और वहां के किले पर जीत हासिल की, तब जून माह में ब्रिटिश सेना भी सूचना मिलते ही वहां पहुंची और आक्रमण कर दिया| यह अंग्रेजो एवं लक्ष्मी बाई की सेना के मध्य अंतिम युद्ध था, जिसमे रानी स्वयं पूरे साहस के साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी एवं अपने साहस का परिचय देते हुए अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने पर विवश कर दिया|

रानी लक्ष्मी बाई के साहसी रवैये व् देश भक्ति को अंग्रेजो ने भी सराहा एवं इसी युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मी बाई अपने राज्य की रक्षा करते हुए वीर गति को प्राप्त हो गई|

आज इतिहास के पन्नो में हम रानी लक्ष्मी बाई के साहस व् वीर गाथा के बारे मे पढ़ते है| उन्होंने एक मर्द की तरह वीरता एवं दमखम दिखाते हुए जान हथेली पर रखकर ब्रिटिश सेना से टक्कर ली, इसलिए रानी लक्ष्मी बाई के लिए कहा जाता है, “खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी”| आज तक दुनिया उनके बलिदान को भुला नहीं सकी है और आज भी झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई इतिहास के पन्नो में अमर है|

पाषाण काल की विभिन्न अवस्थाएं Pashan Kaal ki Vibhinn Avasthaaye

पाषाण संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है पत्थर, यह उस समय का इतिहास है जब मानव पत्थरों पर अधिक आश्रित था एवं उसे चीजों के इस्तेमाल का ज्ञान न के बराबर ज्ञान था|

पाषाण काल को प्रागीतिहासिक या Pre-Historic काल भी कहा जाता है| पाषाण काल का समय 6 लाख ई.पूर्व के आसपास माना जाता है एवं उत्खननों द्वारा मिली जानकारी के आधार पर इसे तीन भागों में विभक्त किया गया है:-

पुरापाषाण काल Paleolithic Age

मध्य पाषाण काल Mesolithic Age

नव पाषाण काल Neolithic Age

पुरापाषाण काल का इतिहास:

पुरापाषाण काल के समय को लेकर अलग-अलग विद्वानों के अलग मत है| इसका समय 25 लाख साल से 12,000 पूर्व के बीच माना जाता है| इस समय में मानव आदिमानव के जैसे संघर्षपूर्ण हालातों में रहा करते थे, जैसे गुफाओं में रहना, पत्थर के औजार बनाना, आदि|

भारत में पुरापाषाण युग की खोज 1868 ई. में की गई थी जब चेन्नई के पास खोज व् खुदाई के दौरान पुरापाषाण काल के सबूत मिले| इसके बाद पूरे भारत में अलग-अलग स्थानों पर खुदाई की गई जिससे इस युग के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त हुई|

कैसा था पुरापाषाण काल में मानव जीवन:

खोजों के दौरान पत्थरों से बनी गुफाओं में मानव जीवन के संकेत मिले है जिसमे शिलाओं पर चित्र एवं चिन्ह उत्कीर्ण किये गये है| साथ ही पत्थर से बने औजार मिले है जिससे पता लगता है अभी मानव को लोहे या अन्य धातु का ज्ञान नहीं था, इससे सम्बन्धित कुछ बिंदु इस प्रकार है:-

रहन-सहन:

इस युग में मानव का जीवन खतरों से भरा हुआ था एवं खुद को बचाने के लिए उसने गुफाओं का सहारा लिया क्योकि बाहर उसे जंगली जानवरों से डर था एवं मौसम की मार भी उसे डराती थी| आदिमानव अपनी जगह बदलता रहता था एवं जहाँ उसे सुरक्षित महसूस होता उसी को अपना निवास बनाता|

औजार निर्माण:

खुदाई से मिले औजारों से यह साफ़ है कि उस समय मानव को हथियारों या औजारों की जानकारी नहीं थी क्योकि प्राप्त औजारों की बनावट अजीब एवं भद्दी है| प्रारंभ में शिकार को मारने के लिए पत्थर का इस्तेमाल किया जाता था धीरे-धीरे मानव ने पत्थर को शेप देना एवं नुकीला बनाना सीखा एवं हथौड़ा, कुल्हाड़ी, चाकू आदि बनाये|

आहार:

इस युग में मानव को खेती करना नहीं आता था एवं प्रारंभ में उसने कंदमूल खाकर गुजारा किया किन्तु जल्द ही उसने दूसरे जानवरों का मांस खाना शुरू किया चूँकि मानव को आग का ज्ञान नहीं था इसलिए वह कच्चा मांस ही खाता था|

पहनावा:

पहले तो मानव पत्ते, पेड़ की छाल पहनता था किन्तु इससे ठण्ड से बचाव नहीं हो पाता था इसलिए वह जानवरों की खाल पहनने लगा|

आग की खोज:

अब इस युग में आग की खोज की गई हालंकि यह साफ़ नहीं कि मानव ने इसे कैसे खोजा होगा| आग की खोज ने मनुष्य के जीवन को सुगम बनाया क्योकि जंगली जानवर आग से डरते थे एवं मांस पकाने के लिए यह अच्छा स्त्रोत था|

मृतक संस्कार:

खुदाई में मिले कंकालों से पता लगता है कि पुरापाषाण काल में मानव अपने मृतकों को दफनाते थे एवं उसके साथ खाद्य सामान रखते थे शायद वे पूर्वजन्म में विश्वास करते थे|

कला का ज्ञान:

इस समय में मानव को चित्र बनाना, एवं शिलाओं पर चित्र उकेरना अच्छे से आने लगा था जिसका सबूत गुफाओं में मिले चित्रों से एवं शिलाओं पर बने जानवरों के चित्रों से प्राप्त होता है|

मध्य पाषाण काल का इतिहास:

इस युग में मानव ने शिकार करना अच्छे से सीख लिया था एवं जानवरों को भी पालतू बनाने लगा था| खनन के दौरान कई तरह के पत्थर से बने औजार हाथ लगे है जो पहले के युग की तुलना कही अधिक परिष्कृत थे|

ये हथियार पत्थर से बने है एवं कई में लकड़ी का बना हैंडल भी लगा हुआ है|

इस काल में मानव मछली पकड़ना एवं मांस को अच्छे से पकाकर खाने लगा था| रहने के लिए वह अभी भी गुफाओं पर आश्रित था एवं धनुष बाण एवं मछली पकड़ने के कांटो का इस्तेमाल करना भी सीख लिया था|

मध्य पाषाण काल में मानव ने कुत्ते को पालतू के रूप में रखना शुरू किया एवं शिकार में उससे सहायता लेने लगा|

नव पाषाण काल का इतिहास:

नव पाषाण काल मानव की उन्नति एवं सूझ-बुझ का युग था जिसके अवशेष पूरे भारत के विभिन्न क्षेत्रों से मिले है| इसमें बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, कश्मीर, असम, मध्य प्रदेश, चेन्नई, गुजरात आदि सभी जगहों से नव पाषाण काल के अवशेष प्राप्त हुए है|

औजार एवं कृषि:

इस युग में हथियारों के निर्माण में काफी उन्नति हुई अब बेडोल औजारों की जगह चमकदार, मजबूत, एवं नुकीले औजार बनाये जाने लगे

ये औजार न केवल शिकार को मारने का काम करते थे बल्कि रोजमर्रा के कामों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे|

पशुपालन एवं कृषि:

अब मानव ने कुत्ते के साथ-साथ गाय, बकरी, भेड़, ऊंट आदि को पालना शुरू कर दिया| इसी युग में कृषि करने के लिए हल खोजा गया| इस युग को सबसे क्रांतिकारी माना गया है क्योकि अब मानव सिर्फ शिकार पर आश्रित न होकर कृषि करने लगा था जिसमे चावल, गेहूं, बाजरा, कपास, मक्का आदि की फसलें उगाना उसे आने लगा था|    

आहार:

इस युग में मानव ने अपने आहार में काफी परिवर्तन किये एवं पशुओं से दूध निकालना एव उससे विभिन्न चीजे बनाना सीख लिया था| अनाज पीसने के लिए पत्थर के उपकरण बनाये गये| गेहूं, बाजरा, मक्का, जौ आदि खाद्य सामग्री के मुख्य अंग थे|

वस्त्र एवं बर्तन निर्माण:

जहा पुरापाषाण युग में मानव पत्ते पहनता था वहीं नव पाषाण काल में उसने रेशों से कपड़ा बनाना सीखा| खुदाई में मिले करघे एवं कपड़े बुनने के समान से ज्ञात होता है कि अब वह अच्छे कपड़े पहनने लगा था एवं कपास की खेती भी इसलिए की जाती थी|

मिटटी के कई प्रकार के बर्तन उत्खनन के दौरान प्राप्त हुए है जिससे उनके बर्तन बनाने की उच्च कला के बारे में पता लगता है|

बड़े चाक या पहिये का अविष्कार भी इसी युग में किया गया जिससे बड़े-बड़े बर्तन बनाये गये ताकि अनाज संग्रहित करके रखा जा सके| इस युग के लोग धार्मिक थे एवं प्रक्रति की पूजा करते थे एवं मातृदेवी की उपासना के प्रमाण भी मिले है|