पानीपत का युद्ध Panipat ka Yudh

भारत का इतिहास अत्यधिक बड़ा व विविधताओं वाला है| प्राचीन होने के कारण यह रुचिकर है और प्रसिद्ध भी| आज के इस लेख में हम पानीपत के युद्ध के बारे में बताएँगे|

पानीपत के युद्ध इतिहास में अपनी अलग छवि के नाम से प्रसिद्ध है| अभी तक के इतिहास में पानीपत के तीन युद्ध हुए है| प्रथम व द्वितीय युद्ध सन 1500 इस्वी के काल में और सन 1700 इस्वी के काल में तीसरा व अन्तिम युद्ध पानीपत के मैदान में हुआ| प्रत्येक युद्ध अपना अलग महत्व एवं भूमिका रखता है| पानीपत के तीन युद्ध ये है:

प्रथम युद्ध- बाबर एवं इब्राहीम लोदी के मध्य  

द्वितीय युद्ध- बैरम खान एवं हेमू के मध्य

तृतीय युद्ध- मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली के मध्य

पानीपत का प्रथम युद्ध- बाबर व् इब्राहीम लोदी:

21 अप्रैल 1526 को आज के समय में हरियाणा कहे जाने वाले राज्य के एक छोटे से गाँव पानीपत में बाबर और इब्राहीम लोदी के मध्य लड़ा गया| इसी युद्ध के फलस्वरूप भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना की शुरूआत हुई|

इस युद्ध में पहली बार बारूद एवं आग से बने हथियारों का प्रयोग किया गया था एवं काफी बड़े पैमाने पर नए शस्त्रों का इस्तेमाल किया गया|

बाबर काबुल का एक शक्तिशाली शासक था जिसका पूरा नाम जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर था| इब्राहीम लोदी उस समय दिल्ली सल्तनत पर राज कर रहा था|

हरियाणा राज्य के कई हिन्दू राजा इस युद्ध में शामिल हुए एवं ग्वालियर के कई राजा इब्राहीम लोदी की तरफ से युद्ध में सम्मिलित हुए|

बाबर ने इस युद्ध में तुलुगुमा युद्ध पद्धति अपनाई, जो अन्य युद्ध नीतियों में से एक उत्तम युद्ध प्रणाली मानी जाती है|

इब्राहीम लोदी की सेना में लगभग एक लाख लोग सम्मिलित थे, जबकि बाबर की सेना में 20,000 के करीब सैनिक मौजूद थे एवं यह काफी बड़ा अंतराल था फिर भी इस युद्ध में जीत बाबर की हुई|

युद्ध का परिणाम:

सेना के एक विशाल अंतराल होने के बावजूद मुग़ल साम्राज्य एवं दिल्ली सल्तनत के बीच हुए इस युद्ध में बाबर अपनी कूटनीति एवं युद्ध नीति के कारण विजयी हुआ|

इस युद्ध के बाद बाबर ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया एवं मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक के रूप में जाना जाने लगा|

पानीपत का द्वितीय युद्ध- बैरम खान एवं हेमू:

5 नवम्बर 1556 ई. को पानीपत के मैदान ने फिर से एक विशाल युद्ध देखा, जो कि अकबर के सेनापति बैरम खान एवं आदिलशाह के सेनापति हेमू जिसका पूरा नाम हेमचन्द्र विक्रमादित्य के मध्य लड़ा गया|

युद्ध की पृष्ठभूमि:

1556 में मुग़ल साम्राज्य के द्वितीय शासक हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसके पुत्र अकबर ने बहुत ही कम आयु तेरह वर्ष में मुग़ल सत्ता अपने हाथ में ली, किन्तु उस समय उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी, इसलिए बैरम खान उनके सरंक्षक के रूप में सामने आया|

हेमू उस समय अफगान शासक आदिलशाह के सेनापति के पद पर कार्यरत था एवं हुमायु की मृत्यु का लाभ उठाते हुए उत्तर भारत पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया एवं दक्षिण के तरफ भी कई युद्ध जीते|

6 अक्तूबर के दिन हेमू ने दिल्ली की लड़ाई में 3000 मुग़ल सैनिको को मौत के घाट उतार दिया, जिससे मुगलों में आक्रोश उत्पन्न हो गया एवं बैरम खान ने हेमू को ईट का जवाब पत्थर से देने की ठानी| हालंकि अकबर इस युद्ध के पक्ष में नहीं था|

अंतत: पानीपत के प्रथम युद्ध के 30 वर्ष बाद फिर से एक और युद्ध का ऐलान किया गया| दोनों सेनाएं 5 नवम्बर को पानीपत के मैदान में आमने-सामने आई एवं इस युद्ध में भी मुगलों का सैनिक बल कम था|

युद्ध के परिणाम:

इस युद्ध में बैरम खान विजयी हुआ एवं हेमू को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा| हेमू का सिर धड से अलग करके दिल्ली के दरवाजे पर टांग दिया गया एवं बाकी शरीर को दिल्ली के पुराने दुर्ग पर लटका दिया गया, जिससे अन्य विद्रोहियों के मन मे मुगलों के प्रति भय पैदा हो सके|

अकबर ने एक बार फिर दिल्ली सल्तनत को अपने हाथ में लिया और साथ ही अन्य विद्रोहियों को पकड़कर उन्हें भी मौत की सजा सुनाई गई|

युद्ध के कुछ समय बाद हेमू के पिता को भी अलवर से गिरफ्तार करके उन्हें भी मार दिया गया|

पानीपत का तृतीय युद्ध- मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली:

यह युद्ध मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ एवं दुर्रानी साम्राज्य के शासक एवं संस्थापक अहमदशाह अब्दाली के बीच 14 जनवरी 1761 ई. में लड़ा गया|

अहमदशाह अब्दाली अफगान शासक था, जो कई बार भारत आ चुका था| इसी समय पंजाब का सूबेदार किसी लड़ाई में बूरी तरह परास्त हुआ, जिससे दिल्ली साम्राज्य ने पंजाब को अफगान के हवाले कर दिया और अब्दाली ने पिछले सूबेदारों को हटाकर अपने अधिकारयों को उनका पद दे दिया एवं अफगान लौट गया|

अब्दाली की गैर मौजूदगी का लाभ उठाकर मराठो ने पंजाब पर हमला कर दिया एवं लाहौर पर कब्जा कर लिया| इसी बात से नाराज होकर अब्दाली ने मराठा साम्राज्य से युद्ध करने की योजना बनाई|

इस युद्ध में पेशवा बालाजी बाजीराव ने अपने सेनापति सदाशिव राव के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी एवं 14 जनवरी को दोनों सेनाएं पानीपत के मैदान में आमने-सामने इकठी हुई|

युद्ध के परिणाम:

इस युद्ध में काफी नुक्सान के साथ मराठों की बुरी तरह से हार हुई| इस हार का कारण ये था कि अब्दाली का सैनिक बल मजबूत था और उत्तरी भारत के सभी मुस्लिम शक्ति ने अब्दाली का साथ दिया| इसके अलावा मराठाओं द्वारा पंजाब पर आक्रमण करने की वजह से वहाँ के सिख व् राजपूत सैनिकों ने भी मराठा के विरुद्ध होकर लड़ाई लड़ीं व मराठा सेना के मध्य संगठन शक्ति व समता की कमी भी पराजय का कारण बनी|  

निष्कर्ष:

युद्ध की विजय या पराजय सेनानायक व सैनिकों की कुशलता, बुद्धिमता व युद्धनीति पर निर्भर करती है| ऊपर दिए गए उल्लेख में यह तथ्य तो सिद्ध हो ही गया कि केवल सैनिकों की संख्या अधिक होने से विजय हासिल नहीं की जा सकती|  

हमारा इतिहास काफी गौरवपूर्ण रहा है| हालांकि कभी कहीं नुकसान झेलना पड़ा तो कहीं लाभ भी हुआ| इतिहास के कुछ पन्ने भयभीत व निराश करने वाले हैं तो कुछ गर्व महसूस करवाने वाले| परन्तु हार व जीत का सिलसिला हमेशा से चलता आया है और चलता रहेगा|   

तुगलक वंश एवं दिल्ली सल्तनत Tughlak Vansh Evm Delhi Saltnat

तुगलक वंश ने दिल्ली सल्तनत पर काफी समय तक शासन किया एवं इसमें तीन शासक ऐसे हुए जिन्हें आज भी उनकी नीतियों एवं कार्यों के कारण जाना जाता है| तुगलक वंश का शासन काल 1320 से लेकर 1414 तक माना गया है|

खिलजियो के अंत के साथ ही दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश का राज शुरू हुआ एवं इसके अनेक महान शासकों में से तीन प्रमुख शासक थे:-

गयासुद्दीन तुगलक

मुहम्मद बिन तुगलक

फिरोज शाह तुगलक

गयासुद्दीन तुगलक 1320-1325

तुगलक गाजी या गाजी मालिक के नाम से प्रसिद्ध गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलक वंश की स्थापना की| गयासुद्दीन का शासनकाल 5 वर्ष तक चला एवं यह पहला ऐसा सुल्तान था जिसने अपने नाम के साथ ‘गाजी’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है काफ़िरो को मारने वाला|

गयासुद्दीन ने कुल 29 वार मंगोल सेना द्वारा किये गये आक्रमण को विफल कर दिया एवं उन्हें दिल्ली में प्रवेश करने से रोके रखा एवं कैदियों के प्रति सख्त रुख अपनाया| गयासुद्दीन तुगलक के शासनकाल में तुगलकाबाद किले का निर्माण कार्य शुरू हुआ एवं उसने 1323 में अपने बेटे मुहम्मद बिन तुगलक को गद्दी का भार सौंप दिया|

गयासुद्दीन तुगलक द्वारा किये गये सुधार:
गयासुद्दीन ने कई आर्थिक सुधार किये जिसमे उसने ‘रस्म-ए-मियान’ यानी सख्ती एवं नरमी के बीच का संतुलन वाली नीति अपनाई|

उसने उपज में से लिए जाने वाले लगान कर को कम कर दिया एवं जमीदारों को उनके पुराने अधिकार वापस लौटा दिए|

इसने कई नहरों का निर्माण करवाया जो सिंचाई कार्य में काम आती थी एवं नहरे बनवाने का श्रेय सर्वप्रथम गयासुद्दीन तुगलक को दिया जाता है| इसके साथ ही इसने कई बाग़, किले, एवं सड़के भी बनवाई|

गयासुद्दीन के समय में डाक व्यवस्था काफी अच्छे स्तर पर थी एवं उसने अलाउद्दीन द्वारा लागू कठोर नीतियों में नरमी अपनाई|

चूँकि गयासुद्दीन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था एवं कठोर इस्लाम धर्म में यकीन रखता था अत: वह अपनी जनता से भी ऐसी ही कामना रखता था|

मृत्यु:

1325 में गयासुद्दीन तुगलक बंगाल अभियान से लौट रहा था एवं रास्ते में विश्राम के लिए एक लकड़ी से बने महल में रुका जिसकी नीव काफी कमजोर थी एवं वह ध्वस्त हो गया जिसमे दबने के कारण गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु हो गई|

मुहम्मद बिन तुगलक 1325-1351

गयासुद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गद्दी पर विराजमान हुआ उसका वास्तविक नाम जूना खान था एवं गद्दी पर बैठने के बाद उसे मुहम्मद बिन तुगलक की उपाधि धारण की| तुगलक वंश के सभी शासकों में मुहम्मद बिन तुगलक सबसे अधिक शिक्षित एवं योग्य शासक के रूप में जाना जाता है|

कई इतिहासकार उसे पागल या सनकी शासक के रूप में देखते है क्योकि इसने कुछ इसे काम किये जो अजीब प्रतीत होते थे| गद्दी पर बैठने के बाद मुहम्मद ने कई व्यक्तियों को अनेक उपाधियों से शोभित किया| जैसे इसने मालिक कबूल को ‘वजीर-ए-मुमालिक’ का पद देकर उसे ‘खान-ए-जहाँ’ की उपाधि से शोभित किया|

मुहम्मद बिन तुगलक ने बिना किसी पक्षपात के सभी योग्य अधिकारीयों को उनकी कार्यक्षमता एवं दक्षता के आधार पर पद सौंपे| जूना खान कई प्रकार की कलाओं में निपुण था एवं उसे चिकित्सा, खगोल शास्त्र, ज्योतिष विज्ञानं, गणित आदि कलाओं एव् विषयों में रूचि थी|

मुहम्मद बिन तुगलक ने नस्ल भेदभाव को पूरी तरह समाप्त कर दिया किन्तु फिर भी उसे इतिहास में वह योग्य स्थान नहीं प्राप्त हो पाया जिसका वह सच्चा हकदार था|

मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियाँ:

दिल्ली सल्तनत का सबसे ज्यादा विस्तार मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में हुआ उस समय दिल्ली साम्राज्य 23 भागों में विभाजित था जिसके अंतर्गत गुजरात, बिहार, लाहौर, कन्नौज, दिल्ली, उड़ीसा, मुल्तान, कश्मीर, जाजनगर, एवं बलूचिस्तान सम्मिलित थे|

कर वृद्धि एवं सांकेतिक मुद्रा चलवाना:

तुगलक ने दोआब क्षेत्रों के करो में वृद्धि कर दी किन्तु प्रक्रति ने उसका साथ नहीं दिया एवं उस वर्ष अकाल की स्थिति पैदा हो गई जिससे दोआब वसूल करने के लिए जनता को विवश किया गया जिससे जनता में क्रोध पैदा होने लगा|

इसके साथ मुहम्मद बिन तुगलक ने दोकानी नामक मुद्रा का प्रचलन करवाया जिसे सांकेतिक मुद्रा भी कहा जाता है एवं इसी कृत्य के लिए तुगलक को सबसे ज्यादा अपमान झेलना पड़ा| उसने ताम्बे एवं पीतल के सिक्के चलवा दिए जिनकी कीमत चांदी के सिक्को के बराबर मानी जानी थी|

इस योजना के बाद लोगों ने घरों में ही नकली टकसाल बनानी आरम्भ करदी एवं जल्द ही उसे रद्द कर दिया गया|

राजधानी परिवर्तन:

इसने दिल्ली से अपनी राजधानी को देवगिरी में परिवर्तित कर दिया जिसका नाम इसने कुतुबबाद रखा एवं इस कार्य के लिए भी इसे काफी आलोचना झेलनी पड़ी|  

मृत्यु:

गुजरात में चल रहे विद्रोह को खत्म करके सिंध की और बढ़ते हुए रास्ते में सुल्तान गंभीर रूप से बीमार होंने के कारण मार्च 1351 को मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गई|

फिरोजशाह तुगलक 1351-1388:

फिरोजशाह तुगलक भी तुगलक वंश का अच्छा शासक माना जाता है एवं यह 45 वर्ष की उम्र में दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना| इसने शरियत के नियमो को राज्य में लागू किया एवं सभी अनावश्यक करों को खत्म कर दिया|

फिरोजशाह तुगलक के महत्वपूर्ण कार्य:

4 करों को छोडकर फिरोजशाह ने 24 करों को खत्म कर दिया| सिंचाई पर सुल्तान ने केवल एक कर लगाया जो उपज का 1/10 भाग वसूलना था|

किसानों को सिंचाई में दिक्कत न ही इसलिए इसने 5 बड़ी नहरों का निर्माण करवाया एवं 1200 उद्यानों का निर्माण करवाया|

नये नगर बनाये गये एवं एक सरकारी अस्पताल का निर्माण करवाया गया जहाँ मुफ्त चिकित्सा प्रदान करवाई जाती थी|

इस समय दास प्रथा का काफी प्रचलन था एवं दासों की संख्या 2 लाख के पास पहुँच गई थी| केवल दासों की देखभाल हेतु ‘दीवान-ए-बन्दगान’ की स्थापना की गई|

गरीब लाचार एवं विधवा महिलाओ के लिए ‘दीवान-ए-खैरात’ नामक समुदाय की स्थापना की गई जो हर तरह से उनकी सहायता करता था|

सम्राट अशोक द्वारा स्थापित शिलालेखों को दिल्ली में लाकर स्थापित किया गया एवं आन्तरिक व्यापार को बढ़ाने हेतु कई योजनाये बनाई गई|

मृत्यु:

सितम्बर 1388 में फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु हो गई एवं इसकी मौत के बाद मोहम्मद खान दिल्ली की गद्दी पर बैठा किन्तु वह अधिक समय तक शासन नहीं कर पाया एवं जल्द ही उसकी हत्या कर दी गई|

मोहनजोदड़ो सभ्यता का उद्भव एवं विनाश MohanjoDaro Sabhyta ka Udbhav evm Vinash

सिन्धु घाटी सभ्यता का नाम तो आप सभी ने सुना ही होगा, इसी सभ्यता से जुड़ा एक नगर है-मोहनजोदडों। आज से लगभग 2600 ईसा पूर्व इस नगर का विकास हुआ था। इसके भिन्न-भिन्न उच्चारण हैं- मुअन जोदडों, मोहनजोदरों, मोहेंजो दारों। सिन्धी भाषा के इस शब्द का मतलब है- ‘मुर्दों का टीला’। यह दुनिया के प्राचीनतम नगरों में से एक माना जाता है। यह पाकिस्तान में सिन्धु नदी के पास पश्चिम की तरफ़ बसा एक नगर है। यह सिन्ध के लरकाना ज़िले के क्षेत्र में आता है। आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व राखालदास बनर्जी द्वारा यह नगर खोजा गया था।

संरचना व निर्माण

मोहनजोदडों को एक व्यवस्थित शहर की संज्ञा दी जाती है। पक्की ईंटों व मज़बूत दीवारों के बने घर यहाँ आज भी स्थित हैं। स्नानगृह व कुएँ तथा जल के निकास के लिये नालियों की भी व्यवस्था थी। आवागमन के लिए बड़ी-चौड़ी सड़कें भी बनाई गयी थीं, जो कि आज भी वैसे ही मौजूद हैं।

यहाँ एक ओर स्थान प्रसिद्ध है, जिसे कुछ लोग विशाल स्नानगृह कहते हैं और कुछ वृहत जल कुंड के नाम से बताते हैं। यह 8 फुट गहराई, 24 फुट चौड़ाई व 30 फुट लम्बाई वाला स्तंभों से घिरा हुआ है। यह अत्यन्त पक्की ईंटों से बनाया गया है और इसके दो तरफ़ सीढ़ियाँ बनी हैं। इससे सटी पानी निकलने के लिए बनाई गयी नालियाँ भी कच्ची मिट्टी की नही हैं और उन्हें ढका भी गया है।

इस नगर में भिन्न-भिन्न स्थानों व कुंड का निर्माण काफ़ी समझदारी व मेहनत के साथ किया गया था। इससे हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय केवल स्त्रोतों की कमी थी, परन्तु लोग काफ़ी  बुद्धिमान हुआ करते थे और कार्य भी पूरी क्षमता के साथ करते थे। निर्माण विधि देखकर यह सिद्ध होता है कि गणित और विज्ञान से भी अवगत थे।

ख़ुदाई में मिले तथ्य

vintage pottery on wooden surface

आज तक मोहनजोदडों के लगभग एक तिहाई क्षेत्र को खोदा जा चुका है। यह तो सर्व विदित ही है कि यहाँ सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष मिले थे। इसके अतिरिक्त ख़ुदाई में कुछ ऐसी चीज़ें मिली हैं, जिनसे यह प्रतीत होता है कि उस समय नगर के लोग कृषि कार्य भी करते थे और पशु भी पालते थे। देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई और कुछ चित्रात्मक छापे भी मिली, जो शायद किसी भाषा के रूप मे प्रयोग की जाती होंगी। यहाँ एक स्थान ऐसा भी खोजा गया, जहाँ रंग का इस्तेमाल होता था। यह कपड़ों की रंगाई या किन्ही वस्तुओं की रंगाई का हो सकता है।

संगीत व गाने-बजाने के कुछ सामान मिले, जो इस ओर इंगित करते हैं कि इस सभ्यता के लोग नाचने-गाने से अपना मनोरंजन करते होंगे। यहाँ कुछ ऐसे चीजें भी पायी गई, जिसमें चारकोल का इस्तेमाल किया गया था।  कांसे के बर्तन व मूर्तियाँ, मुहर, सिक्के व अन्य मुद्राएँ, शीशा, खेलने के सामान, मिट्टी के सामान, औज़ार, गहने, गेहूँ पीसने की चक्की आदि अनेक प्रकार की वस्तुएँ मिली, जो कि आज के समय में लोगों के देखने के लिये अजायबघर में संग्रहित कर दी गयी। 

विस्मित कर देने वाली बात यह है कि इतने सारे अवशेषों में किसी भी हथियार का कोई सबूत नही मिला। मानो उस समय में नगर के लोगों द्वारा या राजा के द्वारा हथियारों का प्रयोग ही नही किया जाता था।

किसी प्रकार की हिंसा होती ही नही होगी, न दण्ड देने के लिये कोई हथियार थे। यह काफ़ी सकारात्मक पहलू सिद्ध होता है, जो कि मोहनजोदडों की शान्त व परोपकारी शासनकाल और अहिंसा व आपसी स्नेह व भाईचारे वाली संस्कृति की ओर इशारा करता है। आज भी विशेषज्ञ इस विषय पर कार्य कर रहे हैं।

पूर्णतः इसे भी सत्य नही माना गया क्योंकि अभी तक इस नगर की ख़ुदाई का कार्य अधूरा है। यह भी सम्भव है कि आगे कोई ऐसे सबूत मिल जाये, जो आज की हमारी इस विचारधारा में परिवर्तन कर दे।

आज की स्थिति

मोहनजोदडों आज बसा हुआ नगर नही है, परन्तु इसकी गालियाँ व सड़कें आज भी विचरण के लिये मौजूद हैं और घर व इमारतों की दीवारें पुरानी होकर खंडहर बन गयीं है, लेकिन यह वहाँ की सभ्यता व विकास को आज भी ज़ाहिर करती हैं। दोनों ओर घर व बीच में सड़क की चौड़ाई इतनी है कि आसानी से दो बैलगाड़ियाँ गुजर सकती हैं। यहाँ एक ओर विशेष बात यह भी देखी गयी कि घरों के दरवाज़े मुख्य सड़कों पर न होकर भीतर की गलियों की तरफ खुलते हैं। यह नगर टेढ़ा-मेढ़ा व संकरी गलियों वाला न होकर पूरे प्रबंधित तरीक़े से निर्मित किया गया था। 

सभ्यता का विनाश

मोहनजोदडों की सभ्यता का विनाश होने के सही कारणों का पता आजतक नही चल पाया है। इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। खोजकर्ताओं के अपने ज्ञान के आधार पर इसके अंत के अनेक कारण बताए जा चुके हैं। 

कुछ विद्वान कहते हैं कि पृथ्वी की भीतर संरचना में हुए बदलावों के कारण वहाँ की जलवायु परिवर्तित हुई। तब अकाल पड़ने से यह क्षेत्र सूखा ग्रस्त हो गया और इसी वजह से धीरे-धीरे लोग मरने लगे और सभ्यता ख़त्म हो गयी। 

वहीं दूसरी ओर कुछ कहते हैं कि जलवायु और भौगोलिक परिवर्तन होने से पृथ्वी में हलचल हुई और भीषण भूकम्प आने के कारण मोहनजोदडों का विनाश हुआ।

इसके अतिरिक्त कुछ शोधकर्ताओं ने यह बात भी कही कि इस नगर की खुदाई के समय कुछ मानव कंकाल पाए गये और जाँच के परिणाम स्वरूप उन कंकालों पर रेडियोधर्मी किरणों के परिणाम पाये गये। परन्तु उस समय परमाणु विस्फोट होने के आसार उचित प्रतीत नही होते। लेकिन यह भी कहा गया कि हो सकता है कि महाभारत के युग में युद्ध के दौरान ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया गया होगा और ब्रह्मास्त्र को परमाणु बम के समान ही माना जाता था, जिसमें किसी भी सभ्यता का विनाश करने की शक्ति होती थी।

महाभारत काल के लगभग 1000-1100 वर्षों के पश्चात् ही मोहनजोदडों का विकास हुआ और वहाँ ब्रह्मास्त्र का असर तब भी मौजूद रहा होगा। परन्तु अभी तक इसकी सत्यता प्रमाणित नही हुई है। 

इतने अध्ययन के पश्चात् यही निष्कर्ष निकलता है कि आजतक मोहनजोदडों के विनाश की असलियत सामने नही आयी है। अभी तक इस नगर की ख़ुदाई पूरी नही हुई है और इसके विकास व विनाश सम्बन्धी विषयों पर आज़ भी खोज कार्य व चर्चा जारी है|

वीर छत्रपति शिवाजी Veer Chatrpati Shivaji

मराठा साम्राज्य की नीव रखने वाले भारत के महान सम्राटों में से एक नाम वीर शिवाजी का भी सम्मिलित किया गया है| इन्होने अपने समय में कई युद्ध किये एवं हर बार अपनी वीरता का परिचय देते हुए किसी के सामने घुटने नहीं टेके|

शिवाजी ने कई युद्ध प्रणालियाँ भी विकसित की, जो काफी प्रसिद्ध हुई एवं हिन्दू संस्कृति को नए आयाम दिए| आज हम वीर छत्रपति शिवाजी के विषय में विस्तारपूर्वक जानेंगें|

प्रारम्भिक जीवन:

शिवाजी का जन्म 1627 में पुणे के पास स्थित शिवनेरी दुर्ग में हुआ था| हालांकि कुछ इतिहासकार इनका जन्म 1630 में मानते है| इनके पिता का नाम शाहजी भोंसले एवं माता का नाम जीजाबाई था| इनका एक और बड़ा भाई जिसका नाम सम्भाजी था|

शिवाजी ने अपना बचपन का अधिक समय माता के साथ गुजारा एवं उनके बड़े भाई ने पिता के साथ| बचपन से ही शिवाजी वीर एवं साहसी थे और गुलामी एवं अपने से नीचे वर्ग के प्रति बुरा बर्ताव उन्हें बेचैन कर देता था|

शिवाजी ने सईबाई निम्बालकर के साथ 1640 में विवाह किया एवं उसके बाद उन्होंने 7 विवाह और किये, जो की मराठा राज्य को एकजुट करने के लिए किये गये थे|

कुछ इतिहासकार मानते है कि शिवाजी ने अपने समय में मुस्लिमो का विरोध किया, जबकि यह बात सत्य प्रतीत नहीं होती, क्योकि तथ्यों के अनुसार शिवाजी के राज्य में कई अच्छे मुस्लिम सेनानायक थे, जिनके साथ शिवाजी के उत्तम सम्बन्ध रहे|

शिवाजी ने 1674 में अपने राज्याभिषेक के दौरान ‘छत्रपति’ की उपाधि धारण की| शिवाजी ने सबसे पहले छापामार युद्ध पद्धति या गुर्रिल्ला युद्ध प्रणाली को विकसित किया|

किलों पर विजय प्राप्त करना:

शिवाजी के शासनकाल के समय बीजापुर मुगलों के आतंक से परेशान था एवं वहां का सुल्तान भी काफी क्रूर था, जिसका नाम आदिलशाह था| आदिलशाह की सेहत खराब होने पर शिवाजी ने मौके का लाभ उठाया एवं बीजापुर के किले रोहिदेश्वर दुर्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया|

इसके बाद शिवाजी ने तोरणा दुर्ग जो कि यहाँ से 30 किमी. दूरी पर था, उसपर भी राजनितिक सूझ से अधिकार कर लिया| इसके बाद इन्होने राजगढ़ के किले पर अपना अधिकार कर लिया एवं शिवाजी के लगातार दुर्ग जीतने से आदिलशाह क्रोधित हो गया एवं उसने शिवाजी के पिता को बंधी बना लिया|

शिवाजी ने अपने आसपास के लगभग 23 किलों पर एकाधिकार कर लिया| शिवाजी के पिता को बंदी बनाये जाने के बाद शिवाजी को विवश किया किया गया कि वे बीजापुर के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाएंगे एवं उनके मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, जिसे मजबूरी में शिवाजी को मानना पड़ा|

मुगलों से टक्कर:

बीजापुर के साथ-साथ शिवाजी के कड़े दुश्मन थे मुग़ल| शिवाजी के समय औरंगजेब केवल एक सूबेदार था एवं आदिलशाह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया एवं शिवाजी ने इससे खफा होकर औरंगजेब पर धावा बोल दिया, जिससे औरंगजेब नाराज हो गया क्योकि वह शिवाजी से मैत्री की उम्मीद रखता था|

अपने पिता शाहजहाँ के कहने पर औरंगजेब ने बीजापुर से संधि करना स्वीकार कर लिया, किन्तु जल्द ही उसने कूटनीति दिखाते हुए अपने ही पिता को बंदी बना लिया एवं स्वयं मुगल सिहांसन पर विराजमान हो गया|

शिवाजी ने जल्द ही कोंकण क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाया एवं कई अन्य स्थानों को भी मराठा साम्राज्य में मिला लिया|

शिवाजी की बढती हुई शक्ति से औरंगजेब को चिंता होने लगी थी, इसलिए उसने दक्षिण में अपने मामा सूबेदार शाइस्ता खान को भेजा, जिसने वहाँ जाकर काफी लूट मचाई| शाइस्ता जल्दी ही अपने डेढ़ लाख सैनिको के साथ पूना पहुँच गया एवं चाकन व सुपन के किलों पर अपना अधिकार कर लिया|

शिवाजी को जब इस बात की सूचना मिली तो उन्होंने मावलों के साथ रात को शाइस्ता के कबीले पर हमला बोल दिया, जिसमे शाइस्ता किसी तरह बचकर भाग निकला, किन्तु उसकी 4 उंगलिया कट गई| इसके बाद औरंगजेब ने उसे वहाँ से हटाकर बंगाल का सूबेदार नियुक्त कर दिया|

मुगलों से संधि का प्रस्ताव भेजना:

शाइस्ता खान द्वारा 6 साल तक लूटपाट करने के बाद शिवाजी को धन का काफी नुकसान हुआ, जिसकी भरपाई करने के लिए शिवाजी ने धनी व्यापारियों को लूटना आरम्भ कर दिया|

उस समय सूरत समृद्ध नगर था, जो कि बन्दरगाह होने के कारण व्यापार का प्रमुख केंद्र भी था एवं शिवाजी ने यही से अपनी लूट की शुरुआत की जो 6 दिन तक चली|

शिवाजी की इस हरकत ने औरंगजेब को क्रोधित कर दिया एवं उसने नए सूबेदार गयासुद्दीन को सूरत में नियुक्त किया| औरंगजेब के आदेश पर राजा जयसिंह ने अन्य सामंतों के साथ मिलकर शिवाजी पर आक्रमण कर दिया, जिससे शिवाजी को काफी नुकसान उठाना पड़ा एवं उन्होंने मुगलों के पास संधि का प्रस्ताव भेजा|

यह संधि 1665 में की गई, जिसके अंतर्गत शिवाजी अपने 23 किले मुगलों को देंगे एवं 12 स्वंय रखेंगे| शिवाजी को हर वर्ष 5 लाख हूण राजस्व के रूप में मुगल खजाने में जमा करवाने होंगे|

शिवाजी मुगल दरबार से दूर रह सकते है, किन्तु उनके पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार की खिदमत में हमेशा उपस्थित रहना पड़ेगा|

संधि के अनुसार शिवाजी को हमेशा बीजापुर के किसी भी विरोध में मुगलों का साथ देना होगा|

शिवाजी की मृत्यु:

शिवाजी की मृत्यु विष दिए जाने के कारण 3 अप्रैल 1680 को हुई| शिवाजी की मृत्यु के बाद राज्य का कार्यभार उनके बड़े पुत्र शम्भाजी ने संभाला| शिवाजी की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मौके का फायदा उठाया एवं अपने 5 लाख सैनिको के साथ दक्षिण पर आक्रमण कर दिया|

शिवाजी से रंजिश के चलते औरंगजेब ने शम्भाजी को मार दिया एवं मराठा साम्राज्य के बचे हुए वंश को भी खत्म कर दिया|

निष्कर्ष:

शिवाजी को एक कुशल एवं साहसी राजा के रूप में देखा जाता है| कहते है कि मुगल सम्राट औरंगजेब भी शिवाजी की वीरता से डर गया था, इसलिए उसने उन्हें धोखे से मारने की योजना बनाई|

शिवाजी के समय आठ मंत्रियों की परिषद बनाई गई थी, जिसे अष्ठप्रधान कहा जाता था| इनके प्रधान मंत्री को पेशवा कहते थे, जिसका राजा के बाद दूसरा स्थान था| सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे|

मराठा साम्राज्य कई भागों में विभक्त था एवं प्रत्येक प्रान्त में प्रान्तपति नियुक्त किया जाता था| ये प्रान्तपति प्रान्त से जुड़े हर मामले के लिए जिम्मेदार होते थे|

मुगल साम्राज्य की स्थापना, शाहजहाँ एवं औरंगजेब Mugal samrajay ki Sthapana Shahjahan evn Aurangzeb

मुग़ल साम्राज्य के अंतर्गत कई ऐसे महान शासक हुए जिन्हें आज भी इतिहास उनकी उदारता एवं कला से प्रेम के कारण याद रखता है| बाबर से लेकर औरंगजेब तक मुगल साम्राज्य सबसे अधिक शक्तिशाली माना जाता रहा एवं इसने सम्पूर्ण भारत पर अधिकार करते हुए अनेक जगह अपनी विजय का परचम लहराया|

बाबर:

मुगल साम्राज्य की स्थापना का श्रेय बाबर को दिया जाता है जो कि तैमुर लंग एवं चंगेज खान के वंशज थे एवं 1526 ई. में पानीपत के युद्ध वे जीत हासिल करके मुगल राज को स्थापित किया|

बाबर का शासनकाल 1530 ई. तक रहा एवं उनके बाद उनके पुत्र हुमायूँ ने गद्दी का भार संभाला|

हुमायूँ:

बाबर के बाद उसके बेटे हुमायूँ ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ली किन्तु वे इतने योग्य शासक नहीं बन पाए एवं काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा| शेरशाह सूरी जो कि एक अफगानी शासक था, द्वारा हुमायूँ को बुरी हार का सामना करना पड़ा एवं 1556 ई. में हुमायूँ की मौत हो गई|

शेरशाह सूरी:

1540 ई. में मुगल शासक हुमायूँ को बूरी तरह हराकर शेरशाह सूरी ने मुगल शासन अपने हाथ में लिया एवं इनका शासनकाल काफी अच्छा एवं विकसित माना जाता है| शेरशाह ने 5 वर्ष तक राज किया जिसके दौरान उसने कई सराय, सड़के, एवं इमारतों का निर्माण करवाया, दिल्ली की GT रोड या ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माण भी शेरशाह सूरी ने करवाया था|

अकबर:

हुमायूँ के पुत्र अकबर का शासनकाल सबसे उत्तम माना जाता है| छोटी उम्र में पिता को खोने के बाद चाचा द्वारा पालन पोषण किया गया एवं मात्र 13 वर्ष की आयु में जलाल ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ली|

अकबर ने लगभग सभी हिन्दू राजाओं से उदारता एवं मैत्री की नीति अपनाई एवं कई सन्धिया की| उन्होंने सुंदर इमारते बनाई एवं मनसबदार प्रथा एवं कर वसूली में कटौती की| अकबर ने 50 साल तक राज किया एवं उनकी मृत्यु 1605 ई. में हुई|

अकबर के समय में कई महान कलाकर उसके राज्य की शोभा बढाते थे जिन्हें अकबर के नवरत्न कहा जाता है जिसमे तानसेन, बीरबल आदि का नाम सम्मिलित है|

जहाँगीर:

अकबर के बाद उनके बेटे जहाँगीर या जिसे सलीम के नाम से भी जाना जाता है, ने राज्य भार सम्भाला किन्तु वो अपने पिता के तरह महान शासक नहीं बन सका| जहाँगीर अपनी बेगम मेहरुन्निसा से बहुत अधिक प्रेम करता था| जहाँगीर के हुक्म पर ही सिक्खों के गुरु अर्जन देव की हत्या कर दी गई जिससे सिक्खों के साथ उनके सम्बन्ध खराब हो गये| 1627 में जहाँगीर की मौत हो गई थी|

शाहजहाँ:

शाहजहाँ या खुर्रम नाम से प्रसिद्ध जहाँगीर के पुत्र ने 1628 में शासन अपने हाथ में लिया| शाहजहाँ का जन्म लाहौर में हुआ था एवं उन्हें अपनी कलाप्रेम एवं उदार नीतियों के कारण जाना जाता है|

शाहजहाँ के काल को मुगल साम्राज्य के इतिहास में स्थापत्य कला का स्वर्ण युग कहा जाता है क्योकि जितनी सुंदर एवं अद्भुत इमारते शाहजहाँ से बनवाई इतनी किसी अन्य मुगल शासक ने नहीं बनवाई|

शाहजहाँ का विवाह बानो बेगम से 1612 ई. में किया गया किन्तु प्रथम प्रसव के दौरान ही उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई|

इसके बाद भी शाहजहाँ ने कई शादियाँ की किन्तु उनकी सबसे प्रिय पत्नी मुमताज महल थी जिनकी याद में उन्होंने ताजमहल बनवाया जो कि सफ़ेद संगेमरमरी इमारत है, आज भी आगरा का प्रसिद्ध पर्यटन केंद्र है| कहते है कि शाहजहाँ ने ताजमहल बनाने वाले मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे जिससे भविष्य में ऐसी इमारत फिर से न बनाई जा सके|

शाहजहाँ के 4 बेटे थे जिनके नाम थे दाराशिकोह, औरंगजेब, शाह्शुजा, एवं मुराद्बक्स एवं उनकी 3 पुत्रियाँ थी जिनके नाम थे जहाँनारा, गौहरारा, एवं रोशनारा|

शाहजहाँ के शासनकाल में युद्ध न के बराबर हुआ क्योकि उसका सारा ध्यान वास्तुकला एवं स्थापत्य कला में रहा| ताजमहल के साथ-साथ शाहजहाँ ने दीवाने आम, दिल्ली का लाल किला जिसे बनाने में 10 साल लगे, दीवान-ए-खास, मोटी मस्जिद, एवं दिल्ली की जामा मस्जिद का निर्माण करवाया|

1657 ई. में शाहजहाँ के बीमार पड़ने के बाद उनके बेटों दारा एवं औरंगजेब में गद्दी को लेकर झगड़ा प्राम्भ हो गया| औरंगजेब ने अपने ही पिता को बंदी बना लिया एवं जेल में बंद कर दिया|

अपने बड़े भाई दारा को शिकस्त देकर औरंगजेब ने सत्ता हथिया ली| शाहजहाँ ने अपने जीवन के अंतिम साल कारावास में बिताये एवं 1666 में उनकी मृत्यु हो गई|

औरंगजेब:

शाहजहाँ एवं मुमताज महल के पुत्र औरंगजेब का पूरा नाम ‘अबुल मुजफ्फर मुहियुद्दीन मुहम्मद औरंगजेब’ था जिन्होंने 1658 ई. में दिल्ली में अपना शाही राज्याभिषेक करवाया| औरगंजेब इस्लाम धर्म में यकीन रखता था एवं कट्टर सुन्नी नीतियाँ अपनाने में विश्वास रखता था|

सिक्खों के गुरु तेग बहादुर सिंह ने औरंगजेब की क्रूर नीतियों का विरोध किया इसलिए औरंगजेब ने उन्हें बंदी बनाकर उनकी जेल में हत्या करवा दी|

औरंगजेब ने हिन्दुओ पर जजिया नामक कर लगा दिया जिसे बिल्कुल पसंद नहीं किया गया|

लाहौर में औरंगजेब ने शाही मस्जिद का निर्माण करवाया एवं दिल्ली के लाल किले में मोती मस्जिद का निर्माण करवाया| अपने पिता के जैसे औरंगजेब कला प्रेमी था किन्तु उनके तरह दयालु एवं उदार नहीं था|

औरंगजेब के पास 337 मनसबदार थे जो अब तक रहे मुगल सम्राटों में सबसे ज्यादा माने जाते है|

अपने 50 वर्ष के शासन काल में औरंगजेब ने मुगल साम्राज्य को चोटी तक ले जाने के लिए हर सम्भव प्रयास किया एवं कभी समझौता नहीं किया न किसी के आगे झुका|

औरंगजेब कुरान को अधिक मानता था इसलिए उसने सिक्कों पर कलमा खुदवा दिया जिसने कई अन्य धर्मो के लोगों को नाराज कर दिया|

औरंगजेब की मृत्यु 1707 में स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण हुई| औरंगजेब के 5 पुत्र थे किन्तु उसने अपने सभी पुत्रों को शासन सम्बन्धित कोई प्रशिक्ष्ण नहीं दिया जिससे आगे चलकर उनमे से कोई भी मुगल सत्ता को सम्भाल नहीं सका एवं जल्द ही मुगल शासन का अंत नजदीक था एवं अन्य शासकों ने इस बात का फायदा उठाते हुए मुगल शासन को पूरी तरह से नष्ट कर दिया| इस प्रकार औरंगजेब को मुग़ल शासन का अंतिम शासक माना जाता है जिसके समय में मुगल शासन अपने चरम पर रहा|

झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई Jhansi ki Rani Laxmi Bai

बचपन एवं विवाह:

रानी लक्ष्मी बाई का जन्म का वास्तविक नाम ‘मणिकर्णिका’ था और प्यार से इन्हें मनु कहकर बुलाया जाता था| इनका जन्म मराठी ब्राह्मण परिवार में 19 नवम्बर 1828 ई. को उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी में हुआ था और मृत्यु 29 वर्ष की आयु में जून 1858 ई. को ग्वालियर के कोटा की सराय में हुई थी|

इनके पिता मोरोपंत ताम्बे मराठा में बाजीराव के दरबार में कार्यरत थे, इनकी माता भागीरथी साप्रे एक बुद्धिमान स्त्री थी| लक्ष्मी बाई जब अपनी आयु के चौथे वर्ष में थी तब उनकी माता का देहावसान हो गया था|

वर्ष 1842 ई. में झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से विवाह के सूत्र में जुड़कर मणिकर्णिका नेवालकर घराने की वधू और झाँसी क्षेत्र की रानी के पद पर विराजी|

विवाहोपरांत इन्हें लक्ष्मीबाई के नाम से संबोधित किया जाने लगा| वर्ष 1853 में इनके पति गंगाधर राव की शारीरिक स्थिति अत्यंत खराब होने के कारण इन्होने दत्तक पुत्र ग्रहण किया, जिसका नाम दामोदर राव ररखा| हालांकि इससे पहले 1851 ई. में लक्ष्मीबाई को पुत्र रत्न प्राप्ति हुई थी, परन्तु जन्म के चार माह में उसकी मृत्यु हो गई थी|

उस समय के दौरान ब्रिटिश सरकार के सरकार के दत्तक पुत्र ग्रहण करने से सम्बन्धित नियमो की पालना की गई, जिसमे ईस्ट इंडिया कम्पनी के राजनैतिक एजेंट मेजर एलिस की उपस्थिति में दत्तक ग्रहण की कागजी प्रक्रिया की गई|

महाराजा गंगाधर ने एलिस को अपनी लिखित वसीयत व् अन्य आवश्यक दस्तावेज सौंपकर इन्हें लार्ड डलहौजी तक पहुचाया|

रानी के पति की मृत्यु के बाद की विकट परिस्थितयां:

नवम्बर 1853 में गंगाधर राव की मृत्यु हो गई और अंग्रेजो ने इस विकट स्थिति का गलत फायदा उठाने के बारे में सोचा| तत्पश्चात 1854 ई. में ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल डलहौजी द्वारा राज्य हडप नीति अपनाई गई, जिसे अंग्रेज ‘डोक्ट्रिन ऑफ़ लेप्स’ कहते थे, जिसमे झाँसी राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में एकीकृत करने का निर्णय लिया गया और दामोदर राव को झाँसी का उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया गया|

इसके विरुद्ध लक्ष्मी बाई द्वारा अदालत की सहायता ली गई और ब्रिटिश वकील जॉन लेंग के साथ भी परामर्श किया गया, किन्तु वे अपने प्रयासों में सफल नहीं हो सकी और अंतत: 7 मार्च 1854 ई. को अंग्रेजो ने झाँसी राज्य व् इसके शाही खजाने पर कब्जा करके लक्ष्मी बाई को किले को छोड़कर जाने पर मजबूर कर दिया| इसके अलावा रानी लक्ष्मी बाई पर अपने पति गंगाधर राव द्वारा लिए गये कर्ज को चुकाने का भी आदेश जारी कर दिया गया|

इस कर्ज की कटौती इनके वार्षिक खर्चे में से देने का आदेश था| इसके बाद वे किला छोडकर रानी महल में रहने चली गई|

अंग्रेजो से टक्कर:

इसके बाद से लक्ष्मी बाई के मन में अपने राज्य को वापस लेने की इच्छा जागृत हुई और वे अपने पुत्र के अधिकारों व् अपने राज्य को लेकर चिंतित रहने लगी| रानी को यह बात समझ आने लगी थी कि बिना लड़ाई लड़े या बिना किसी संघर्ष के वे अपना राज्य वापस नहीं ले सकती, इसी विचार पर आगे बढ़ते हुए उन्होंने इस हेतु तैयारी करनी शुरू की|

सर्वप्रथम लक्ष्मी बाई ने एक स्वयं सेवी सेना बनाने की कोशिश प्रारंभ की, जिसमे स्त्रियों को भी शामिल किया गया और तलवार बाजी, शत्रु से सुरक्षा और युद्ध सम्बंधित अनेक गुर सिखाये जाने लगे|

सेना में झाँसी राज्य के साधारण नागरिको ने भी शामिल होने का साहस दिखाया| तब झलकारी बाई नाम की एक स्त्री को सेना प्रमुख बनाया गया, जिसका कारण यह था कि वह दिखने में रानी लक्ष्मी बाई जैसी थी, जो युद्ध के दौरान एक सकारात्मक पहलू सिद्ध हो सकता था|

समयावधि बीतने के साथ-साथ लक्ष्मी बाई के पुत्र की आयु 7 वर्ष की होने पर उनका उपनयन संस्कार करने की घड़ी आई, इस अवसर पर रानी लक्ष्मी बाई ने आसपास के राजाओं, महाराजाओं एवं मित्रगणों को आमंत्रित करने की सोची, ताकि वे अवसर के बहाने उनके साथ अपनी युद्ध नीति के सम्बन्ध में चर्चा कर सके और भविष्य में अपनी नीति संचालन के विषय में अन्य कुशल लोगों की राय प्राप्त कर सके|

उस समय राजसी बैठक में युद्ध सम्बन्धी विचार-विमर्श में तरह-तरह के सुझावों व् परामर्शों का आदान-प्रदान हुआ| तात्या टोपे भी तब अप्रत्यक्ष रूप से उनकी सहायता के लिए तत्पर थे|

समय के साथ-साथ रानी लक्ष्मी बाई की अपने राज्य को पाने की इच्छा प्रबल होती जा रही थी और वे अपने सेनाबल को मजबूत करने के लिए निरंतर कार्यरत थी| अब उनमे देशभक्ति की भावना दिनोदिन बढती जा रही थी|    

आखिर वर्ष 1858 ई. में वह समय आ गया था, जब ब्रिटिश सेना ने युद्ध करने के पथ पर आगे बढने की सोची और इस वर्ष की शुरुआत में जनवरी माह में ही अंग्रेजो की सेना ने युद्ध के उद्देश्य से झाँसी राज्य की तरफ अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए|

मार्च माह में ब्रिटिश सेना ने झाँसी तक पहुंचकर इसकी घेराबंदी कर ली और अंग्रेजो एवं लक्ष्मी बाई की सेना के मध्य युद्ध आरम्भ हुआ, जो लगभग 2 सप्ताह तक चला| लड़ाई के दौरान लक्ष्मी बाई अपने बेटे के साथ कालपी में तात्या टोपे तक पहुँच चुकी थी|

मई माह में अंत में रानी अपने सहयोगियों व् सेना के साथ ग्वालियर पहुंची और वहां के किले पर जीत हासिल की, तब जून माह में ब्रिटिश सेना भी सूचना मिलते ही वहां पहुंची और आक्रमण कर दिया| यह अंग्रेजो एवं लक्ष्मी बाई की सेना के मध्य अंतिम युद्ध था, जिसमे रानी स्वयं पूरे साहस के साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी एवं अपने साहस का परिचय देते हुए अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने पर विवश कर दिया|

रानी लक्ष्मी बाई के साहसी रवैये व् देश भक्ति को अंग्रेजो ने भी सराहा एवं इसी युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मी बाई अपने राज्य की रक्षा करते हुए वीर गति को प्राप्त हो गई|

आज इतिहास के पन्नो में हम रानी लक्ष्मी बाई के साहस व् वीर गाथा के बारे मे पढ़ते है| उन्होंने एक मर्द की तरह वीरता एवं दमखम दिखाते हुए जान हथेली पर रखकर ब्रिटिश सेना से टक्कर ली, इसलिए रानी लक्ष्मी बाई के लिए कहा जाता है, “खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी”| आज तक दुनिया उनके बलिदान को भुला नहीं सकी है और आज भी झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई इतिहास के पन्नो में अमर है|

पाषाण काल की विभिन्न अवस्थाएं Pashan Kaal ki Vibhinn Avasthaaye

पाषाण संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है पत्थर, यह उस समय का इतिहास है जब मानव पत्थरों पर अधिक आश्रित था एवं उसे चीजों के इस्तेमाल का ज्ञान न के बराबर ज्ञान था|

पाषाण काल को प्रागीतिहासिक या Pre-Historic काल भी कहा जाता है| पाषाण काल का समय 6 लाख ई.पूर्व के आसपास माना जाता है एवं उत्खननों द्वारा मिली जानकारी के आधार पर इसे तीन भागों में विभक्त किया गया है:-

पुरापाषाण काल Paleolithic Age

मध्य पाषाण काल Mesolithic Age

नव पाषाण काल Neolithic Age

पुरापाषाण काल का इतिहास:

पुरापाषाण काल के समय को लेकर अलग-अलग विद्वानों के अलग मत है| इसका समय 25 लाख साल से 12,000 पूर्व के बीच माना जाता है| इस समय में मानव आदिमानव के जैसे संघर्षपूर्ण हालातों में रहा करते थे, जैसे गुफाओं में रहना, पत्थर के औजार बनाना, आदि|

भारत में पुरापाषाण युग की खोज 1868 ई. में की गई थी जब चेन्नई के पास खोज व् खुदाई के दौरान पुरापाषाण काल के सबूत मिले| इसके बाद पूरे भारत में अलग-अलग स्थानों पर खुदाई की गई जिससे इस युग के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त हुई|

कैसा था पुरापाषाण काल में मानव जीवन:

खोजों के दौरान पत्थरों से बनी गुफाओं में मानव जीवन के संकेत मिले है जिसमे शिलाओं पर चित्र एवं चिन्ह उत्कीर्ण किये गये है| साथ ही पत्थर से बने औजार मिले है जिससे पता लगता है अभी मानव को लोहे या अन्य धातु का ज्ञान नहीं था, इससे सम्बन्धित कुछ बिंदु इस प्रकार है:-

रहन-सहन:

इस युग में मानव का जीवन खतरों से भरा हुआ था एवं खुद को बचाने के लिए उसने गुफाओं का सहारा लिया क्योकि बाहर उसे जंगली जानवरों से डर था एवं मौसम की मार भी उसे डराती थी| आदिमानव अपनी जगह बदलता रहता था एवं जहाँ उसे सुरक्षित महसूस होता उसी को अपना निवास बनाता|

औजार निर्माण:

खुदाई से मिले औजारों से यह साफ़ है कि उस समय मानव को हथियारों या औजारों की जानकारी नहीं थी क्योकि प्राप्त औजारों की बनावट अजीब एवं भद्दी है| प्रारंभ में शिकार को मारने के लिए पत्थर का इस्तेमाल किया जाता था धीरे-धीरे मानव ने पत्थर को शेप देना एवं नुकीला बनाना सीखा एवं हथौड़ा, कुल्हाड़ी, चाकू आदि बनाये|

आहार:

इस युग में मानव को खेती करना नहीं आता था एवं प्रारंभ में उसने कंदमूल खाकर गुजारा किया किन्तु जल्द ही उसने दूसरे जानवरों का मांस खाना शुरू किया चूँकि मानव को आग का ज्ञान नहीं था इसलिए वह कच्चा मांस ही खाता था|

पहनावा:

पहले तो मानव पत्ते, पेड़ की छाल पहनता था किन्तु इससे ठण्ड से बचाव नहीं हो पाता था इसलिए वह जानवरों की खाल पहनने लगा|

आग की खोज:

अब इस युग में आग की खोज की गई हालंकि यह साफ़ नहीं कि मानव ने इसे कैसे खोजा होगा| आग की खोज ने मनुष्य के जीवन को सुगम बनाया क्योकि जंगली जानवर आग से डरते थे एवं मांस पकाने के लिए यह अच्छा स्त्रोत था|

मृतक संस्कार:

खुदाई में मिले कंकालों से पता लगता है कि पुरापाषाण काल में मानव अपने मृतकों को दफनाते थे एवं उसके साथ खाद्य सामान रखते थे शायद वे पूर्वजन्म में विश्वास करते थे|

कला का ज्ञान:

इस समय में मानव को चित्र बनाना, एवं शिलाओं पर चित्र उकेरना अच्छे से आने लगा था जिसका सबूत गुफाओं में मिले चित्रों से एवं शिलाओं पर बने जानवरों के चित्रों से प्राप्त होता है|

मध्य पाषाण काल का इतिहास:

इस युग में मानव ने शिकार करना अच्छे से सीख लिया था एवं जानवरों को भी पालतू बनाने लगा था| खनन के दौरान कई तरह के पत्थर से बने औजार हाथ लगे है जो पहले के युग की तुलना कही अधिक परिष्कृत थे|

ये हथियार पत्थर से बने है एवं कई में लकड़ी का बना हैंडल भी लगा हुआ है|

इस काल में मानव मछली पकड़ना एवं मांस को अच्छे से पकाकर खाने लगा था| रहने के लिए वह अभी भी गुफाओं पर आश्रित था एवं धनुष बाण एवं मछली पकड़ने के कांटो का इस्तेमाल करना भी सीख लिया था|

मध्य पाषाण काल में मानव ने कुत्ते को पालतू के रूप में रखना शुरू किया एवं शिकार में उससे सहायता लेने लगा|

नव पाषाण काल का इतिहास:

नव पाषाण काल मानव की उन्नति एवं सूझ-बुझ का युग था जिसके अवशेष पूरे भारत के विभिन्न क्षेत्रों से मिले है| इसमें बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, कश्मीर, असम, मध्य प्रदेश, चेन्नई, गुजरात आदि सभी जगहों से नव पाषाण काल के अवशेष प्राप्त हुए है|

औजार एवं कृषि:

इस युग में हथियारों के निर्माण में काफी उन्नति हुई अब बेडोल औजारों की जगह चमकदार, मजबूत, एवं नुकीले औजार बनाये जाने लगे

ये औजार न केवल शिकार को मारने का काम करते थे बल्कि रोजमर्रा के कामों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे|

पशुपालन एवं कृषि:

अब मानव ने कुत्ते के साथ-साथ गाय, बकरी, भेड़, ऊंट आदि को पालना शुरू कर दिया| इसी युग में कृषि करने के लिए हल खोजा गया| इस युग को सबसे क्रांतिकारी माना गया है क्योकि अब मानव सिर्फ शिकार पर आश्रित न होकर कृषि करने लगा था जिसमे चावल, गेहूं, बाजरा, कपास, मक्का आदि की फसलें उगाना उसे आने लगा था|    

आहार:

इस युग में मानव ने अपने आहार में काफी परिवर्तन किये एवं पशुओं से दूध निकालना एव उससे विभिन्न चीजे बनाना सीख लिया था| अनाज पीसने के लिए पत्थर के उपकरण बनाये गये| गेहूं, बाजरा, मक्का, जौ आदि खाद्य सामग्री के मुख्य अंग थे|

वस्त्र एवं बर्तन निर्माण:

जहा पुरापाषाण युग में मानव पत्ते पहनता था वहीं नव पाषाण काल में उसने रेशों से कपड़ा बनाना सीखा| खुदाई में मिले करघे एवं कपड़े बुनने के समान से ज्ञात होता है कि अब वह अच्छे कपड़े पहनने लगा था एवं कपास की खेती भी इसलिए की जाती थी|

मिटटी के कई प्रकार के बर्तन उत्खनन के दौरान प्राप्त हुए है जिससे उनके बर्तन बनाने की उच्च कला के बारे में पता लगता है|

बड़े चाक या पहिये का अविष्कार भी इसी युग में किया गया जिससे बड़े-बड़े बर्तन बनाये गये ताकि अनाज संग्रहित करके रखा जा सके| इस युग के लोग धार्मिक थे एवं प्रक्रति की पूजा करते थे एवं मातृदेवी की उपासना के प्रमाण भी मिले है|

औद्योगिक क्रांति का अर्थ एवं प्रभाव Odhyogik Kranti ka Arth evn Mahatv

औद्योगिक क्रांति का अर्थ:

अठारवीं सदी के अंत होते-होते एवं उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में दुनिया के विभिन्न भागों में सामाजिक, आर्थिक, एवं तकनीकी रूप से काफी आधुनिक बदलाव आया जिसमें हाथों का काम अब मशीने करने लगी थी एवं आधुनिक अविष्कार अब रोजमर्रा का कार्यों को आसान करते जा रहे थे, इसी बदलाव या क्रांति को औद्योगिक क्रांति या Industrial Revolution के नाम से जाना जाता है|  

मुख्य रूप से औद्योगिक क्रांति का प्रारम्भ कपड़ा उद्योग के साथ हुआ जिसमे मशीने स्थापित की गई जो तीव्रता से कपड़ा बुनती थी एवं ये माल हाथों से बने माल की अपेक्षा सस्ता बिकता था|

वाष्प के इंजन का अविष्कार इसी युग की देन है, लोहा बनाने के कारखाने स्थापित किये गये, नित-नयी मशीनों एवं धातुओं का निर्माण होने लगा एवं देखते ही देखते यह क्रांति सम्पूर्ण यूरोप, अमेरिका में फ़ैल गई|

क्या थे उपनिवेश:

औद्योगिक क्रांति का आरम्भ इंग्लैंड से माना गया है क्योकि इंग्लैंड के पास सबसे ज्यादा कच्चा माल एवं उपनिवेश मौजूद थे और जाहिर भी है क्योकि ब्रिटेन ने लम्बे समय तक भारत पर राज किया एवं अपने माल में वृद्धि की|

उपनिवेश का अर्थ होता है, जब एक शक्तिशाली देश किसी अन्य देश या राज्य को अपने अधीन करके उसपर अधिकार कायम कर लेता है तब वह उस देश का उपनिवेश बन जाता है| अधीन देश की पूंजी को उसपर अधिकार करने वाला अपने हितो के हिसाब से इस्तेमाल कर सकता है| चूँकि उस समय फ्रांस एवं इंग्लैंड के पास सर्वाधिक उपनिवेश थे इसलिए यहाँ औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात तीव्रता से हुआ|

इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के सूत्रपात के मुख्य कारण:

जिस समय औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई उससे पहले विश्व में मंदी का दौर चल रहा था एवं दास प्रथा प्रचलित थी जिसमे मजदूरों से जानवरों के जैसे काम लिया जाता था| इंग्लैण्ड एक सम्पन्न देश था एवं हर तरह से अन्य देशों की तुलना में शक्तिशाली था|

उस समय समुंद्र पार व्यापर करने के लिए लकड़ी के जहाजों का इस्तेमाल किया जाता था अत: व्यापर को बढ़ाने के लिए इंग्लैण्ड एवं फ्रांस आतुर थे जिसने लोहे के जहाज एवं भाप के इंजन के अविष्कार को जन्म दिया|

इंग्लैण्ड में कोयले एवं लोहे व् अन्य धातुओं के असीमित भंडार थे जिससे यहाँ से क्रांति का आरम्भ होना अनिवार्य था|

इंग्लैण्ड व्यापर हेतु हमेशा यात्राएं करता था जिससे उसने अपने साथ कई उपनिवेश जोड़ लिए थे जिनसे पूंजी एवं कच्चा माल आसानी से प्राप्त किया जा सकता था|

इंग्लैण्ड ने बहुत ही कम समय में यूरोप, होलैंड, स्पेन, फ्रांस आदि के साथ सम्बन्ध स्थापित किये जिससे उसे अधिक संख्या में मजदूर एवं कच्चा माल मिलने लगा एवं मशीनों द्वारा उत्पादन करके अपने माल को वह यहाँ बेचकर मुनाफा कमाने लगा|

इंग्लैण्ड को देखकर अन्य देशों में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होने लगी एवं आधुनिक मशीनों के निर्माण में तीव्रता आने लगी जिससे अधिक से अधिक उत्पादन कम पूंजी में लाभ कमाकर किया जा सके|

कृषि के क्षेत्र में भी काफी बदलाव आया एवं इंग्लैण्ड ने आधुनिक मशीनों को बनाकर कृषको का कार्य आसान कर दिया|

इंग्लैण्ड ने अपने तैयार माल जैसे नील, कपड़ा, चायपत्ती, रुई, आदि को भारत एवं अन्य देशों में उच्च दामों पर बेचकर काफी मुनाफा कमाया|

औद्योगिक क्रांति के प्रभाव:

औद्योगिक क्रांति ने मानव जीवन पर काफी गहरा प्रभाव छोड़ा एवं विश्व का कोई कोना ऐसा नहीं था जो इस क्रांति से प्रभावित न हो| इसने श्रमिक वर्ग को मुक्ति मिली क्योकि अब मशीने हर कार्य को मानव से कही अधिक अच्छे ढंग से करती थी|

नये समाज का उदय हुआ एवं कई जगह आन्दोलन चले जिसमे मजदूर वर्ग अपनी पहचान बनाने के लिए आकुल था| औद्योगिक क्रांति के कारण औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का जन्म हुआ एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापर को बढ़ावा मिला| इसके कुछ मुख्य प्रभाव इस प्रकार है:-

आर्थिक प्रभाव:

उत्पादन में बढ़ोतरी:

औद्योगिक क्रांति के अंतर्गत उत्पादन एव् मुनाफे में दुगनी तेजी से बढ़ोतरी हुई एवं इंग्लैण्ड एवं अन्य देश तेजी से अपनी अर्थव्यवस्था का स्तर उपर उठाने लगे| मशीनों के द्वारा हर कार्य तेजी से होने लगा एवं व्यापारिक क्रियाकलापों में तीव्रता आई|

बैंकिंग प्रणाली:

औद्योगिक क्रांति के चलते अब मुद्रा का लेंन-देन अधिक मात्रा में होने लगा जिसने बैंकिंग प्रणाली को आधुनिक किया एवं मुद्रा का स्वरूप बदला जिसमे कागज के नोटों का चलन बढने लगा एवं चेक एवं ड्राफ्ट का इस्तेमाल आम बात थी|  

शहरीकरण:

रोजगार की तलाश में अब लोग अपने गाँव को छोडकर बड़े शहरों की तरफ रुख करने लगे|

लघु उद्योग का नाश:

औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप लघु उद्योगों का नाश हो गया एवं काफी लोग बेरोजगार हो गये|

मुक्त ट्रेड की नीति:

मुक्त व्यापार की नीति को प्रोत्साहित किया जाने लगा कि कोई भी देश किसी भी देश के साथ व्यापार करने को स्वतंत्र है|

सामाजिक परिणाम:

जनसंख्या वृद्धि:

औद्योगिक क्रांति के कारण अब खाने-पीने की वस्तुए अच्छी बनने लगी एवं सस्ते में उपलब्ध होने लगी जिससे नवजात को सुविधा मिली एवं जनसंख्या बढने लगी|

नये वर्ग का जन्म:

इस क्रांति ने तीन नये वर्गों का उदय किया जिसमे पहले थे पूंजीपति, दूसरे थे मध्यम वर्ग जैसे इंजिनियर, निरीक्षक, ठेकेदार, एवं तीसरा वर्ग था मजदूर वर्ग जिसका सबसे अधिक शोषण किया जाता था|

नैतिक मूल्यों का हनन:

औद्योगिक क्रांति की हानि में से एक बात यह थी कि इससे मालिक एवं नौकर का सम्बन्ध काफी खराब होने लगा एवं श्रमिक वर्ग को काफी नीचा समझा जाता था|

कारखाने के श्रमिको से सारा दिन काम लिया जाता था एवं कई बार वे शराब एवं अन्य नशों का सहारा लेने लगे|

राजनितिक कारण:

धनी वर्ग अपने पैसे के जोर पर राजनीति में कदम रखने लगे एवं कानून को अपने हाथों की कठपुतली बना लिया अत: गरीब वर्ग और दबता गया एवं दीन-हीन हो गया|

औद्योगिक क्रांति के मुख्य अविष्कार:

कपड़े को तेजी से बुनने के लिए 1733 ई. में फ्लाइंग शटल मशीन का अविष्कार किया गया जिसे जॉन नामक व्यक्ति ने बनाया|

सूत काटने के लिए एक स्पिनिंग जेनी बनाई गई जिसे 1764 ई. में जेम्स नामक आविष्कारक ने बनाया| इसके द्वारा 8 लोगों का काम एक साथ किया जा सकता था|

हेनरी बेल नामक व्यक्ति ने 1812 ई. में स्टीमर का अविष्कार किया|

1846 ई में सिलाई मशीन का निर्माण किया गया| इसके अलावा पक्की सड़के, टेलीफ़ोन, बिजली की तारे आदि का निर्माण किया गया एवं मानव जीवन को और सुगम एवं सुविधापूर्ण बना दिया|

भारत-पाकिस्तान युद्ध Bharat-Pakistan Yudh

1947 ई. में ब्रिटिश शासन के लम्बे राज से आजाद होने के बाद भारत भी दो भागों में विभक्त हो गया एवं एक नया देश पाकिस्तान बनाया गया किन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् भी इन दोनों देशों के बीच कलह एवं विवाद की स्थिति बनी रही जिसने कई बार युद्ध को अनिवार्य कर दिया|

हर बार विभिन्न कारणों से युद्ध हुए एवं हर बार हजारों लोग एवं सैनिक मारे गये| वैसे तो दोनों देशों के मध्य शांति कम ही रही किन्तु फिर भी सबसे घातक युद्ध 1948, 1965, 1971, एवं 1999 में लड़े गये थे|

कभी कश्मीर विवाद, कभी जल विवाद, तो कभी क्षेत्र के लिए युद्ध करना अनिवार्य हो गया एवं आज तक भी दोनों देशों के बीच शांति एवं अहिंसा बनाये रखने के पूरे प्रयास किये जाते है, आइये देखते है इतिहास में हुए इन युद्धों के क्या थे कारण एवं क्या रहे परिणाम:-

भारत-पाक युद्ध 1948:

इस युद्ध की शुरुआत भारत की आजादी के साथ ही शुरू हो गई थी एवं इसे ‘प्रथम कश्मीर युद्ध’ भी कहा जाता है क्योकि युद्ध का मुख्य कारण कश्मीर था| उस समय ‘महाराजा हरी सिंह’ कश्मीर के शासक थे जो कि हिन्दू थे एवं वे स्वतंत्र कश्मीर चाहते थे|

परन्तु जब कश्मीर के पश्चिमी भाग में कुछ मुस्लिम लोगों की हत्या कर दी गई तो वह दंगे भड़क उठे जिससे जनता में आक्रोश व्याप्त हो गया एवं उन्होंने हिन्दू राजा के खिलाफ अपना रोष प्रकट करना आरम्भ कर दिया|

मौके का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान ने अपनी सेना को कश्मीर भेजा जो श्रीनगर के पास ही मौजूद थी|

पाकिस्तानी सैनिको के कश्मीर आने से महाराज ने भारत से मदद की गुहार लगाई तब भारत ने उन्हें कहा कि कश्मीर को वे भारत में मिला दे, जिससे भविष्य में उन्हें इस प्रकार की स्थिति का सामना न करना पड़े एवं महाराजा ने ऐसा ही किया|

अंत में भारत ने जम्मू एवं कश्मीर को भारत का हिस्सा माना एवं कश्मीर में अपनी सेना भेजी|

परिणाम:

पाकिस्तानी सेना के बेवजह अवरोध को उस समय के प्रधानमंत्री नेहरु ने लगाम लगाते हुए उन्हें वापस जाने के लिए कहा एवं एक रेसोल्यूशन प्रस्ताव 47 पारित किया गया जिससे युद्ध पर विराम लगाया गया हालांकि पाकिस्तान इस निर्णय से खुश नहीं था|

युद्ध के बाद भी भारत का कश्मीर के 2 तिहाई भाग पर नियन्त्रण हो सका जबकि पाक का 1 तिहाई हिस्से में जिसे POK या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी कहा जाता है|

भारत-पाक युद्ध 1965:

इस युद्ध का मुख्य कारण पानी से सम्बंधित था किन्तु केंद्र समस्या कश्मीर ही थी| मुख्य नदिया माने जाने वाली सतलज, सिन्धु, रावी, व्यास, चिनाव आदि भारत से होकर गुजरती थी एवं भारत ने इसका प्रवाह बंद कर दिया|

हालंकि 1960 ई. में सिन्धु जल समझौते के द्वारा इस विवाद को हल कर दिया गया एवं पानी इस्तेमाल करने के लिए नदियों का बंटवारा कर लिया गया था|

इसके कुछ समय बाद पाकिस्तान ने कच्छ के पास अटैक किया जिससे सीमा विवाद शुरू हो गया भारत ने इसे शांति से हल करने की कोशिश की किन्तु इसे भारत की कमजोरी समझा गया| पाक अपनी हरकतों से बाज नहीं आया एवं LOC पर अपनी सेना को तैनात कर दिया|

इस युद्ध का मुख्य कारण पाक का ‘जिब्राल्टर अभियान’ माना जाता है, जो उसके कश्मीर में घुसकर विद्रोह भडकाने की योजना का नाम था|

यह युद्ध 17 दिन तक चला जिसमे जन-धन की काफी हानि हुई एवं अंत में संयुक्त राज्य संघ एवं सोवियत संघ ने युद्ध को रोकने हेतु हस्तक्षेप किया एवं युद्ध पर विराम लगाया गया|

जनवरी,1966 ई. में ‘ताशकंद समझौते’ के साथ भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियो ने संधि पत्र पर साइन किये जिसमे लम्बे विचार-विमर्श के बाद कई शर्ते रखी गई|  

परिणाम:

कई विवादों के बाद एवं ताशकंद समझौते के बाद भी दोनों देशों के मध्य अन्य विवाद जन्म लेने लगे थे| पाकिस्तानी जनता ने अपने विद्रोही रवैये को सही माना एवं पाक ने कश्मीर विवाद के प्रति काफी सख्त रुख अपनाया जिससे यह स्पष्ट था कि वह इसे हल नहीं करना चाहता|

पाक ने चाइना को POK में सड़क निर्माण की अनुमति दे दी एवं गंगा को लेकर भी विवाद शुरू हो गये|

लगातार बढ़ी अराजकता के कारण 5 वर्ष बाद फिर से युद्ध के हालत बन गये|

भारत-पाक युद्ध 1971:

भारत-पाक के तीसरे युद्ध में हजारों लोगों की जान गई एवं बंदी बनाये गये| इस युद्ध का मुख्य कारण यह था की बंगाल का जो भाग पाक के अधीन आता था उनपर जबरदस्ती उर्दू थोपी जा रही थी एवं उनके मौलिक अधिकारों का शोषण किया जा रहा था|

पाकिस्तान द्वारा पहले आक्रमण किये जाने के बाद भारत ने पाक पर दोनों तरफ से हमला बोल दिया एवं बंगाल के पूर्वी हिस्से को अपने अधिकार में लेकर 1971 को इसे एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया|

परिणाम:

युद्ध के दौरान रूस, USA, एवं अन्य शक्तिशाली देशों ने भारत का साथ दिया एवं अंत में 1972 ई. को ‘शिमला समझौते’ द्वारा युद्ध को शांतिपूर्वक ढंग से रोका गया|

शिमला समझौते के अंतर्गत दोनों देश आपसी मतभेदों को बातचीत द्वारा हल करेंगे एवं सेना एवं हथियारों के प्रयोग पर पाबन्दी लगा दी गई|

भारत-पाक युद्ध 1999:

भारत-पाक के मध्य हुए चौथे युद्ध को ‘कारगिल युद्ध’ कहकर भी बुलाया जाता है, क्योकि यह कारगिल नामक स्थान पर हुआ| जम्मू-कश्मीर के छोटे से जिले कारगिल में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने जबरदस्ती घुसने का प्रयास किया जिससे भारत को चौकन्ना कर दिया एवं तुरंत घुसपैठ को रोकने के लिए ‘आपरेशन विजय’ घोषित किया गया|

यह युद्ध 60 दिन से अधिक दिनों तक चला एवं इसका मुख्य केंद्र टाइगर हिल्स थी जो कारगिल के अत्यधिक ठण्डे इलाकों में से एक थी| अंत में भारतीय सेना ने पाक सेना को वापस अपनी सीमा में जाने के लिए विवश कर दिया एवं लाहौर घोषणा पत्र द्वारा युद्ध पर विराम लगाया गया|

परिणाम:

युद्ध के बाद 1999 ई. को भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने ‘लाहौर समझौते’ पर हस्ताक्षर किये जिससे शांति व्यवस्था को कायम रखा जा सके| इन चार युद्धों के पश्चात् इन दोनों देशों के मध्य फिर कभी दोस्ताना हालत नहीं बन सके| अन्य कई देशों ने समझौते की कोशिशे की किन्तु ज्यादा सफलता साथ नहीं लग सकी, उम्मीद है भविष्य में ऐसे हालत फिर नहीं बनेंगे|

महाराणा प्रताप एवं हल्दीघाटी युद्ध Maharana Pratap and Haldighati Yudh

सोलहवीं सदी के राजपूताना या राजस्थान के महान शासको में से एक माने जाने वाले महाराणा प्रताप का जन्म 1540 ई. को हुआ| बचपन में इन्हें प्यार से कीका कहकर पुकारा जाता था एवं शुरू से ही प्रताप अनुशासन प्रिय, साहसी, एवं देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे|

महाराणा प्रताप अपनी वीरता एवं साहस के लिए जाने जाते है जिन्होंने कभी भी मुगलों के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया जबकि अन्य सभी शासक मुगलों के सामने घुटने टेक चुके थे|

इतिहास महाराणा प्रताप को उनके और मुगल बादशाह अकबर के बीच लड़े गये हल्दीघाटी युद्ध के लिए आज भी स्मरण रखते है जो 4 घन्टे तक चलने वाला महासंग्राम था हालंकि इसमें विजय अकबर की हुई किन्तु फिर भी महाराणा प्रताप ने अत्यधिक साहस का परिचय देते हुए मुगल सेना का सामना किया|

क्या रही हल्दीघाटी युद्ध की पृष्ठभूमि?

लगभग पूरे राजपूताना पर अधिकार करने के पश्चात् अकबर मेवाड़ को हासिल करना चाहता था जिससे उसे गुजरात में प्रवेश करने में आसानी हो सके| सभी राजपूत राजाओं ने अकबर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया किन्तु महाराणा प्रताप ने इसे अस्वीकार कर दिया|

अकबर ने कई बार राणा के दरबार में दूत भेजे एवं उन्हें मनाने का प्रयत्न किया किन्तु प्रताप ने हर प्रयास को विफल कर दिया| बार-बार मना किये जाने पर अकबर ने युद्ध का एलान कर दिया क्योकि उसे हर हाल में मेवाड़ चाहिए था|

यह युद्ध राजस्थान के हल्दीघाटी, जो घाटी के तरह संकरा पहाड़ जैसा स्थान है, जो कि गोगुन्दा के पास स्थित है वहा लड़ा गया| एक ही दिन में इस युद्ध ने निर्णायक परिणाम दिए एवं राजस्थान के इतिहास में इसका काफी महत्व है|

हल्दीघाटी का युद्ध:

हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई. को हल्दीघाटी मैदान में लड़ा गया जो तकरीबन 4 घन्टे तक चला| इस युद्ध में अकबर के पास 85 हजार सैनिक थे जबकि महाराणा प्रताप के पास केवल 20 हजार सैनिक बल था|

युद्ध में अकबर की सेना का मार्गदर्शन राजपूत राजा मानसिंह द्वारा किया गया| दोनों पक्षों के पास हाथी घोड़े उपलब्ध थे किन्तु गोला बारूद नहीं था| महाराणा प्रताप ने अपने प्रिय घोड़े चेतक के साथ इस युद्ध में कूच की|

आखिरकार 18 जून के दिन सूर्योदय के 3 घन्टे बाद युद्ध आरम्भ हुआ| अकबर की विशाल सेना अपने सभी सामान के साथ मैदान में प्रवेश कर चुकी थी| मुगलों ने इसमें अच्छी रणनीति का परिचय देते हुए अपने 85 सैनिको को आगे की पंक्ति में रखा एवं इसी प्रकार अलग-अलग दिशा से समूह बनाये गये जिससे राजपूतों को पूरी तरह घेरा जा सके|

इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने काफी वजनी कवच धारण किया जिसका वजन 72 किलो के आसपास माना जाता है एवं उनके भाला 81 किलो का था जो आज भी दुर्ग में सुरक्षित रखा गया है|

प्रताप के पास 3,000 घुड़सवार थे एवं उनके साथ भीलों ने भी युद्ध में हिस्सा लिया जिन्हें सबसे पहले युद्ध में उतारा गया| 3 घन्टे तक युद्ध लगातार चलता रहा जिसमे प्रताप के 1600 सैनिक मारे जा चुके थे एवं उनका घोडा चेतक भी मारा गया|

अंत में प्रताप को यह एहसास हो गया कि मुगलों की जीत अनिवार्य है एवं वे स्वंय युद्ध में घायल हो गये| महाराणा प्रताप ने अंतत: अपनी हार स्वीकार कर ली एवं उनके साथी योद्धाओ ने उन्हें वहा से निकालने की पूरी कोशिश की एवं उन्हें पहाड़ों की तरफ भेज दिया|

अगले दिन मानसिंह ने मेवाड़ के आसपास के सभी क्षेत्रों गोगुन्दा, उदयपुर आदि पर अधिकार कर लिया किन्तु महाराणा प्रताप को खोजने में असमर्थ रहे|

इस युद्ध में प्रताप की तरफ से प्रमुख सेनाधिकारियो में रामदास राठौड़, हकीम खान सूरी, भामाशाह, भीम सिंह, बिंदा झाला आदि सम्मिलित थे जबकि अकबर की सेना में मानसिंह प्रथम, जगन्नाथ कछावा, सैय्यद अहमद खान आदि शामिल थे|

इस युद्ध के 3 साल बाद 1579 में जब मुगल बादशाह अकबर का ध्यान ईरान की तरफ मुड गया तब प्रताप फिर से सामने आये एवं मेवाड़ के पश्चिमी भागों को मुगलों के चंगुल से आजाद करवा लिया|

युद्ध के बाद की स्थिति:

कुछ इतिहासकार यह मानते है कि इस युद्ध में न तो किसी की जीत हुई न ही किसी की पराजय एवं अकबर ने उस समय राजपूतो के असीम साहस को अपने सामने देखा एवं उसने स्वयं राजपूती आन बान की प्रशंसा की|      

अकबर ने प्रताप को मनाने के लिए उसके राज्य में 6 दूत भेजे जिसमे से एक प्रसिद्ध टोडरमल भी थे किन्तु महाराणा प्रताप ने सभी को मुगलों के आगे सिर झुकाने से मना कर दिया|

प्रताप के घोड़े चेतक ने भी अति वीरता का परिचय दिया एवं अपने मालिक की जान बचाई इसी कारण आज भी चितौड में चेतक की समाधि बनवाई गई जो उसकी वीरता का परिचय देती है|

इस युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व हाकिम खान सूरी ने किया जो कि मुस्लिम सरदार थे एवं उन्होंने भी देशभक्ति की अच्छी मिसाल कायम की| इस युद्ध में मुगलों के केवल 150 सैनिक मारे गये एवं इससे यह भी पता लगता है कि मुगलों की युद्ध नीति राजपूतो की युद्ध नीति से कही अधिक श्रेष्ट थी|

निष्कर्ष:

हिन्दू शासको में महान माने जाने वाले महाराणा प्रताप ने बेशक पराजय को देखा किन्तु उन्होंने हार नहीं मानी और अंतिम समय तक घुटने नहीं टेके| जाहिर है कि उनका सैनिक बल अकबर की सेना के सामने कम था किन्तु मनोबल कही अधिक था इसलिए 3 घन्टे तक वे युद्ध भूमि में डटे रहे|

हल्दीघाटी की पीली मिटटी आज भी प्रताप की वीरता की गाथाए कहती है| महाराणा प्रताप की मृत्यु उनकी उस समय की राजधानी चावंडा में 29 जनवरी 1597 ई. को हुई उस समय वे 57 वर्ष के थे एवं धनुष की कमान चढाते समय उनकी आंतो पर आघात हुआ जिससे उनकी मौत हो गई| इतिहासकार मानते है की जब अकबर ने राणा की मृत्यु की खबर सुनी तो उसकी आँखों में भी आंसू आ गये| 2 साल तक जंगलो में भटकने के बाद एवं घास-फूस खाकर भी अपने स्वाभिमान को गिरने नहीं दिया ऐसे महान वीर राजपूत को आज भी यह धरती नमन करती है एवं आने वाली पीढ़ियों को महाराणा प्रताप की वीरता से अवगत करवाती है|  

साइमन कमीशन 1927

असहयोग आन्दोलन के असफल होने के बाद अंग्रेजों को यह भली भांति समझ आ गया कि भारतीय जनता अब उनसे नाराज है अत: 1927 ई. में गाँधी जी को उस समय के वायसराय लार्ड इरविन ने दिल्ली आमंत्रित किया जिसमे उसने यह खुलासा किया कि ब्रिटिश सरकार भारत में कुछ क़ानूनी सुधार लाना चाहती है जिसके अंतर्गत एक कमीशन बनाया गया है जिसका नेतृत्व ‘सर जॉन साइमन’ द्वारा किया जायेगा इसलिए इसका नाम साइमन कमिशन रखा गया|

इस कमीशन में केवल ब्रिटिश सदस्य थे जो ब्रिटेन के संसंद के निर्वाचित लोग थे| भारत से जुडी वैधानिक समस्याओं को हल करने के लिए इसका प्रावधान बनाया गया किन्तु एक भी भारतीय को इसमें शामिल नहीं किया गया जिससे इसके भारत में आते ही इसका हर वर्ग द्वारा जबर्दस्त विरोध किया गया|

सभी ब्रिटिश सदस्य सम्मिलित होने के कारण इसको ‘श्वेत या सफ़ेद कमीशन’ भी कहा जाता है जिसमे कुल सात सदस्य थे|

क्या थे कारण साइमन कमीशन के भारत आने के?

ब्रिटिश सरकार का यह कहना था कि उन्होंने साइमन को इसलिए भारत भेजा है ताकि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारा जा सके किन्तु इसके पीछे वास्तविक मंशा कुछ और लग रही थी क्योकि 1919 के अधिनियम के समय सरकार ने दस वर्षो के बाद आयोग स्थापना की बात कही थी जिसके चलते 1931 ई. में वैधानिक सुधार का प्रावधान लाया जाना था जबकि साइमन कमीशन 1927 ई. में ही घोषित कर दिया गया|

इसके अलावा ब्रिटेन की सरकार भारत में होने वाले दंगे एवं विद्रोह से भयभीत होने लगी थी जिसे दबाने के लिए साइमन कमीशन के नाम पर एक भुलावा भेजा गया|

ब्रिटेन में 1929 का समय वोट का था अत: उन्हें यह भय था कि यदि मजदूर वर्ग जीत गया तो भारत पर उसका अधिकार चलेगा|

साइमन कमीशन की घोषणा के बाद की स्थिति:

साइमन कमीशन की घोषणा के पश्चात् भारत के हरेक वर्ग में आक्रोश एवं गुस्सा फ़ैल गया| कांग्रेस ने भी मद्रास अधिवेशन में साइमन कमीशन का हर तरफ से बहिष्कार करने का निर्णय लिया|

हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग, एवं अन्य संस्थाओं ने भी इस कमीशन की किसी शर्त को नहीं माना एवं पूर्णत: इसे अस्वीकार कर दिया|

भारत में जगह-जगह ‘साइमन गो बेक’ के नारे लगने लगे एवं लोगों ने काले झंडे दिखाकर अपना रोष प्रकट किया| इन्ही संघर्षों के दौरान एक विशाल जूलुस निकला गया जिसका नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे एवं पुलिस ने उनपर तेजी से लाठियां बरसानी शुरू करदी जिससे मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई|

लालाजी की हत्या से आक्रोशित होकर क्रांतिकारी भगतसिंह एवं उनके एक साथी बटुकेश्वर दत्त ने कोर्ट में बम फेंका एवं लालाजी की मौत के लिए जिम्मेदार ब्रिटिश जवान सांडर्स को दिन दहाड़े गोली मारदी|

सम्पूर्ण भारत विद्रोह एवं आदोलन की अग्नि से जल उठा था एवं अनेकों हत्याए की गई| विद्रोह को दबाने का पूरा प्रयास किया गया किन्तु वह असफल रहा|

इतने भयंकर विरोध के बाद भी साइमन कमीशन ने 1930 ई. में अपनी रिपोर्ट पेश की| जो इस प्रकार थी:-

रिपोर्ट में यह कहा गया कि सभी भारत के सभी प्रान्तों में द्वैध शासन खत्म करके इसे मंत्रियों के हवाले कर दिया जाए|

अधिक से अधिक भारतीय जनता को मत देने का अधिकार प्राप्त हो एवं प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली को अपनाया जाये|

भारत में संघीय शासन को लागू करके प्रान्तों को स्वतंत्र शासन लागू करने का अधिकार दिया जाए|

कमीशन ने यह भी मांग की कि व्यवस्थापिका को फिर से गठित किया जाए जिसमे संघ एवं देशी रियासतों के सदस्य शामिल किये जाए| साइमन कमीशन ने भारत के शासन एवं संविधान से सम्बंधित समस्यों को तो प्रकाशित कर दिया किन्तु उस समय जनता जिस तरह आजादी को लेकर आक्रोशित थी उस सम्बन्ध में कोई भी प्रावधान नहीं दिया जिससे इसका केवल विरोध हुआ|

भारत का विभाजन Partition of India

भारत को 15 अगस्त 1947 ई. को आजादी का उपहार जरुर मिला जिसकी वह कितने समय से इंतजार में था एवं लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई| किन्तु इस उपहार की कीमत भारत के विभाजन से चुकानी पड़ी जिसमे देश दो हिस्सों में विभक्त हो गया एवं देश के लोगों की एकता पर गहरा आघात लगा|

भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम 1947 के अंतर्गत लार्ड माउंटबेंटन योजना के द्वारा भारत का विभाजन कर दिया गया जिसमे ब्रिटिश सरकार ने भारत एवं पाकिस्तान को दो अलग गणराज्य घोषित करते हुए सत्ता सौंप दी|

पाकिस्तान को अलग राष्ट्र घोषित करके इसकी रस्मे 14 अगस्त को पूरी की गई जिसमे वायसराय माउंट बेंटन ने भाग लिया इसलिए भारत में स्वतन्त्रता दिवस 15 अगस्त को मनाते है एवं पाकिस्तान में यह 14 अगस्त को मनाया जाता है|

इस विभाजन से भड़की हिंसा में करीब 5 लाख से अधिक लोग मारे गये एवं करोड़ो लोग बेघर हो गये|

क्या थी पृष्ठभूमि भारत विभाजन की:

ब्रिटिश सत्ता ने शुरू से ही भारत में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का अनुसरण किया| जिन्ना के विचारों से भी यह प्रतीत होने लगा था कि वह अलग राष्र्ट बनाना चाहते है जो केवल मुसलमानों का हो|

हालांकि महात्मा गाँधी ने विभाजन का कड़ा विरोध किया क्योकि उनके अनुसार हिन्दू-मुस्लिम एक साथ रह सकते थे| आग में घी का काम अंग्रेजों की नीतियों ने किया जिसे भारतीय जनता भांप नहीं सकी|

धीरे-धीरे जगह-जगह दंगे भडकने लगे एवं भारत के नेताओं पर भारत विभाजन को स्वीकार करने का दबाव भी बढने लगा|

कैसे हुआ भारत का विभाजन?

भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम के अंतर्गत 18 जुलाई 1947 ई. को ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित किया जो भारत के विभाजन के लास्ट प्रक्रिया थी, जबकि ढांचे की रूपरेखा 3 जून को ही तैयार कर ली गई थी| दोनों देशों के मध्य की सीमारेखा ब्रिटन के लॉयर ‘रेड्किल्फ़’ द्वारा बनाई गई थी|  

बहुमत के आधार पर राज्यों को शामिल किया गया एवं 565 राज्यों को यह स्वतन्त्रता दी गई कि वे अपनी इच्छा से किसी भी राष्ट्र में शामिल हो सकते थे| पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र संघ में सम्मिलित कर लिया गया और जैसी कि उम्मीद थी लोगों ने अपने धर्म के आधार पर अपना देश चुना|

विभाजन के काफी समय बाद तक भी लोगों का स्थानांतरण जारी रहा एवं गाँधी जी ने इस बात पर दबाव डाला कि भारत में रहने वाले मुस्लिम यदि चाहे तो यहाँ रह सकते है एवं उन्हें जबरदस्ती यहाँ से न निकाला जाए|

भारत की जनगणना 1951 के अनुसार, भारत के विभाजन के पश्चात लगभग 72,50,000 हिन्दू पाकिस्तान से भारत आये जिसमे पंजाब में यह स्थानांतरण सबसे अधिक हुआ जबकि इतनी ही संख्या में मुस्लिम भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गये|

भारत-पाकिस्तान के विभाजन से सम्बंधित कई फिल्मे भी रिलीज़ की गई जिसके दृश्य देखकर रूह काँप जाती है|

भारत विभाजन के परिणाम:

भारत विभाजन के दूरगामी परिणाम सामने आये जिसने हिन्दू-मुस्लिम एकता के नारे की धज्जियां उडादी एवं हमेशा के लिए नफरत के बीज बो दिए| धार्मिकता के आधार पर भारत का विभाजन सबसे हिंसक माना जाता है क्योकि इसमें सबसे अधिक जाने निर्दोष लोगों की गई|

ब्रिटेन ने न केवल भारत का विभाजन करवाया बल्कि उसने साइप्रस, आयरलैंड, आदि का भी विभाजन करने में अहम भूमिका अदा की जिसका कारण उसने यही दिया कि पृथिक समुदाय के लोग एक साथ कभी नहीं रह सकते अत: उनमे असंतोष न फैले इसलिए उनका अलग हो जाना बेहतर है|

ब्रिटेन ने हर कही अपनी कुटनीतिक चाले चली एवं कितने ही देशों का विभाजन कर दिया| उस समय केवल भारत का ही विभाजन नहीं हुआ बल्कि दिलों के बीच भी दूरिया बढ़ गई जिसे आज तक ठीक नहीं किया जा सका है|

कैबिनेट मिशन क्या था एवं क्या थे इसके प्रावधान

द्वितीय विश्व युद्ध के समय भारत ने ब्रिटिश सरकार का अच्छा सहयोग किया ताकि भारत की आजादी का मार्ग प्रशस्त हो सके| 1945 ई. में सेकंड वर्ल्ड वॉर समाप्त हो चुका था एवं अंग्रेजो की हालत भी अब बुरी थी एवं उन्हें प्रतीत होने लगा था कि भारत को स्वराज्य घोषित करना पड़ेगा|

भारत में अब स्वतंत्र होने को लेकर आक्रोश बढ़ता जा रहा था एवं इंग्लैंड जगह-जगह होते विद्रोह से तंग आ चुका था अत: इस समस्या को सुलझाने हेतु एक मिशन भारत भेजा गया जिसे कैबिनेट मिशन के नाम से जाना जाता है|

क्या था कैबिनेट मिशन:

भारत को स्वराज्य घोषित करने के अंतर्गत इंग्लैंड की संसद ने मार्च 1946 ई. में एक प्रतिनिधि मंडल को भारत भेजा जिसके अंतर्गत भारत के वरिष्ठ नेताओं ने ‘लार्ड Wavel’ के साथ एक योजना का निर्माण किया जिसका उद्देश्य भारत के लिए एक अस्थाई सरकार का निर्माण करके पूर्ण स्वराज्य लाना था एवं भारत में नए संविधान की घोषणा करना था, इसी को कैबिनेट मिशन कहा गया|

हालंकि क्रिप्स मिशन के जैसे कैबिनेट मिशन को कोई खासी सफलता नहीं मिल पाई क्योकि इसने भी प्रान्त के अलग संविधान बनाने पर जोर दिया|

कैबिनेट मिशन की प्रमुख योजनाये एवं प्रावधान:

ब्रिटिश राज्यों को एवं भारतीय प्रान्तों को मिलाकर एक भारतीय संघ बनाया जायेगा जो भारत की सुरक्षा प्रणाली एवं अन्य खर्चे वहन करेगा एवं प्रतिरक्षा दल, संचार व्यवस्था आदि इसी संघ के अधीन रहकर कार्य करेगी|

संघ की अलग से कार्यपालिका बनाई जाएगी जिसमे भारतीय एवं ब्रिटिश दोनों सदस्य शामिल किये जायगे एवं जरूरी विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार विधानमंडल का होगा|

जो विषय संघ के अधीन नहीं होंगे उनपर भारतीय राज्य फैसला करेंगे|

भारत के अलग-अलग प्रान्तों को तीन हिस्सों में बांटा गया जिसमे बिहार उड़ीसा, मुंबई, मध्य प्रदेश, आदि पहले थे, दूसरे स्थान पर पंजाब, उत्तर-पश्चिमी भाग एवं सिंध शामिल थे एवं तीसरे स्थान पर असम एवं बंगाल भाग थे| ये प्रान्त अपने सम्बन्ध में निर्णय ले सकते थे एवं शेष मंडल को सौंप सकते थे|

प्रावधान के दस साल बाद यदि विधानमंडल चाहे तो संविधान की धाराओं में बदलाव कर सकता है|

इसके बाद देशी प्रान्तों की सम्प्रभुता के अधिकार को ब्रिटिश सरकार हस्तांतरित कर देगी एवं भारत के राज्य देशी संघ में रहना चाहते है या अलग होना चाहते है इसका निर्णय वे स्वंय करेंगे|

संविधान निर्माण से जुड़े प्रावधान:

दस लाख की जनसंख्या पर एक मुख्य सदस्य को नियुक्त किया जायगा|

अल्पसंख्यक वर्ग को आबादी से अधिक स्थान नहीं मिलेगा|

किसी भी रियासत को अब उसकी जनसंख्या के आधार पर अधिकार मिलेगा|

सभा की मुख्य बैठक की व्यवस्था दिल्ली में होगी एवं उसी समय सदस्यों का चुनाव किया जायेगा|

सेन्टर में एक अस्थाई सरकार का गठन किया जाएगा जिसमे भारत के मुख्य प्रतिनिधि भाग लेंगे एवं इसका अध्यक्ष वायसराय ही रहेगा एवं शासन के सभी विषय इसके अधीन रहेंगे|

भारत को स्वराज्य घोषित करने के बाद इंग्लैंड एवं भारत के मध्य संधि रहेगी एवं मामलों का निपटारा मिलकर किया जायेगा|

क्या थे कैबिनेट मिशन के परिणाम:

मुस्लिम लीग एवं कांग्रेस दोनों ने कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया जबकि हिन्दू महासभा ने इसका विरोध किया| निर्वाचन के समय मुस्लिम लीग की बुरी तरह हार हुई जिससे कांग्रेस ने अपनी अंतरिम सरकार बनाने का फैसला लिया|

अंतत: 1946 को नेहरु को प्रधानमंत्री घोषित किया गया आगे चलकर मुस्लिम लीग ने भी सरकार के साथ रहना मंजूर कर लिया एवं इस मिशन ने भारत के विभाजन में अपनी अहम भूमिका निभाई|  

प्राम्भ में कांग्रेस सरकार अंतरिम फैसले से खुश नहीं थी एवं अंतरिम सरकार बनाने को अस्वीकार कर दिया था किन्तु विजय के बाद हालत बदल गये एवं जिन्ना इस सबसे काफी निराश भी हुए| अंतत दिसम्बर 1946 ई. को संविधान की बैठक दिल्ली में सम्पन्न की गई|

क्या था क्रिप्स मिशन का उद्देश्य?

क्रिप्स मिशन के नाम से प्रचलित यही प्रावधान द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की सहायता प्राप्त करने के लिया प्रधानमंत्री चर्चिल द्वारा 1942 ई. में स्टेफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा गया जो कि उस समय इंग्लैंड में मजदूर नेता थे इसी को ‘क्रिप्स मिशन’ कहा जाता है|

हालंकि यह मिशन पूरी तरह से असफल रहा एवं भारत के प्रत्येक वर्ग ने इसे अस्वीकार कर दिया क्योकि यह भारत की अखंडता एवं एकता के विरुद्ध एक साजिश जैसा प्रतीत हो रहा था|

क्या कारण थे क्रिप्स मिशन को भारत भेजने के?

क्रिप्स मिशन जब भारत में लाया गया उसका मुख्य कारण यही था कि उस समय WW2 वर्ल्ड वॉर द्वितीय चल रहा था जिसमे ब्रिटेन को अधिक से अधिक सहायता की आवश्यकता थी|

ब्रिटेन की साउथ ईस्ट एशिया में बुरी तरह हार हुई अत: ब्रिटेन ने भारत को कुछ विशेष प्रावधानों के साथ एक मिशन तैयार किया जिससे भारत का भी फायदा हो और ब्रिटिश सरकार का भी| इसी कारण उन्होंने अपने लेबर लीडर क्रिप्स को भारत भेजा|

भारत ने द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन का समर्थन किया इस उम्मीद से कि शायद अब उन्हें ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति मिल जाएगी किन्तु क्रिप्स मिशन में कुछ ऐसे प्रावधान थे जिसे भारत में स्वीकार नहीं किया गया एवं हर किसी ने इसे ठुकरा दिया|

क्या थे क्रिप्स मिशन के मुख्य प्रावधान?

भारत की जनता को अपने संविधान का निर्माण करने की स्वतन्त्रता दी जाएगी|

लोकतंत्र के साथ यहाँ पर भारतीय संघ स्थापित किया जायेगा जो इंटरनेशनल संस्थाओ, संयुक्त राष्ट्रीय संघ, एवं अन्य देशो के साथ स्वतंत्र रूप से सम्बन्ध स्थापित कर सकता है|

शासन की बागडोर अब भारतीयों के हाथ में दी जाएगी एवं पृथक तौर से राष्ट्रमंडल का निर्माण करने का हक भारत के पास होगा|

संविधान निर्माण के लिए अब अलग से योजना निर्माण किया जायेगा एवं भारत का प्रत्येक प्रान्त अब अपना संविधान निर्माण कर सकेगा|

क्रिप्स मिशन की असफलता के कारण:

भारत को खुश करने के लिए क्रिप्स मिशन ने काफी प्रयास किया किन्तु इसमें कुछ प्रावधान ऐसे थे जिनका देश के हर वर्ग ने विरोध किया| महात्मा गाँधी एवं नेहरु ने भी इसे अस्वीकार कर दिया क्योकि यह भारत के हित में नहीं था|

कांग्रेस द्वारा क्रिप्स मिशन का विरोध:

क्रिप्स मिशन भारत को पूर्णत: आजाद न करके केवल डोमिनिकन राज्य बनाना चाहता था जो कि कांग्रेस ने नहीं माना|

देश के प्रान्तों के मुख्य अधिकारियो एवं नेताओं को निर्वाचन द्वारा न चुनकर अपनी इच्छा से चुनना न्यायपूर्ण नहीं लगा|

क्रिप्स मिशन का सुझाव था कि भारत के सभी राज्य अपना अलग से संविधान बनाने हेतु आजाद है किन्तु यदि गहराई से देखा जाए तो इससे राज्यों के संघ से अलग होने के अवसर ज्यादा है क्योकि प्रत्येक राज्य अलग नियम बनाएगा एवं अखंड भारत धीरे-धीरे टुकडो में विभक्त होता जायेगा| इसी कारण यह प्रावधान उचित प्रतीत नहीं हुआ|

इस मिशन में कही भी स्पष्ट रूप से नहीं लिखा था कि भारत को पूर्ण रूप से स्वतंत्र करके सारी बागडोर भारतीयों के हाथ में देदी जाएगी अत: संदेह होना प्राक्रतिक था|

मिशन में यह स्पष्ट था कि इसके लागू होने के बाद गवर्नर जेनरल ही सर्वोच्च होगा|

मुस्लिम लीग एवं अन्य दलों द्वारा विरोध:

मुस्लिम लीग ने भारतीय संघ के प्रावधान को नकार दिया एवं अलग से पाकिस्तान की व्यवस्था का समर्थन भी नहीं किया|

हिन्दू महासभा ने भी भारत की एकता के विभाजन के डर से इसे अस्वीकार किया|

सिख समुदाय ने भी इस मिशन को समर्थन नहीं दिया क्योकि उन्हें भय था कि पंजाब उनसे छीना जा सकता है| ब्रिटिश सरकार इस मिशन के दौरान अपनी कही बातों से मुकरती नजर आई जिससे राजनीतिज्ञ संतुष्ट नहीं थे एवं उन्हें यह भारत को खंड-खंड करने की चाल लगी इसलिए किसी ने भी इसे नहीं माना|