अल्बर्ट आइंस्टीन के सिद्धांत

सर अल्बर्ट आइंस्टाइन भौतिक विज्ञान के जाने माने वैज्ञानिक थे। बीसवीं सदी के प्रारंभिक 20 वर्षों तक अपनी खोजों के लिए विज्ञान जगत में छाए रहे। अपनी खोजों के आधार पर उन्होंने गुरुत्वाकर्षण, समय और अंतरिक्ष के सिद्धांत दिए। वह सापेक्षता के सिद्धांत e=mc² के लिए जाने जाते हैं।

प्रकाश उत्सर्जन की खोज के लिए उन्हें 1921 में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था। उन्होंने सापेक्षता के सिद्धांत और सामान्य सापेक्षता जैसे कई सिद्धांत दिए। उनके अन्य योगदानो में सापेक्ष प्रमाण, कोशिकीय गति एवं भौतिकी के ज्यामिति सिद्धांत शामिल हैं। उन्होंने 50 से अधिक पत्र व किताबें लिखी हैं। 1919 में टाइम्स पत्रिका ने उन्हें सर्वकालिक महानतम वैज्ञानिक की उपाधि दी। उनके 300 से अधिक वैज्ञानिक शोध पत्र प्रकाशित हुए। सन 1905 मैं उन्होंने शोध पत्रों के आधार पर लेख प्रकाशित किया और सापेक्षता का सिद्धांत दिया। इसके बाद उनका नाम विज्ञान जगत में छा गया। 1933 में उन्होंने जर्मनी की नागरिकता त्याग दी और अमेरिका में रहने लगे।

सापेक्षता का सिद्धांत

सापेक्षता के सिद्धांत से आइंस्टाइन ने यह अनुमान लगाया था कि ब्रह्मांड के बनने या विस्तार करने की कोई निश्चित दर नहीं है। ब्रह्मांड की सभी चीजें एक दूसरे के सापेक्ष बढ़ रही हैं मतलब की एक दूसरे से सापेक्ष मात्रा में दूर जा रही हैं। इसलिए से सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत कहा जाता है। समय किसी के लिए भी एक जैसी दर पर नहीं चलता। एक तेजी से चल रही वस्तु उसकी दिशा में धीरे से चल रही है।वस्तु से छोटी दिखाई देती है। यह असर काफी सूक्ष्म होता है। जब तक यह गति प्रकाश की गति के समीप नहीं पहुचती तब तक यह घटना दिखाई नहीं देती। कोई भी पिंड अगर तेज गति से या फिर प्रकाश की गति के आसपास प्रवाह करता है तो समय धीरे हो जाएगा ताकि प्रकाश की गति बनी रहे और प्रकाश की गति टूटे ना।

उदाहरण: मान लीजिए आपका एक दोस्त प्रकाश की गति से अंतरिक्ष यात्रा करने गया है।अंतरिक्ष विमान में होने के कारण उसे सब सामान्य लगेगा। उसके अनुसार समय बहुत धीरे चलेगा लेकिन जब वह पृथ्वी पर वापस आएगा तो वह अपने भविष्य में होगा। यहाँ यह पता चलता है कि समय किसी के लिए एक जैसी दर पर नहीं चलता। इसका मतलब यह है कि अगर आपके लिए 2 घंटे गुजरे हैं तो ब्रह्मांड में सभी के लिए 2 घंटे गुजरे हो ऐसा जरूरी नही। तेज गति में घूमने वाले विमानों के लिए समय बहुत ही धीरे गुजरता है उसी तरह ज्यादा ग्रेविटी वाले फील्ड में गुजरने वाले विमानों के लिए भी समय बहुत ही धीरे गुजरता है। यदि आप ब्लैक होल के नजदीक हो तो समय दूसरे लोगों की तुलना में धीरे गति से चलने लगेगा।

उदाहरण: मान लीजिए कि बम ब्लास्ट होता है। दो अलग-अलग लोग उस बम ब्लास्ट से 10 किलोमीटर और 15 किलोमीटर की दूरी पर हैं। उसकी आवाज को पहले आदमी तक पहुंचने में 5 सेकंड और दूसरे आदमी तक पहुंचने में 10 सेकंड का समय लगा।अगर पहले आदमी से यह पूछे कि बम ब्लास्ट कब हुआ था। वह कहेगा 5 सेकंड पहले और दूसरा आदमी कहेगा 10 सेकंड पहले। तो दोनों में से कौन सही कह रहा है दरअसल दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही हैं। इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि समय relative होता है, एब्सोल्यूट नहीं होता।

सर अल्बर्ट आइंस्टाइन की इसी उम्दा सोच ने सापेक्षता के सिद्धांत को जन्म दिया। जिसने भौतिक विज्ञान में एक नई सोच को पैदा किया। पूरे ब्रह्मांड में कोई भी गति प्रकाश की गति से तेज नहीं है। उनकी खोज के बाद उन्हें खूब नाम और शोहरत मिली। लेकिन कुछ समय बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि उनका यह सिद्धांत असल दुनिया में कार्य नहीं करेगा। कोई भी वस्तु एक सामान्य दर से प्रवाह नहीं करती सभी चीजें त्वरण करती हैं।

रेडियो का आविष्कार कब और किसने किया?

२०वीं शताब्दी में ऐसे बहुत से लोग थे, जो हमेशा नयी-नयी खोज में लगे हुए थे। ऐसे लोगों ने बहुत से नये और अभिनव उपकरणों का अनुसंधान तथा निर्माण किया। इसी २०वीं शताब्दी में, रेडियो विकास की पूरी परियोजना भी तैयार हो रही थी। इस बात को ले कर हमेशा ही विवाद होता रहा है कि आखिर रेडियो का वास्तव में किसने अविष्कार किया? जब भी रेडियो की अवधारणा के विकास की बात होती है, तो दो लोगों का नाम आवश्यक रूप से लिया जाता है– सर्बियन-अमेरिकन शोधकर्ता निकोला टेस्ला और इतालियन भौतिक विज्ञानी गुगलिलो मार्कोनी। रेडियो के आविष्कार के १०० वर्ष बाद भी, अभी तक लोग इस बात को ले कर संशय में हैं कि आखिर रेडियो के मूल रूप के आविष्कार का श्रेय किसको दें? कुछ लोग मार्कोनी को रेडियो का निर्माता समझते हैं, तो कुछ लोग इस बात को ले कर विवाद करते हैं की इसके वास्तव निर्माता तो टेस्ला ही हैं।

१८८४ में यूएस। जाने के बाद, टेस्ला ने टेस्ला कॉइल का आविष्कार किया। टेस्ला कॉइल एक ऐसा गैजेट है जिसे रेडियो वेव्स भेजने और प्राप्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। १८९५ में टेस्ला ने अपनी लैब से ५० मील दूर तक न्यूयॉर्क के वेस्ट पॉइंट तक रेडियो फ्लैग भेजा। टेस्ला ने १८९७ में, अपने रेडियो कार्य के लिए पेटेंट पाने के लिए अमेरिका में आवेदन किया। उसी के साथ उन्होंने एक ‘रेडियो-कंट्रोल्ड वेसल’ का निर्माण किया और उसे मैडिसन स्क्वायर गार्डन में, सन १८९८ में, प्रदर्शित भी किया।

इसी बीच मार्कोनी भी अपने  रेडीओ वेव्स प्रयोग कर रहे थे। १८९६ में मार्कोनी ने मोर्स-कोड आधारित रेडियो सिग्नल्सको करीबन ४ मील दूर इंग्लैंड भेजने में सफलता पाई। उसी साल, उन्होंने रेडियो का पेटेंट पाने के लिए इंग्लैंड में आवेदन किया। वह विश्व में रिमोट टेलीकम्युनिकेशन का पेटेंट पाने वाले पहले व्यक्ति ही थे।

१९०० में, अमेरिकी पेटेंट कार्यालय ने टेस्ला की लाइसेंस ६४५, ५७६ और ६४९, ६२१ की आवश्यक रूपरेखा को मार्च और मई के महीनों में स्वीकार कर लिया। टेस्ला के रेडियो लाइसेंस की वजह से, रेडियो इंटरचेंज के लिए प्रमुख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए टेस्ला पर और भी अधिक ज़िम्मेदारी आ गयी। उसी साल १० नवम्बर को मार्कोनी को अपने ‘ट्यूनड टेलीकम्युनिकेशन के लिए पेटेंट संख्या ७७७७ भी मिल गयी। सबसे पहले तो पेटेंट ऑफिस ने मार्कोनी के आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उसने अपने कार्य के लिए टेस्ला के लूप का प्रयोग किया था, और उसी की निर्भरता के आधार पर अपना आविष्कार किया था। परन्तु अत्यधिक संकल्प शक्ति से परिपूर्ण मार्कोनी ने अपने पिता की विरासत की मदद से अपने ब्रॉडकास्ट इनोवेशन को एक लाभदायी व्यावसाय में बदल दिया, और साथ ही साथ अपने रेडियो लाइसेंस को प्राप्त करने के लिए भी प्रयास करते रहे। १९०१ में, उन्होंने अपना पहला इंटरकांटिनेंटल प्रसारण भी प्रसारित किया।

मार्कोनी ने एक बार फिर पेटेंट के लिए आवेदन किया, और अंत में, १९०४ में, उन्हें UN पेटेंट ऑफिस ने, रहस्यमयी रूप से अपना फैसला बदलते हुए पेटेंट प्रदान कर दिया। १९०९ में मार्कोनी को फिजिक्स के क्षेत्र इस कार्य के लिए ‘नोबेल पुरस्कार, से सन्मानित किया गया। आज तक भी बहुत से लोग मार्कोनी को ही रेडियो के मूल आविष्कारक के रूप में जानते और मानते हैं।

व्हाट्सएप्प का आविष्कार किसने किया?

अगर स्मार्टफोन मोबाइल अप्प्स की बात की जाये तो आज ‘व्हाट्सएप्प’ सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा डाउनलोड किया जाने वाला अप्प है। दुनिया में सबसे ज्यादा सन्देश व्हाट्सएप्प के द्वारा ही भेजे जाते है व्हाट्सएप्प की स्थापना Yahoo के पूर्व कर्मचारी ब्रायन एक्टन और जॉन कोयॉम द्वारा २००९ में की गयी। व्हाट्सएप सन्देश भेजने की एक सबसे सरल ऑनलाइन एप्लीकेशन है और साथ-ही-साथ एक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म भी है।
Yahoo के कर्मचारी ब्रायन एक्टन ने २००७ में yahoo के साथ काम करना छोड़ दिया उसके बाद फुर्सत के कुछ पलों का मज़ा लेने के लिए दक्षिण अमेरिका चले गये। उस वक्त उन्होंने फेसबुक में नौकरी के लिए अर्जी दी थी मगर उन्हें नौकरी नहीं मिली

२००९ की शुरुवात में ही iPhone हासिल करके और उसकी क्रिया को समझने के बाद,उन्हें समझ में आ गया था कि ये iPhone का ये सात महीने पुराना एप-स्टोर, एप की दुनिया में एक बहुत बड़ा बदलाव लाने वाला है। इसलिए उसे बनाने में एक और सहयोगी अलेक्स फिशरमैन से इस अप्प पर काम करना शुरू किया।

सबने मिलकर दो साल की मेहनत से एक एप्लीकेशन बनाया जिसका नाम जॉन कोयॉम ने ‘व्हाट्सएप’ रख दिया, क्योंकि इसका स्वभाव ऐसा दिख रहा था की इसका प्रयोग उपयोगकर्ता को बतायेगा की ‘व्हाट इज़ हैप्पनिंग?’ (क्या हो रहा है)। फरवरी २४, २००९ में, व्हाट्सएप के जन्म के सात दिन बाद ही उन्होंने कैलिफ़ोर्निया में व्हाट्सएप एसपी (WhatsAppSp) को प्रक्षेपित किया।

जून २००९ में एप्पल ने ‘पुश नोटिफिकेशन’ पेश किया जिसकी वजह से इंजीनियरों को यह सुविधा मिली की जब भी उनके सामने आवेदन करने का कोई नया मौका आये तो वो लोगों को ‘पिंग’ कर सकें। तब कोयॉम ने अपने व्हाट्सएप में वह सुविधा जोड़ दी की, जब भी कोई व्हाट्सएप ग्राहक अपनी स्थिति में बदलाव करे तब उसके नेटवर्क में मौजूद सभी लोगों को इसका एक ‘पिंग’ के द्वारा पता चल जाए। फिर व्हाट्सएप ने अपने २.० संस्करण को बाज़ार में उतारा, जिसके बाद व्हाट्सएप के सक्रीय उपभोक्ताओं की संख्या में बहुत वृद्धि हुई और इसके करीबन २५०,००० ग्राहक (उपयोगकर्ता) बन गए।

उस समय कॉम, एक्टन से मिले , जो अभी तक बेरोजगार थे और जो एक असफल स्टार्टअप के साथ जूझ रहे थे। फिर दोनों ने साथ काम करने का निश्चय किया। अक्टूबर में एक्टन ने Yahoo के पाँच भूतपूर्व भागीदारों को इस बात के लिए मनाया की वह उनकी कम्पनी में $२५०,००० का निवेश करें। इसके बाद उन्हें व्हाट्सअप्प के सह-संस्थापक का दर्जा मिल गया और एक हिस्सेदारी भी। बीटा चरण में कुछ महीने गुज़ारने के बाद, नवम्बर २००९ में इस व्हाट्सएप एप्लीकेशन को iPhone के एप-स्टोर पर उतारा गया। कॉम ने फिर उस समय अपने एक पुराने साथी क्रिस पिफ्फेर, जो की लॉस एंजलिस में रहते थे, को आग्रह किया की वह व्हाट्सएप का ब्लैकबैरी संस्करण बनाएं। व्हाट्सएप का ब्लैकबेरी संस्करण बाज़ार में फिर दो महीने बाद ही आ पाया।

दिसम्बर २००९ तक iPhone में व्हाट्सएप के द्वारा इमेज (फोटो) भी भेजी जानें लगी। मध्य-२०११ तक तो व्हाट्सएप US के iPhone एप-स्टोर की शीर्ष २० डाउनलोड किये जाने वाली एप की सूची में शामिल हो गया।
फरवरी २०१३ तक तो व्हाट्सएप के प्रशंसकों और उपयोगकर्ताओं का आंकड़ा २०० मिलियन तक पहुँच गया, और व्हाट्सएप के कर्मचारियों की संख्या ५० हो गयी। व्हाट्सएप फेसबुक को बेचने से पहले, सीक्यूओइआ ने व्हाट्सएप में $ ५० मिलियन वापस निवेश किये। जिससे व्हाट्सएप का पूरा मूल्यांकन करीबन $ १.५ बिलियन तक पहुँच गया।

२४ अगस्त, २०१४ को कॉम ने अपने ट्विटर अकाउंट के हवाले से बताया की व्हाट्सएप के अब पूरे विश्व में ६०० मिलियन से भी अधिक उपयोगकर्ता हैं। व्हाट्सएप हर साल करीबन २५ मिलियन नए उपयोगकर्ता जोड़ता जा रहा है। जनवरी २०१५ की शुरुवात में व्हाट्सएप ने एक नयी ऊँचाई को छुआ। उस समय तक उसके उपयोगकर्ताओं की संख्या करीबन ७०० मिलियन तक पहुंच गयी और प्रत्येक दिन करीबन ३० अरब संदेशों का आदान-प्रदान होने लगा। अभी तक व्हाट्सएप के करीबन ८०० मिलियन उपयोगकर्ता हैं।

ईमेल का आविष्कार किसने किया?

आखिर ई-मेल का अविष्कार किसने किया, यह आज तक रहस्य ही बना हुआ है। १९७१ में APRANET के लिए ई-मेल बनाने का श्रेय वास्तव में ‘रे टॉमलिन्सन’ को दिया जाता है। १९७८ में, एक १४ वर्षीय बच्चे – शिव अय्यादुरै ने ईमेल फ्रेमवर्क पर अपना कार्य प्रारम्भ किया था। उसका प्रोजेक्ट था की उसे कागज़-आधारित ऑफिस मेल फ्रेमवर्क को इलेक्ट्रॉनिक रूप में बदलना था। १९८२ में उसने अपने इस उत्पाद को ‘ई-मेल’ के रूप में कॉपीराइट कराया था। अय्यादुरै का विवाद ये था कि जहाँ टॉमलिंसन ने त्वरित सन्देश भेजने के लिए केवल एक साधारण फ्रेमवर्क बनाया था, वहीँ अय्यादुरै ने ई-मेल का वह फॉर्म तैयार किया था जो की आज मौजूद है। इसीलिए ई-मेल के निर्माता का श्रेय उसे ही दिया जाना चाहिए ऐसा उसका कहना था।

इंटरनेट के कार्य प्रारम्भ करने से पहले ही ई-मेल का उपयोग उसी PC के विभिन्न ग्राहकों को संदेश भेजने के लिए किया जाने लगा था। परन्तु अगर अलग-अलग पीसी को आपस में किसी सिस्टम पर संपर्क साधना होता, तो यह प्रक्रिया थोड़ी जटिल हो जाती। समस्या यह थी कि आखिर अलग-अलग पीसी को अलग-अलग एड्रेस कैसे दें। ऐसा करने के लिए, एक ऐसे तरीके की ज़रुरत पड़ने लगी जिसके द्वारा हम ये बता सकें की आखिर सन्देश भेजना किसे है। ये एक पोस्टल फ्रेमवर्क की तरह ही था। ये ही कारण है की रे टॉमलिन्सन को ई-मेल का जनक कहा जाता है। टॉमलिन्सन ने एक APRANET के लिए एक वर्कर की तरह, बोल्ट बेरनेक और न्यूमैन के लिए काम किया। उसने ‘@’ प्रतीक का प्रयोग सन्देश को एक PC से दूसरे PC तक भेजने के लिए किया। उस समय, जो भी इंटरनेट के नियमों का उपयोग कर रहा था, उसके लिए बस इतना ही समझना काफी था की उसे उपयोगकर्ता के बाद ‘@’ प्रतीक लगा कर PC का नाम लिखना है। वेब उपयोग करने में अग्रणी जॉन पोस्टल, इस नये फ्रेमवर्क के प्रमुख ग्राहकों में से एक थे। उन्हें इस कार्य को एक ‘डिसेंट हैक’ की उपाधि देने के लिए भी जाना जाता है। और सच में ऐसा था भी और ऐसा अभी वर्तमान में है भी।

इंटरनेट के द्वारा बेशुमार सुविधायें प्रदान करने के बाद भी, आज भी, ई-मेल इंटरनेट का एक सबसे महत्वपूर्ण अंग बना हुआ है। पूरे विश्व में करीबन ६०० मिलियन लोग ई-मेल का प्रयोग कर रहे हैं। १९७४ तक ईमेल के कईं सारे सैन्य ग्राहक थे, क्योंकि APRANET ने इस बात के लिए उन्हें बहुत समय तक प्रोत्साहित किया था।

उस समय के बाद चीज़ें थोड़ी तेज़ी से होने लगीं। लैर्री रोबर्ट्स ने अपने प्रबंधक के लिए कुछ ई-मेल फ़ोल्डर्स बनाए ताकी उन्हें अपने मेल को अच्छे से रखने में आसानी हो। १९७५ में, जॉन विटटेल ने ई-मेल से सम्बंधित कुछ उत्पाद बनाए। १९७६ तक ई-मेल ने काफी लंबा सफ़र तय कर लिया, और उसका व्यापार मॉडल स्पष्ट दिखने लगा। २ से ३ साल के अंतर्गत ही APRANET की ७५% क्रियाओं को ई-मेल से जोड़ दिया गया।

प्रिंसिपल ईमेल मानक को एसएमटीपी (SMTP ), या सरल मेल ट्रांसफर प्रोटोकॉल कहा जाता था। उस समय एसएमटीपी बहुत बुनियादी था, लेकिन आज भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है।

वर्ल्ड वाइड वेब और उसके वेब इंटरफ़ेस की वजह से कईं ईमेल आपूर्तिकर्ता बहुत आसानी से उपलब्ध होने लगे, जैसे Yahoo और Hotmail। क्यूंकि ई-मेल सुविधाजनक था, इसलिए सभी के पास कम से कम एक ईमेल एड्रेस होने लगा, और इसी कारण इस अद्भुत माध्यम को ना केवल थोड़े बल्कि बहुत से लोगों ने गले लगा लिया और इसका प्रयोग शुरू कर दिया।

इंटरनेट का आविष्कार किसने किया?

आज हम जिस प्रकार के इंटरनेट के स्वरूप को जानते हैं और प्रयोग करते हैं, उस इंटरनेट के स्वरूप की उत्पत्ति के लिए हम किसी एक व्यक्ति को श्रेय नहीं दे सकते। इंटरनेट का वर्तमान स्वरूप बहुत से लोगों के सतत योगदान से प्राप्त हुआ है। इंटरनेट के वर्तमान स्वरूप की संरचना की शुरुवात १९६० के दशक के अंत में, कैलिफ़ोर्निया में हो गयी थी। जब ऑनलाइन विश्व का विचार विकसित ही हो रहा था, तभी कई शोधकर्ताओं ने पहले ही अपनी दूर दृष्टि से दुनिया में डेटा सिस्टम की उपस्थिति को बहुत ही प्रभावी ढंग से भांप लिया था। निकोला टेस्ला ने मध्य-१९०० में ‘वर्ल्ड रिमोट फ्रेमवर्क’ की संभावना को भांपा था और उसे प्रयोग करने और व्यवहारिक रूप देने का प्रयास भी किया था। १९४० के दशक में दूरदर्शी विद्वानों जैसे पॉल ओटलेट ने, किताबों और मीडिया के मोटर युक्त, और सुलभ क्षमता वाले फ्रेमवर्क के बारे में सोचा था।
अगर हम १९६० के पहले हुई सभी खोजो और विचारों को सम्मिलित भी कर लें, तो भी हम ये नहीं कह सकते की इंटरनेट की रचना मध्य-१९६० के पहले हो संभव हो पायी थी। मध्य-१९६० में MIT के जे.सी.आर. लिकलिडर ने पर्सनल कंप्यूटर के एक ‘इंटरगैलेक्टिक नेटवर्क’ की संभावना को पहचाना और बढ़ावा दिया।

इंटरनेट के अंतर्निहित विचार के लिए अगर हम किसी को श्रेय दे सकते हैं तो वह हैं लियोनार्ड क्लेनरॉक। उन्होंने ३१ मई, १९६१ में, अपने पहले पत्र को वितरित किया था, जिसका शीर्षक था, ‘इन्फॉर्मेशन फ्लो इन लार्ज कम्युनिकेशन नेट्स’। जैसा की पहले भी बताया गया कि १९६२ में जे.सी.आर. लिकलिडर IPTO के मुख्य निदेशक बन गए और फिर उन्होंने अपने गैलेक्टिक विज़न की दृष्टि को सबके सामने रखा। इसी प्रकार से, लिकलिडर और क्लेनरॉक के विचारों के साथ, रोबर्ट टेलर ने एक ऐसी प्रणाली की संभावना जताई जो बाद में चलकर ARPANET बनी। दिसम्बर, १९६८ में , नेटवर्क प्रणाली पर काम कर रहे लोगों ने अपनी पहली सभा आयोजित की। इस सभा का नेतृत्व एल्मर शापिरो ने किया और इस मीटिंग का सार उन्होंने SRI में अपनी रिपोर्ट ‘अ स्टडी ऑफ़ कम्युनिकेशन नेटवर्क डिजाईन पैरामीटर्स’ के रूप में दिया। इस मीटिंग में कई सारे प्रतिभागी थे, जैसे स्टीव कार्र, स्टीव क्रॉकर और रौन स्टाउटन। उन्होंने सभा में उन मुद्दों पर चर्चा की जो मेज़बानों के दिमाग में पहले से ही थे और जो आपसी बातचीत से सामने निकाल कर आये थे।

पॉल बरन, थॉमस मारिल और अन्य लोगों के काम करने से पहले ही लॉरेंस रोबर्ट्स और बैरी वेसलेर ने, ‘इंटरफ़ेस मेसेज प्रोसेसर’ (IMP IMP) का विवरण दे दिया था। बाद में, IMP सब नेटवर्क की रूपरेखा और निर्माण का ज़िम्मा जोल्ट बेरनेक और न्यूमन, इंक (BBN) को दे दिया गया था। इंटरनेट जैसे अभिनव विचार के लिए (जो की इतना विस्तृत है और जो निरंतर परिवर्तित हो रहा है) किसी भी एक व्यक्ति को इसका श्रेय नहीं दिया जा सकता। इंटरनेट की उत्पत्ति का श्रेय बहुत से शोधकर्ताओं, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों और विशेषज्ञों को देना होगा, जिन्होंने बहुत से नए आयामों और विचारों पर रौशनी डाल कर एक ऐसे ‘डाटा सूपरहाईवे’ की संरचना की, जिसे हम आज इंटरनेट के नाम से जानते हैं और प्यार करते हैं।

इंटरनेट का मुख्य व्यवहारिक मॉडल १९६० के दशक के अंत में, ARPANET की उत्पत्ति के साथ आया था। APRANET ने एक इकलौते सिस्टम की मदद से बहुत से कंप्यूटरों को आपस में जोड़ दिया था, जिससे की आसानी से सूचना का आदान-प्रदान होने लगा था। इन संशोधानोंका का विकास १९७० तक होता रहा। १९७० के दशक में ही शोधकर्ता रॉबर्ट काह्न और विनटन ने  TCP/IP बनाया, जो की बहुत से कंप्यूटर सिस्टम्स के बीच सूचना के आदान-प्रदान का मुख्य प्रोटोकॉल था। APRANET  ने १९८३ में  TCP/IP  को अपना हिस्सा बना लिया। १९९० में ऑनलाइन वर्ल्ड के सामने वापस चुनौती तब आई, जब PC शोधकर्ता टिम बर्नर्स ने ‘वर्ल्ड वाइड वेब’ बनाया। हालांकि, वर्ल्ड वाइड वेब को ही कुछ लोग इंटरनेट समझ लेते है, पर ऐसा नहीं है। वर्ल्ड वाइड वेब तो वास्तव में ऑनलाइन सूचना एकत्रीकरण का एक सबसे आसान और जाना-माना तरीका है। साइट्स और हाइपरलिंक्स की मदद से हम आसानी से किसी भी सूचना को ढूंढ सकते हैं। इंटरनेट के साथ-साथ अब वेब भी आधुनिक हो गया है और ऑनलाइन डेटा के अंतहीन भंडारण का एक प्रधान आधार बन चुका है।

माचिस कैसे बनता है?

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अलग-अलग निर्माता माचिस को अलग-अलग तरीके से बनाते हैं। लेकिन माचिस बनाने की मूल प्रक्रिया तकरीबन एक जैसी ही रहती है। माचिस की तिल्लियां बनाने के लिये लकड़ी ऐसी होनी चाहिए की जिस पर भिन्न-भिन्न रासायनिक तत्वों को आसानी से लगाया जा सके, और वह उन्हें कुछ हद्द तक सोख भी ले। साथ ही साथ लकड़ी की कठोरता भी इतनी होनी चाहिए कि वह उस पर जलाने के लिए लगाए जाने वाले दबाव को सहन कर सके और टूटे ना। केवल इसी प्रकार की लकड़ी को ही छोटी-छोटी तिल्लियों के रूप में काटा जाता है। आमतौर पर, माचिस की तिल्लियां बनाने के लिए या तो सफ़ेद देवदार की लकड़ी या फिर ऐस्पेन की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है।

माचिस की तिल्लियों को आकार दिये जाने के बाद उन्हें अमोनियम नाइट्रेट में डुबाया जाता है, जिससे की वह माचिस की तिल्लियां उसे सोख लें। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि माचिस की तिल्लियां ऊपरी रसायन (जो की जलाया जाता है) के ख़त्म होते ही बुझ ना जाए। दरअसल, माचिस की तिल्लियों के निर्माण की प्रक्रिया में माचिस की तिल्लियों के ऊपरी भाग को गर्म पैराफिन वैक्स में डुबाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि इस पैराफिन वैक्स में डूबी हुई लकड़ी की नोक को जब सिंथेटिक सतह पर रगडा जाता है तब इस रगड़ के कारण उसे आग पकड़ने में आसानी होती है। इसके बाद अमोनियम फॉस्फेट माचिस की तिल्लियां को जलते रहने में मदद करता है।

इन छोटी सी माचिस की तिल्लियों का सिरा दो भागों में बंटा होता है – नोक और उसका अंदरूनी भाग। नोंक में तो फॉस्फोरस सेस्क्यूफल्फाइड और पोटेशियम क्लोराइट का मिश्रण होता है। फॉस्फोरस सेस्क्यूफल्फाइड किसी कठोर सतह से रगड़ खाने पर बहुत आसानी से जल उठता है। और पोटेशियम क्लोराइट जलाने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। नोंक पर साथ ही साथ कुछ चूरा किया हुआ कांच भी होता है जिससे की माचिस की तिल्लिययों की उपभोग दर को नियंत्रण में रखा जा सके। इसके अतिरिक्त, ऐसा भी हो सकता है की नोंक को सफ़ेदी देने के लिए इसमें थोडा सा जिंक ऑक्साइड भी मिलाया गया हो। नोंक के आधार में सल्फर, रोजिन और थोड़ी सी मात्रा में पैराफिन वैक्स होता है जो माचिस की तिल्लियां को जलने में मदद करता है। आधार को रंग देने के लिए इसमें कईं बार ऐसा रंग भी डाला जाता है जो पानी में घुल सके।

माचिस का डिब्बा बनाने के लिए कार्डबोर्ड का प्रयोग किया जाता है। माचिस की तिल्लियों का उत्पादन अनेक चरणों में होता है। सबसे पहले तो माचिस की तिल्लियों को काटा जाता है, फिर उन्हें एक विशिष्ट तरीके से व्यवस्थित किया जाता है तथा इसके बाद इन्हें इकट्ठा किया जाता है। जब भी माचिस की तिल्लियों की ज़रुरत होती है, तो इन्हें एक पंक्चर हुए बेल्ट में लगा दिया जाता है। और जब माचिस की तिल्लियां सूख जाती हैं, तो वह बेल्ट उन तिल्लियों को ‘बंडलिंग ज़ोन’ में ले जाता है। इस बंडलिंग ज़ोन में एक बहुत से दांतों वाला पहिया घूमता रहता है, जो इन तिल्लियों को बेल्ट में से निकाल कर एक कंटेनर में डाल देता है। इस कंटेनर में इनका सही माप किया जाता है ताकि इन्हें माचिस के डिब्बे में आसानी से डाला जा सके। कंटेनर में से, इन तिल्लियों को, गत्ते के डिब्बों के अंदरूनी भाग में डाला जाता है। ये गत्ते के डिब्बे कंटनेर के नीचे लगी एक ट्रांसपोर्ट लाइन पर निरंतर चलते रहते हैं। एक बार में करीबन १० माचिस के डिब्बे भरे जाते हैं। संक्षेप में कहें तो बेल्ट माचिस के उत्पादन की प्रक्रिया को पूरा करता है, जहाँ माचिस की तिल्लियों को टैंक में डाला जाता है, सुखाया जाता है और फिर माचिस के डब्बों में भरा जाता है।

माचिस के डिब्बों के उत्पादन की प्रक्रिया में, सबसे पहले माचिस के डिब्बों के अंदरूनी और बाहरी हिस्सों को काटा जाता है, फिर उस पर प्रिंट किया जाता है और फिर उन्हें एक साथ जोड़ा जाता है। माचिस के डिब्बों का बाहरी भाग एक अलग ट्रांसपोर्ट लाइन पर चलता है, जो की प्राथमिक बेल्ट के समानांतर होता है। दोनों ही बेल्ट जल्दी ही रुक जाते हैं। उसके बाद माचिस के डिब्बे के अंदरूनी भाग को उसके बाहरी भाग के अंदर डाल दिया जाता है। और यह माचिस के डब्बे के अंदरूनी भाग को बाहरी भाग में डालने की प्रक्रिया, प्रत्येक एक सेकंड में एक बार दोहराई जाती है। माचिस की भरी हुई डिब्बियां फिर किसी परिवहन की मदद से एक मशीन तक पहुंचाई जाती हैं। यह मशीन इन माचिस की डिब्बियों को अच्छे से जमा कर एक बड़े गत्ते के डिब्बे में बंद कर देती है, जिससे की इन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके।

माचिस का आविष्कार किसने किया ?

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माचिस एक आम घरेलू चीज है जिसका उपयोग अग्नि को प्रज्ज्वलित करने के लिए किया जाता है।आमतौर पर, वर्तमान दिनों मे ‘माचिस’ छोटे लकड़ी की छड़ें या फर्म पेपर से बनी होती हैं। इसका एक छोर एक ऐसी सामग्री से ढका हुआ है जिसकी तिल्ली को रगड़ कर उत्पादित घर्षण से अग्नि को प्रज्वलितकिया जाता है। माचिस छड़ी कैसे अस्तित्व में आयी? यह सब फॉस्फोरस से शुरू हुआ। १६६९ में, फॉस्फोरस का शोध लगाया गया था और अब इसे माचिस हेड के हिस्से के रूप में उपयोग किया जाता है।

माचिस की तिल्ली बनाने का पहला प्रयास १६८० में हुआ था जब रॉबर्ट नाम के एक आयरिश भौतिक विज्ञानी ने फ़ास्फ़रोस और सल्फर से आग पैदा किया ।  दुर्भाग्यवश, उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप कोई उपयोग करने योग्य कार्य नहीं हुआ, क्योंकि सामग्री अत्यधिक ज्वालाग्राही थी।

उसके बाद एक शताब्दी बीत गई लेकिन शोधकर्ता उस वक़्त भी एक स्व-प्रकाश लौ बनाने के तरीके के बारे में सबसे अच्छी संरक्षित विधि को तैयार नहीं कर सके थे, जिसका उपयोग सामान्य जनता द्वारा किया जा सके। संरक्षित माचिस (safety-match) बनाने का हल्कासा प्रेरणास्त्रोत १७ वीं शताब्दी के मध्य में केमिस्ट ‘हेनिग ब्रांट’ के विविध संशोधनोंसे प्राप्त हुआ, जिसकी पूरी जिंदगी विभिन्न धातुओं से सोने बनाने के संशोधन में बित गयी थी। अपने शोध के दौरान, उन्होंने यह पता लगाया कि शुद्ध फास्फोरस कैसे निकालें और अपनी दिलचस्प दहनशील संपत्तियों का परीक्षण कैसे करें। इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने अपनी उत्प्रेरक जांच में फॉस्फर को अलग करने की विधि का संशोधन किया, उनके लिखे गए नोट्स नए शोध प्रवर्तकोंके लिए उनके भविष्य की संभावनाओंके लिए मिल का पत्थर साबित हुए।

जो आज हम उपयोग करते है उस छोटी सुरक्षित माचिस का विचार सबसे पहले संभवतः १८२७ में अंग्रेजी वैज्ञानिक और फार्मासिस्ट ‘जॉन वॉकर’ को आया, जिन्हे लगा की अगर हम माचिस के तिल्ली के सिर (Head) को अगर विशिष्ट रसायनों के साथ ढक लिया, और उन्हें सूखने दिया जाये तो बादमे उस सुखी हुई तिल्लीको कही भी स्ट्राइक करके आग लग सकती है। ये मुख्य घर्षण बिंदू थे, जिन्हें रगड़ने की आवश्यकता थी। मुख्य रासायनिक मिश्रण के रूप में एंटीमोनी सल्फाइड, पोटेशियम क्लोराइट और स्टार्च का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने सबसे पहले माचिस का प्रस्ताव ७ अप्रैल, १८२७ को शहर के एक विशेषज्ञ श्री हिक्सन को दिया था।वॉकर ने अपने शोध-विकास से थोड़ा लाभ कमाया। इसके बाद तो उन्होंने अधिक संशोधन करके दुनिया को छोटी सी माचिस से अचंभित कर दिया और अपने व्यवसाय को अधिक ऊंचाई पर लेकर खड़ा किया ।

जिस मैच-स्टिक को हम आज जानते हैं उसे “सुरक्षा माचिस” भी कहा जाता है, क्योंकि यह आग लगने पर ही रोशनी करता है। यह जानना कितना आश्चर्यजनक है कि कैसे एक छोटी सी मैच छड़ी अद्भुत काम कर सकती है! वास्तव में हमने आग को आज मुट्ठी में बंद कर दिया है जोकि कुछ समय पहले लगभग असंभव सी चीज थी।