चार्ल्स बैबेज कौन थे ?

चार्ल्स बैबेज का जन्म, लन्दन के एक आमिर घराने से सन 1791 में हुआ था ।

उनके माता पिता का नाम बेंजामिन और एलिज़ाबेथ था। उनके पिता लन्दन में बैंकर थे। बेंजामिन के 4 बच्चे थे लेकिन, बचपन में बस चार्ल्स और उनकी बहन मैरी अन्न ही बच पायीं। इकलौता बेटा होने के कारन बेंजामिन ने चार्ल्स को अच्छे अच्छे स्कूलों में भेजा। ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज के ट्रिनिटी collage से उन्होंने सन 1810 में पढाई पूरी की।

16 – 17 साल की उम्र में उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड के एक tutor से कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के लिए तैयारी की।

1810 में उन्होंने कैंब्रिज में दाखिला लिया और 1814 तक वो ग्रेजुएट हो गये। इस दौरान उन्होंने कैंब्रिज में बहुत कुछ किया। वे कैंब्रिज के टॉप क्लास के गणितज्ञ बन चुके थे।

उन्होंने जॉन हेर्चेल और जोर्ज पीकॉक के साथ मिलकर एनालिटिकल सोसाइटी की स्थापना की।

चार्ल्स बैबेज को father ऑफ़ कंप्यूटर के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने Difference Engine और Analytical Engine बनायी, हलाकि ये दोनों इंजन जैसा चार्ल्स बैबेज ने सोचा था वैसा नही बन पाए थे लेकिन उस समय के हिसाब से ये काफी पावरफुल चीज़ थे।

उन्होंने इतिहास का पहला कंप्यूटर बना दिया था।

Difference Engine गुणा और जोड़ करने में सक्षम था, Analytical Engine पहला ऐसा मशीन था जो प्रोग्राम किया जा सके यह सोच कर बनाया गया था, जैसा की आज मॉडर्न डे में हम कंप्यूटर को प्रोग्राम करते हैं।

हलाकि पोलिटिकल और इकनोमिक कारणों से उनका Analytical Engine इंजन कभी पूरा नही हो पाया।

चार्ल्स बचपन से ही तेज तर्रार थे। वे एक मैथमेटिकल और मैकेनिकल जिनिअस थे। कहा जाता है की चार्ल्स स्कूल में अलजेब्रा खुद ही सिख गये थे क्यों की वे अज्लेब्र से बहुत ही मन मोहित थे।

चार्ल्स को गणित में इतना इंटरेस्ट था की जब वे हाई स्कूल गये तब 3 बजे से सुबह 5 बजे तक छुपकर स्कूल जाते थे ताकि वे खुद से कैलकुलस पढ़ पाए।

25 साल की उम्र में वे रॉयल सोसाइटी के मेम्बर बन चुके थे। बाद में उन्हें Lucasian Professor of Mathematics का इनाम भी मिला। यह इनाम इसाक न्यूटन को भी मिला था।

चार्ल्स रिलिजन और भगवान में भी विश्वास करते थे। वे मानते थे की इस दुनिया का सबसे बड़ा प्रोग्रामर भगवान ही हैं।

ट्विटर Twitter का आविष्कार कैसे हुआ

फेसबुक की तरह ट्विटर भी एक सोशल मीडिया का स्त्रोत है, जो दुनिया भर के लोगों से जुड़ने में सहायक होता है तथा किसी भी विषय के बारे में जानकारी ग्रहण करने तथा व्यक्तिगत विचार व्यक्त करने में सहयोगी होता है।

जैक डॉर्सी, नोह ग्लाज़्, बिज़ स्टोन, इवान विलियम्स को ट्विटर के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। 21 मार्च 2006 को ट्विटर की स्थापना की गई थी।

सेन फ्रांसिस्को, केलिफोर्निया, यूनाइटेड स्टेट्स में ट्विटर का मुख्यालय स्थित है।

ट्विटर पर लिखित रूप से कोई जानकारी साझा करने या पोस्ट करने की प्रक्रिया को ट्विट करना कहा जाता है।

एक ट्विट में लिखने की अधिकतम सीमा 140 वर्णों की होती है अर्थात् एक ट्विट में 140 से अधिक वर्णों का इस्तेमाल नही किया जा सकता, परन्तु ट्विट करने की सीमा निर्धारित नही है। उपयोगकर्ता अपनी इच्छानुसार कितने भी ट्विट कर सकता है।

दुनियाभर में चल रहे चर्चित विषयों की जानकारी पाने के लिए तथा उन मुद्दों पर अपने विचार प्रकट करने के लिए ट्विटर एक अच्छा माध्यम है। ट्विटर में लोगों के द्वारा किसी विशेष विषय पर ट्विट किये जाते है, जिन्हें हम ट्विटर खाता (अकाउंट) बनाये बिना भी पढ़ सकते हैं, परन्तु उस ट्विट पर अपने विचार साझा करने के लिए या सवाल-जवाब के लिए ट्विटर खाता बनाना आवश्यक होता है।

कैसे बनाये ट्विटर पर अपना अकाउंट:

ट्विटर खाता बनाने का कार्य अत्यन्त सरल है। इसके लिए मोबाईल नम्बर से ट्विटर में साइन-अप करना पड़ता है, जिससे खाता निर्माण होता है|

ट्विटर पर हम जिनको फ़ॉलो करते हैं, उन्ही के ट्विट हमारी होमस्क्रीन पर दिखाई देते हैं। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि हम जिनके ट्विट पसन्द करते हैं तो इस देखने के लिए उन्हें ट्विटर पर फ़ॉलो करना पड़ता है। जैसे किसी सेलिब्रिटी के अद्यतन ट्विटस को देखने के लिए हमें उस सेलिब्रिटी को फ़ॉलो करना होगा।

कैसे कार्य करता है ट्विटर:

ट्विटर पर यदि हमे किसी व्यक्ति का कोई ट्विट पसन्द आ जाता है और हम उसे आगे शेयर करना चाहे तो हम उस ट्विट को दुबारा ट्विट करते हैं। इस प्रकार से ट्विटर पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किये गए ट्विट को दुबारा ट्विट करने की प्रक्रिया को रिट्वीट करना कहते हैं।

ट्विटर हैशटैग पद्धति पर आधारित है। ट्विटर में ट्विट करने के लिए सम्बन्धित व्यक्ति या विषय को मुख्य रूप से दिखाने के लिए आधार प्रदान करने के उद्देश्य से हैशटैग (#) का इस्तेमाल किया जाता है। इस हैशटैग के अनुसार ही उस विषय में चर्चा आगे बढ़ाई जाती है। खोजने के विकल्प का उपयोग आसान बनाने में भी हैशटैग का मुख्य योगदान है।

ट्विटर एप के कुछ विकल्प फेसबुक की तरह ही है। इस पर फोटो भी शेयर की जाती है। ट्विटर उपयोगकर्ता द्वारा किये गए ट्वीट्स व फ़ोटो को पब्लिक कर दिए जाने पर यह सभी को दिखाई देती है, परन्तु इसमें सिक्योरिटी सम्बन्धी विकल्प भी दिए होते हैं, जिससे प्रत्येक व्यक्ति द्वारा न देखे जाने की भी सुविधा होती है। इसे केवल अपने फॉलोअर्स तक सीमित रखा जा सकता है। जो लोग हमें ट्विटर पर फ़ॉलो करते हैं, उन्हें फॉलोअर्स कहा जाता है।

आज के समय में लाखों की संख्या में ट्विटर पर अकाउंट बनाये जा चुके है एवं रोजाना कई नए लोग इससे जुड़ रहे है| सोशल नेटवर्किंग ने दुनिया को जैसे आपकी मुठ्ठी में लाकर खड़ा क्र दिया है|

आप कही भी हो, अपने विचार लोगों के समक्ष रख सकते है एवं अपने रोल मॉडल के विचार भी जान सकते है| उम्मीद है आपको यह जानकारी पसंद आई होगी, आपकी ट्वीटर को लेकर क्या सोच है ये हमसे जरुर शेयर करे एवं कमेंट बॉक्स में अपनी राय अबश्य दे|

सामान्यतः लोगों का यह मानना है कि ट्विटर का इस्तेमाल सेलिब्रिटी व बड़ी हस्तियों के द्वारा ही किया जाता है। आये दिन समाचारों में भी सुनने में मिल जाता है कि अमुक सेलिब्रिटी के द्वारा किये गए ट्विट के संबंध में  शीत युद्ध हुआ या चर्चा हुई या किसी बड़ी हस्ती द्वारा किया गया ट्विट चर्चा का विषय बना। इस वजह से आम लोगों की धारणा बन गयी कि ट्विटर केवल विशेष व्यक्तियों द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली एप है, परन्तु यह केवल एक मिथ्या है, क्योंकि इसमें ऐसी किसी भी शर्तों का वर्णन नही किया गया है। फेसबुक की तरह ही ट्विटर एक ऐसी एप है, जो किसी भी व्यक्ति द्वारा सामान्य रूप से ट्विटर खाता बनाकर इस्तेमाल की जा सकती है।

कैसे बनी फेसबुक How Facebook was created?

सोशल मीडिया का जाना पहचाना स्त्रोत है- फेसबुक। आज के समय में युवाओं में फेसबुक सर्वाधिक प्रचलित है। अपने पुराने साथियों से जुड़े रहने व दुनियाभर में भिन्न-भिन्न लोगों से सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने में फेसबुक सहयोगी सिद्ध होती है।

सन् 2004 में हार्वर्ड के एक विद्यार्थी ने यह एप बनाई थी, जिनका नाम है- मार्क जुकरबर्ग। शुरुआत में एप का नाम “द फेसबुक” था। उस दौर में यह स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों में धीरे-धीरे उपयोग में लाई जाने लगी व इसके बाद पूरे यूरोप में इसका प्रचलन बढ़ गया। सन् 2005 में इसका नाम “फेसबुक” कर दिया गया तथा आज भी इसी नाम से प्रचलित है। आज विश्व भर में फेसबुक का प्रयोग जोर-शोर से हो रहा है और इसकी विशेषता यह है कि इसे विभिन्न भाषाओं में उपयोग करने के विकल्प भी उपलब्ध है।

फेसबुक के संस्थापक:

मार्क जुकरबर्ग इसके प्रमुख संस्थापक हैं तथा इनके साथ सहयोगी रहे एडुआद्रो स्वेरिन, डस्टिन मस्कोविट्ज़, क्रिस व्हूजेज  को फेसबुक के सह-संस्थापक के रूप में जाना जाता है।

फेसबुक के विषय में उल्लेख करने से पहले हमें इसके संस्थापक के जीवन के सम्बन्ध में कुछ जानकारी देनी आवश्यक है।

मार्क एलियट जुकरबर्ग का जन्म 14 मई 1984 को न्यूयॉर्क में एक यहूदी परिवार में हुआ था। जुकरबर्ग की धर्म के प्रति कोई आस्था नही थी, वे नास्तिक प्रवृति के हैं। इनके पिता का नाम एडवर्ड जुकरबर्ग है तथा माता का नाम कैरेन केम्परेन् है। इनकी पत्नी का नाम प्रिसिला चेन है। इनकी बचपन से ही कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में विशेष रूचि थी। इसी रूचि के फलस्वरूप इन्होनें फेसबुक बनाई थी।

फेसबुक का उपयोग व उपयोगिता:

फेसबुक उपयोग करने के क्रम में प्रथम कार्य खाता बनाने का होता है। इसके बाद अपनी फेसबुक प्रोफाइल तैयार करने हेतु निजी ब्यौरा देना होता है। प्रोफाइल हेतु अनेक विकल्प दिए होते हैं, जिसमें नाम, शहर, राज्य, फोटो, अध्ययन सम्बन्धी ब्यौरा, जन्मतिथि, कार्यक्षेत्र, नौकरी या व्यवसाय। इसमें से सभी विकल्पों को भरना अनिवार्य नही होता है, परन्तु सभी को रिक्त नही रखा जा सकता, क्योंकि कुछ विकल्प प्रोफाइल निर्माण हेतु आवश्यक व अनिवार्य होते है। इस प्रोफाइल के जरिये ही फेसबुक पर हम अन्य व्यक्तियों को ढूंढ सकते हैं तथा अन्य व्यक्ति हमें ढूंढ सकते हैं तथा फेसबुक मित्र बन सकते हैं।

फेसबुक पर समूह निर्माण की भी सुविधा उपलब्ध होती है। इसमें बहुत से लोगों का जुड़ाव होता है। यह समूह विद्यालय या कॉलेज या ज्ञान सम्बन्धी विषय का या हास्य या व्यवसाय या धर्म अर्थात् किसी भी प्रकार का समूह हो सकता है, जिसमें एकता रखने वाले लोगों को जोड़ा जाता है। इसमें जुड़ने के लिए व्यक्ति को आमंत्रण भेजा जाता है। वह स्वेच्छा से स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है। इसी के साथ स्वीकार करने के बाद चाहे तो स्वीकृति रद्द भी जा सकती है। इस प्रकार समूह के जरिये भी श्रंखलाबद्ध रूप से लोग आपस में जुड़ते रहते हैं।

फेसबुक पर कोई भी फोटो या अपनी फोटो डालना व शेयर करना, स्टेटस अपलोड करना जैसे हम कुछ विशेष कर रहे हैं या कहीं जा रहे हैं; सम्बन्धी जानकारी को अपने फेसबुक मित्रों के साथ बाँटना आदि सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं।

इसके अतिरिक्त फेसबुक पर स्वयं का पेज बनाने की भी व्यवस्था है। जैसे अपनी व्यैक्तिक कला सम्बन्धी प्रदर्शन करने के लिए या अपने किसी व्यवसाय या कार्य का विज्ञापन करने के लिए पेज बनाकर प्रस्तुतिकरण किया जाता है तथा फेसबुक पर लोगों को अपने पेज को पसन्द करने के लिए आमन्त्रित किया जाता है।

सुरक्षा विकल्प:

इन सब के अलावा फेसबुक उपयोगकर्ता के लिए सुरक्षा सम्बन्धी विकल्प भी दिए होते हैं, जिनमें उपयोगकर्ता अपनी व्यक्तिगत सूचना, फोटो, स्टेटस आदि को अनजान लोगों से छुपाने के लिए व कमेंट पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए ऐसे विकल्पों का चयन कर सकता है।

यदि उपयोगकर्ता किसी व्यक्ति के द्वारा फेसबुक पर सन्देश भेजने या अन्य किसी भी कारण से कोई परेशानी का अनुभव करता है तो इसमें ब्लॉकिंग का भी विकल्प होता है। इसमें ब्लॉक कर दिए जाने के बाद वह व्यक्ति फेसबुक की प्रोफाइल खोलने व सन्देश भेजने में असमर्थ हो जाता है।

फेसबुक के दुष्परिणाम या दुष्प्रभाव:

चूँकि फेसबुक इंटरनेट के द्वारा चलित एप है, तो सम्भवतः इंटरनेट के कारण बहुत से दुष्प्रयोग किये जा रहे हैं। कुछ लोगों द्वारा जानबूझकर लोगों से जुड़ने के लिए या परेशान करने के लिए अपनी असली पहचान उजागर न करते हुए नकली फेसबुक प्रोफाइल बनाई जाती है, जिसे फेक आई डी कहते हैं।

जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने के लिए फेसबुक पर जाति सम्बन्धी फोटो डाली जाती है, टिप्पणियाँ की जाती है तथा समूह बनाये जाते हैं, जिनसे जातिगत हिंसा को बढ़ावा मिलता है।

धर्म सम्बन्धी चर्चा हेतु बनाये गए समूह व धार्मिक भेदभाव को प्रदर्शित करने वाली फ़ोटो के द्वारा अभिन्न धर्मों के लोगों के मध्य आपसी रंजिश पैदा होती है। 

इसी प्रकार फेसबुक के माध्यम से ओर भी कई प्रकार के व्यक्तिगत विषयों पर हो रही चर्चा से आपसी मतभेद उत्पन्न होता है। कुछ रहस्य के रूप में रखी जाने वाली कुछ बातें सार्वजनिक हो जाने से झगड़े के कारण पैदा होते हैं|

मोबाइल का आविष्कार कैसे हुआ | The Invention of Mobile Phone in Hindi

आधुनिक युग में ऐसा कोई नहीं जो मोबाइल के प्रयोग से अछुता हो| बच्चे से लेकर बड़े तक मोबाइल का इस्तेमाल करते है| मोबाइल ने आज पूरे संसार को आपकी मुठी में लाकर खड़ा कर दिया है|

आज आप कही भी हो, हमेशा अपनों से जुड़े रह सकते है, कही भी किसी से बात कर सकते है, किन्तु कभी आपने यह सोचा कि मोबाइल को किसने बनाया, कैसे बनाया, कैसे यह विकास के अलग-अलग पहलुओ से होकर गुजरा और आज जो android डिवाइस जिसके आप आदी हो चुके है, कुछ समय पहले किसी ने सोचा तक नहीं होगा इसके बारे में|

यहाँ हम मोबाइल से जुड़े सभी तथ्यों एवं जानकारी के बारे में जानने का प्रयास करेंगे|

कैसे बना मोबाइल?

Martin Cooper और John F. ने 1973 ई. में सबसे पहले मोबाइल का अविष्कार किया जो Motorola का फ़ोन था एवं व्यवसायिक रूप से यह 1983 में प्रयोग में आना शुरू हुआ|

सिम कार्ड जिसके बिना मोबाइल को चलाना मुमकिन नहीं इसका अविष्कार 1991 में Munich Smart कार्ड Maker Giesecke and Devrient द्वारा बनाया गया था|

फर्स्ट Generation या 1G cellular Network का प्रारंभ जापान द्वारा 1979 ई. में किया गया था|

2G network की शुरुआत फ़िनलैंड द्वारा 1991 में की गई थी एवं ठीक 10 साल बाद 3G network अस्तित्व में आया जिसे जापान द्वारा बनाया गया| अब तक 4G नेटवर्क आ चुका है एवं 5G को लाने पर खोजबीन जारी है|

केवल 20 वर्षों में मोबाइल का प्रयोग करने वाले करीब 700 करोड़ users बने एवं इसकी लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढती चली गई|

सबसे ज्यादा smart मोबाइल बनाने वाली कम्पनीज में Samsung, Apple, Nokia आदि के नाम प्रसिद्ध है|

2014 तक अकेले Samsung ने दुनिया में प्रयोग होने वाले मोबाइल्स का 25% बनाया एवं Nokia का योगदान इसमें 13% रहा|

मोबाइल से जुड़े कुछ आश्चर्यजनक तथ्य:

सबसे पहले मार्किट में आने वाला मोबाइल Motorola का था जिसका नाम डायना टीएसी था जिसकी कीमत करीब 2 लाख रूपये थी एवं वजन में भारी था, इसलिए इसके मार्किट में उतारने से पहले कुछ हल्का किया गया| इसे १ बार चार्ज करने के बाद आप 35 से 40 मिनट तक बात कर सकते थे|

ब्रिटेन में सबसे पहले मोबाइल फ़ोन की शरुआत ‘एरिन वाइज’ द्वारा 1985 में वोडाफोन के कार्यालय में फ़ोन करके की गई थी|

वोडाफ़ोन कम्पनी को अपने लाखों ग्राहकों से जुड़ने के लिए 9 साल लगे किन्तु ओ2 नामक कम्पनी ने sellnet सेवा द्वारा केवल २ वर्षो में डस लाख का आंकड़ा पर करके वोडाफोन के एकाधिकार को खत्म कर दिया|

कोई भी वाहन चलाते समय मोबाइल के प्रयोग पर पाबन्दी लगा दी गई जिसमे भारत के साथ अन्य देशो में यह कानून लागू कर दिया गया|

वर्ष 2007 में एक नामी कम्पनी ने कुत्तों के लिए मोबाइल फ़ोन बनाया जिसमे GPS सिस्टम लगा हुआ था जिससे आप अपने कुत्ते को कही भी ट्रेक कर सकते थे एवं इसकी कीमत 25,000 थी|

Wireless World कांफ्रेंस में सबसे पहले टचस्क्रीन वाला smart फ़ोन पेश किया गया, इसके द्वारा आप मेल सेवा, कैलकुलेटर, कैलेन्डर, पेजर आदि का लाभ उठा सकते थे|

फरीदेलेहम नामक इंजिनियर ने 160 शब्द की टेक्स्ट सीमा की शुरुआत की जो कि जर्मनी से थे एवं एक अच्छे टाइपिस्ट थे|

साल 2012 में Samsung, Apple, एवं अन्य कम्पनीज के करीब 1अरब 70 करोड़ हैंडसेट बिके|

अब तक सबसे ज्यादा बिकने वाला मोबाइल फ़ोन का रिकॉर्ड नोकिया कम्पनी के 1100 मॉडल के नाम पर है, मार्किट में आने के साथ ही इसके करीब 25 करोड़ सेट बिक चुके एवं अभी तक इतने बड़े रिकॉर्ड को कोई कम्पनी नहीं तोड़ पाई|

केवल ब्रिटेन में 2011 में दो सौ अरब से अधिक टेक्स्ट मेसेज एक दूसरे को भेजे गये जिसमे से अधिकांश 11 से 16 साल के बच्चे थे| सबसे पहला sms 1992 में नील पोप्वोर्थ ने अपने एक दोस्त को भेजा था जिसमे उन्होंने लिखा था Marry Christmas|     

आधुनिक समय में इस्तेमाल होने वाले मोबाइल फ़ोन द्वारा आप नेट बैंकिंग, टिकेट booking, नेट सर्फिंग, बिज़नस प्रमोशन, एवं किसी भी प्रकार की जानकरी प्राप्त कर सकते है|

भारी वजन के साथ शुरू होकर आज एकदम हल्के एवं दिखने में आकर्षक smart फ़ोन हर प्रकार की रेंज में बाजार में उपलब्ध है| उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा की मोबाइल फ़ोन का इतिहास इतना जबर्दस्त एवं तेजी से बदलने वाला होगा|

आज के युवा अपना अधिकतर समय फेसबुक, Whtsapp, ट्विटर, आदि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिताते है, इसमें एक बहुत बड़ा भाग गेम्स के लिए भी जाता है|

अमेरिका में वर्ष 2007 में i-Phone को लांच किया जिसको लेने के लिए लोग रात भर लाइन में लगे थे पर कुछ समय बाद एप्पल का यह फ़ोन लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया|

अपनी बेजोड़ मजबूती के लिए मशहूर सोनिम xp फ़ोर्स मोबाइल को गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया गया है, इसे 84 फीट से नीचे फेंका गया एवं 2 मीटर पानी में डुबाया गया जिसके बाद भी मोबाइल को कोई नुकसान नहीं हुआ एवं पहले के जैसे वर्किंग मोड में रहा| इसके अलवा और भी फ़ोन है जो पानी में खराब नहीं होते|

अब तक के सबसे महंगे फ़ोन की कीमत 7,850,000 डोलर है जो एप्पल द्वारा बनाया गया है एवं इसमें 500 हीरे लगे हुए है जो 100 कैर्रेट के है, मोबाइल का पिछला कवर गोल्ड का बना हुआ है एवं देखने में यह शानदार है, एप्पल कम्पनी का प्रसिद्ध लोगो भी डायमंड्स का बना हुआ है|

शायद ही आपको पता हो कि मोबाइल बनाने से पहले नोकिया पेपर बनाने का काम करती थी इसके साथ ही यह प्लास्टिक एवं रबर के उत्पाद बनाया करती थी परन्तु मोबाइल जैसी डिवाइस बनाकर इसने सबको हैरान कर दिया|

अब तक के आकड़ो के अनुसार, फिलिपीन में सबसे ज्यादा टेक्स्ट मेसेज एक दुसरे को भेजे जाते है|

आज के समय में जियो ने इन्टरनेट सेवा की दरो को काफी हद्द कम करके भारत में इसके प्रयोग को और भी सुविधाजनक बना दिया है|

निष्कर्ष:

जैसा कि प्रत्येक अविष्कार के साथ होता है, इसके पॉजिटिव एवं नेगिटिव दोनों पहलु होते है| ऐसे बहुत से मामले सामने आये जिसमे मोबाइल की बैटरी में ब्लास्ट होने से लोग बुरी तरह जख्मी हुए, या मर गये|

ड्राइविंग करते समय या पेट्रोल पंप में मोबाइल का प्रयोग निषेध है, कई बार इसके अधिक इस्तेमाल से नींद न आना, सिर में दर्द रहना, एकाग्रता की कमी, जैसी समस्याओं का जन्म हो जाता है|

यदि आपको यह जानकारी अच्छी लगी तो हमसे अपने विचार जरुर शेयर करे|

साईकिल का आविष्कार The invention of a bicycle

साईकिल एक साधारण सा वाहन है, जिसे चलाने के लिए न तो पेट्रोल-डीजल या अन्य किसी ईंधन की आवश्यकता पड़ती है और न ही इसमें कोई मशीनरी होती है। यूँ तो साईकिल का आविष्कार कई सौ साल पहले 19वीं सदी में ही हो गया था, पर तब भिन्न-भिन्न सरल रचना वाली साईकिल का निर्माण किया गया था। धीरे-धीरे साईकिल के प्रारूप व संरचना में कई तरह के बदलाव आते गए तथा साईकिल का विकास होता गया।

19वीं व 20वीं सदी की शुरुआत व मध्य तक तो साईकिल का प्रयोग बहुतायत से होता था, परन्तु 20 वीं सदी के अन्त में तथा 21वीं सदी के शुरू होने पर धीरे-धीरे साईकिल का उपयोग होना कम हो गया। इसका कारण यही था कि अन्य मशीनरी युक्त वाहन जैसे कार व मोटरसाइकिल का प्रचलन चल पड़ा था और कहीं कुछ नौजवानों में साईकिल के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण भी पनपने लगा।

आइए अब साईकिल के आविष्कार की कहानी के बारे में बात करते हैं।

जर्मनी में सन् 1816 में फ़्रांस के रहने वाले एक आविष्कारक “जिन थेसन” ने साईकिल की तरह ही लगने वाले एक वाहन का निर्माण किया, जिसमें चार पहिये होते थे तथा इसे चलाने के लिए इन्सान को खुद चलना व दौड़ना पड़ता था। इस बात से यह अंदाजा लगाया ही जा सकता है कि इसे चलाना अत्यन्त कठिन कार्य रहा होगा।

सन् 1817 में “कार्ल डरेस” ने “डेण्डि हॉर्स” नाम की एक साईकिल जैसे वाहन का आविष्कार किया था। इसमें आगे-पीछे पहिये लगे होते थे। इसे गति देने के लिए इसपर बैठने वाले व्यक्ति को अपने पैरों से जमीन पर धक्का देना पड़ता था तथा फिर उस वाहन के आगे बढ़ने के साथ अपने पैर हवा में उठाने पड़ते ताकि रगड़ न लग सके तथा बार-बार इसी प्रक्रिया का दोहराव किया जाता। 

वर्तमान समय में जिस प्रकार की साइकिल का उपयोग किया जा रहा है, उसके आविष्कारक का नाम है- “किर्कपेट्रिक मैकमिलन।” इन्होंने सन् 1839 में आधुनिक साईकिल का मॉडल तैयार किया था।

सर्वप्रथम मैकमिलन के द्वारा ही लोहे की तारों वाले पहिये, लकड़ी के पैडल तथा हैंडल से समायोजित की जाने वाली साईकिल का निर्माण किया गया था।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि मैकमिलन द्वारा साईकिल का आविष्कार करने से पहले भी साईकिल जैसे ही दिखने वाले कुछ दुपहिया वाहनों का आविष्कार किया जा चुका था।

1863 में “पियरे लेलमेंट” ने एक साईकिल जैसी दिखने वाली मशीन का आविष्कार किया। यह साईकिल वर्तमान में चलने वाली साईकिल की भांति थी। इसमें ख़ासियत यह थी कि गति देने के लिए पैडल जोड़े गए थे। पियरे को भी पैडल युक्त साईकिल का आविष्कारक माना जाता है।

सन् 1866 में साईकिल की बनावट में अतिरिक्त परिवर्तन करते हुए ‘वेलोसिपिडे” नाम की एक साईकिल निर्मित की गयी, जिसके आगे वाले पहिये का आकार पीछे वाले पहिये की तुलना में अधिक बड़ा कर दिया गया था। इस आविष्कार में आर्थिक तौर पर बहुत कार्य किया गया, परंतु पहिये के बड़ा होने के कारण चालक को इसपर बैठना तथा चलाना कष्टदायी होता था। अतः यह आविष्कार ज्यादा समय तक चल नही पाया।

सन् 1885 में “जॉन केम्प स्टारले” द्वारा “रोवर सेफ्टी साईकिल” बनाई गयी थी।  यह एक समान आकार के दो पहियों वाली साईकिल थी। दोनों पहियों की गतिशीलता को जोड़ने के लिए इसमें चेन भी लगाई गयी थी। सन् 1895 में इन्होंने अपने से पूर्व निर्मित साईकिल में हुई खामियों तथा उससे होने वाली परेशानियों को ख्याल में रखते हुए नई विशेषताओं व डिजाइन वाली अलग-अलग साईकिल का भी आविष्कार किया था।

सन् 1890 “सेफ्टी बाइक” नाम की साईकिल का आविष्कार सामने लाया गया था। इसका ऐसा नाम रखने का एकमात्र कारण यही था कि चालन की दृष्टि से यह काफी सुरक्षा प्रदायी थी। 

सन् 1893 में “फ्लायर” नाम की एक साधारण सी साईकिल का प्रारूप भी पेश किया गया था।

नवयुवकों व नवयुवतियों में साईकिल को लेकर निम्न धारणा बनने लगी, जिससे साईकिल के प्रयोग में काफी कमी आई। यह दौर कुछ समय तक जारी रहा, परन्तु आज के समय में बीते 3-4 वर्षों में साईकिल चलाने का दौर लौट कर आ गया है। नौजवानों में फिर से साईकिल चलाने की प्रवृति व शौक पैदा ही गया है तथा झिझक खत्म हो गयी है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि साईकिल चलाना उत्तम स्वास्थ्य के लिए एक कारगार उपाय है। साईकिल से पूर्ण शारीरिक क्रिया होती है।

इसे हम व्यायाम का एक साधन भी कह सकते हैं। साईकिल चलाने के दौरान चालक के पैर  पैडल मारने के कारण लगातार घूमते है तथा इसमें शारीरिक ऊर्जा भी लगती है और कसरत भी हो जाती है। इससे शरीर के निचले भाग में रक्तप्रवाह उचित रूप से होता है तथा नसों व मांसपेशियों में भी मजबूती आती है।

इस प्रकार समय व्यतीत होने के साथ साईकिल के नए-नए आविष्कार होते गए। हर विकास की सीढ़ी में साईकिल के अलग-अलग आविष्कारक सामने आये, जिन्होंने अपनी साईकिल की रचना को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। आज बाज़ार में प्रत्येक के शौक, पसन्द व जरूरत के अनुसार कई तरह की साईकिल उपलब्ध हो जाती है|

कैसे हुआ पेन का आविष्कार? Invention of ball pen in Hindi

पेन एक ऐसी वस्तु जो बहुत ही साधारण सी मालूम पड़ती हैं, किन्तु उससे कहीं अधिक आवश्यक भी हो गयी है। आजकल के समय में पेन का इस्तेमाल करना आदत में शुमार हो गया है, दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। पेन न होता तो ज्ञान भी न बढ़ता, क्योंकि बौद्धिक ज्ञान को लिखित रूप न मिल पाता तथा प्रचार-प्रसार असम्भव हो जाता।

अब हम पेन के आविष्कार की बात करना चाहेंगे, कि कैसे पेन अस्तित्व में आया।

यह कहावत सब ने सुनी होगी कि “आवश्यकता आविष्कार की जननी है” अर्थात् जब इन्सान को कहीं भी असुविधा होती है तो उससे निकलने के लिए वह कोइ न कोई नई युक्ति खोज ही लेता है। इसी से सम्बंधित विषय पर आज हम चर्चा करना चाहेंगे। 

लेखन का कार्य तो प्राचीन समय से चलता आ रहा है। हजारों साल पहले भी लेखन कार्य किया जाता था, परन्तु तब लेखन हेतु पेन उपलब्ध नही होते थे। उस समय में दीवारों पर नुकीले पत्थरों की सहायता से कुरेद कर लिखित में संकेत दिए जाते थे। इसके अतिरिक्त लड़की को नुकीला बनाकर या पंखों की बारीक डंडी से लेखन कार्य किया जाता था। बाद में समय बीतने के साथ-साथ शिक्षा के स्तर में भी विकास हुआ तथा विज्ञान में भी धीरे-धीरे तरक्की होने लगी। बहुत से कुशल बौद्धिक क्षमता वाले ज्ञानी लोग हुए, जिन्होंने समय-समय पर नए-नए आविष्कार किये। उन्हीं में से एक आविष्कार पेन का भी हुआ।

पहले हम आपको फाउन्टेन पेन के बारे में जानकारी देना चाहेंगे, तत्पश्चात बॉल पॉइन्ट पेन के बारे में व्याख्या करेंगे।

फाउन्टेन पेन की निब अत्यन्त तीखी होती है।  इस पेन के भीतर स्याही डाली जाती है तथा पेन के इस्तेमाल के साथ-साथ यह स्याही कम होते होते खत्म हो जाती है तो इसमें पुनः स्याही भरी जा सकती है। यह पेन गुरुत्वाकर्षण के नियम के आधार पर कार्य करता है अर्थात् गुरुत्व बल के कारण ही इसकी स्याही नीचे की ओर आती है तथा छपती है।

पेट्रेक पौएनारु द्वारा सर्वप्रथम फाउन्टेन पेन का आविष्कार किया गया था। उनकी इस खोज के लिए फ़्रांस की सरकार ने सन् 1827 में उनके नाम इस पेन पर पेटेण्ट भी जारी किया।

फाउन्टेन पेन का आविष्कार के बाद इसमें कुछ सुधार करके “वाटरमैन पेन” का आविष्कार संयुक्त राज्य अमेरिका के लेविस ई वाटरमैन सन् 1884 में किया था।

बॉल पॉइंट पेन का आविष्कार अर्जेन्टीना के लाज़लो बीरो ने सन् 1944 में किया था। इनका जन्म 1899 में हंगरी में हुआ था तथा इनकी यहूदी पारिवारिक पृष्ठभूमि थी। जन्म से इनका नाम लेडिस्लाओ जॉस बीरो था, परन्तु बाद में लाज़लो बीरो के रूप में नाम परिवर्तित हुआ तथा इसी नाम से प्रसिद्ध हुए।

बीरो पेशे से पत्रकार थे।

आइये अब हम आपको बताते हैं कि बीरो को बॉल पेन का आविष्कार करने का विचार कैसे आया।

पत्रकार के रूप में लिखित कार्य करने के दौरान तब फाउन्टेन पेन का इस्तेमाल किया जाता था। इसमें समस्या यह थी कि कई बार लिखते लिखते इस पेन की स्याही का आवश्यकता से अधिक बहाव हो जाने के कारण तथा जल्दी न सूखने के कारण स्याही के धब्बे पड़ जाते थे तथा लिखावट खराब हो जाती थी। इस प्रकार से स्याही छूट जाने के कारण बीरो को परेशानी होने से ही बॉल पेन के विचार का जन्म हुआ।

उन्होंने ऐसा पेन बनाने के बारे में सोचा जो लिखने के साथ-साथ सूखती जाए तथा लिखावट में खराबी पैदा न होने पाये। इस प्रकार से उन्होंने पतली निब वाले पेन का आविष्कार किया, जिसमें छोटी से बॉल (गेंद) होती थी, जो लिखते वक्त घर्षण करती हुई घूमती रहती है और कागज पर छपती रहती है तथा कार्टेज से स्याही की पूर्ति करती थी।

बॉल पॉइंट पेन की निब स्टील, टंगस्टन व पीतल से ही निर्मित की हुई होती है। इटली, आयरलैंड व ब्रिटेन में तो आजतक भी बॉल पेन को “बीरो पेन” के नाम से ही जाना जाता है|

कम्प्यूटर का आविष्कार Invention of computer in Hindi

आज के तकनीकी युग में ऐसा कोई भी इन्सान नही है जो कम्प्यूटर के अस्तित्व के ज्ञान से अनभिज्ञ हो। कम्प्यूटर को संगणक भी कहा जाता है। बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ, कारोबार, देश-विदेश से आयात-निर्यात, उद्योग आदि में होने वाले कार्य व हिसाब-किताब तथा लेनदेन आदि सब कुछ बिना गमन के ही सम्भव हो गया है तो इसका एक मुख्य कारण कम्प्यूटर भी है। यह हमारी तकनीक द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य तोहफा है।

आजकल प्रत्येक क्षेत्र में चाहे बैंक हो या साधारण दुकान या बड़ी फैक्ट्री या अदालत या अन्य व्यवसाय अर्थात् लगभग सभी क्षेत्रों में कम्प्यूटर का अत्यधिक महत्व हो गया है। कम्प्यूटर की आवश्यकता, महत्व व विशेषताओं की बात की जाए तो ये शायद निरन्तर बनी ही रहेंगी तथा असीमित ही होती जाएंगी। 

आइये जानते हैं कि कम्प्यूटर कैसे अस्तित्व में आया।

कम्प्यूटर का आविष्कार चार्ल्स बैबेज ने सन् 1822 में किया था। इन्होंने सर्वप्रथम “डिफरेंशियल इन्जन” नामक एक कम्प्यूटर का निर्माण किया था।

चूँकि सबसे पहले कम्प्यूटर का अस्तित्व चार्ल्स बैबेज के द्वारा ही सामने लाया गया, इसीलिए उन्हें कम्प्यूटर का जनक (पिता) भी कहा जाता है।

इसके अतिरिक्त समय व्यतीत होने के साथ-साथ कई तकनीकशास्त्रियों द्वारा भिन्न-भिन्न तरह के कम्प्यूटर निर्मित किये गए, जिनके बारे में हम आपको जानकारी उपलब्ध करवाने जा रहे हैं।

बैबेज के पश्चात सन् 1938 में यूनाइटेड स्टेट्स नेवी द्वारा “टारपेडो डेटा कम्प्यूटर” बनाया गया। 

सन् 1939 में जर्मनी में सर कोर्नेड ज़ीउस द्वारा वेक्यूम ट्यूब्स की सहायता से एक कम्प्यूटर निर्मित किया गया। इसे “Z2” नाम दिया गया। बाद में धीरे-धीरे तकनीकी विकास के साथ-साथ इसी कम्प्यूटर में ओर अधिक नई युक्तियाँ जोड़ी गयी तथा बदलाव करके सन् 1941 में ओर बेहतर कम्प्यूटर बनाया गया, जिसे “Z3” नाम दिया गया।

सन् 1942 में भौतिकशास्त्री जॉन विंसेट तथा उनके साथी क्लिफोर्ड बेरी द्वारा वैक्यूम ट्यूब का प्रयोग करके प्रथम विद्युत कम्प्यूटर का प्रारूप तैयार किया गया।

सन् 1944 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आइकेन द्वारा रिले संगणना मशीन का निर्माण किया गया, इस कम्प्यूटर का नाम “मार्क-1” रखा गया था। यह आकार में अत्यधिक बड़ी थी।

सन् 1946 में पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के जॉन मौचलि और प्रेस्पर आईकेर्ट ने ‘इलेक्ट्रॉनिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटेड एन्ड कम्प्यूटर” (ENIAC) कम्प्यूटर का निर्माण किया, जो लगभग एक कमरे के आकार जितना बड़ा था तथा इसे बनाने के लिए लगभग 18000 वैक्यूम ट्यूब्स का इस्तेमाल किया गया था। यह वजन में भी अत्यधिक भारी था। इसे अमेरिका के सैनिक सहायता के लिए बनाया गया था। बाद में तकनीकी प्रगति के साथ-साथ सन् 1951 में इन्हीं भौतिकशास्त्रीयों द्वारा कॉमर्शियल कम्प्यूटर के रूप में “UNIVAC” कम्प्यूटर का भी विकास किया गया था।

सन् 1947 में ट्रांजिस्टर के आविष्कार के बाद कम्प्यूटर के विकास में ओर अधिक सहायता मिली, क्योंकि कम्प्यूटर में ट्रांजिस्टर का प्रयोग करने से ये आकार में छोटे हो गए तथा नई उन्नति की ओर कदम बढ़ाये गए।

सन् 1975 में पहले पर्सनल कम्प्यूटर (PC) को उजागर किया गया। इसे व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल के लिए विक्रय हेतु बाजार में उपलब्ध करवाया गया। इस कम्प्यूटर को  “MITS AITAIR 8800” के नाम से जाना गया।

सन् 1977 में विख्यात कम्पनी एप्पल द्वारा रंगीन ग्राफिक्स वाली विशेषताओं से बनाया गया प्रारूप “एप्पल 2” को पेश किया गया।

सन् 1981 में आई.बी.एम. ने माइक्रोसॉफ्ट डिस्क ओपरेटिंग सिस्टम (MS DOS) वाले कम्प्यूटर को लोकोपयोग के लिए पेश किया।

सन् 1984 में एप्पल द्वारा माउस व ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस की विशेषता के साथ “मैकिटोंश कम्प्यूटर” बनाये गए।

सन् 1996 में सर्वप्रथम हाथ में रखकर चलाने योग्य कम्प्यूटर का आविष्कार किया गया, जिसे “पाल्म पायलट” का नाम दिया गया।

इस प्रकार से आप समझ सकते हैं कि किस प्रकार से 19वीं व 20वीं सदी में भिन्न-भिन्न तरह के कम्प्यूटर के आविष्कार किये गए तथा समय बीतने के साथ-साथ जैसे-जैसे तकनीकी विकास होता गया, वैसे-वैसे कम्प्यूटर में नई विशेषताओं का भी विकास जारी रहा तथा कम्प्यूटर का आकार भी छोटा होता गया।

कम्प्यूटर विभिन्न प्रकार के होते हैं। इनके बारे में भी हम आपको कुछ जानकारी उपलब्ध करवाने जा रहे हैं।

कार्य करने के आधार पर कम्प्यूटर तीन प्रकार के होते हैं-

एनालॉग कम्प्यूटर-  खोज कार्यों व इंजीनियरिंग के क्षेत्र में एनालॉग कम्प्यूटर का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि इनका प्रयोग मापन में किया जाता है, जैसे- तापमान, गहराई, दबाव, गति आदि के उचित माप लेना।

डिजिटल कम्प्यूटर – ये कम्प्यूटर बाइनरी संख्या 0 व 1 के आधार पर कार्य करते हैं। डिजिट परिमाण प्राप्त करने के लिए इनका प्रयोग शिक्षा व बैंक के क्षेत्र मे तथा व्यावसायिक उपयोग में किया जाता है। 

हाइब्रिड कम्प्यूटर- यह ऐसे कम्प्यूटर होते हैं, जिनमे एनालॉग व डिजिटल दोनों ही विशेषतायें पाई जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में मापन की आवश्यकता के साथ-साथ परिणामों को डिजिट के रूप में भी पेश करना आवश्यक होता है, वहीं इनका उपयोग किया जाता है, जैसे- चिकित्सालयों में।

इनके अतिरिक्त आकार व उद्देश्य के आधार पर चार प्रकार के कम्प्यूटर होते हैं-

माइक्रो कम्प्यूटर- यह साधारण रूप से प्रयोग में लिया जाने वाला व्यक्तिगत कम्प्यूटर (PC) है। इसका प्रयोग दिन-प्रतिदिन के कार्यों व डेटा सुरक्षित रखने, संगीत सुनने व इंटरनेट आदि हेतु किया जाता है।

मिनी कम्प्यूटर- यह एक साथ कई कार्यों को करने के उद्देश्य पूरा करने वाला तथा एक से अधिक उपयोगकर्ताओं द्वारा संचालित मध्यम आकार का कम्प्यूटर होता है।

मेनफ़्रेम कम्प्यूटर- ये बहुत बड़े आकार के कम्प्यूटर होते हैं। जिनका प्रयोग भी बड़े उद्देश्यों के लिए कई फैक्ट्रियों व कम्पनियों में किया जाता है। 

सुपर कम्प्यूटर- यह नाम से ही स्पष्ट है कि अत्यधिक विशालकाय कम्प्यूटर, जिनका प्रयोग विज्ञान में अनुसन्धान सम्बन्धी व मौसम विभागों द्वारा किया जाता है। ये अत्यन्त तीव्र कार्यक्षमता वाले होते हैं।

भारत में 1 जुलाई 1991 में सर्वप्रथम “परम 8000” नामक सुपर कम्प्यूटर C-DAC द्वारा निर्मित किया गया|

अल्बर्ट आइंस्टीन के सिद्धांत

सर अल्बर्ट आइंस्टाइन भौतिक विज्ञान के जाने माने वैज्ञानिक थे। बीसवीं सदी के प्रारंभिक 20 वर्षों तक अपनी खोजों के लिए विज्ञान जगत में छाए रहे। अपनी खोजों के आधार पर उन्होंने गुरुत्वाकर्षण, समय और अंतरिक्ष के सिद्धांत दिए। वह सापेक्षता के सिद्धांत e=mc² के लिए जाने जाते हैं।

प्रकाश उत्सर्जन की खोज के लिए उन्हें 1921 में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था। उन्होंने सापेक्षता के सिद्धांत और सामान्य सापेक्षता जैसे कई सिद्धांत दिए। उनके अन्य योगदानो में सापेक्ष प्रमाण, कोशिकीय गति एवं भौतिकी के ज्यामिति सिद्धांत शामिल हैं। उन्होंने 50 से अधिक पत्र व किताबें लिखी हैं। 1919 में टाइम्स पत्रिका ने उन्हें सर्वकालिक महानतम वैज्ञानिक की उपाधि दी। उनके 300 से अधिक वैज्ञानिक शोध पत्र प्रकाशित हुए। सन 1905 मैं उन्होंने शोध पत्रों के आधार पर लेख प्रकाशित किया और सापेक्षता का सिद्धांत दिया। इसके बाद उनका नाम विज्ञान जगत में छा गया। 1933 में उन्होंने जर्मनी की नागरिकता त्याग दी और अमेरिका में रहने लगे।

सापेक्षता का सिद्धांत

सापेक्षता के सिद्धांत से आइंस्टाइन ने यह अनुमान लगाया था कि ब्रह्मांड के बनने या विस्तार करने की कोई निश्चित दर नहीं है। ब्रह्मांड की सभी चीजें एक दूसरे के सापेक्ष बढ़ रही हैं मतलब की एक दूसरे से सापेक्ष मात्रा में दूर जा रही हैं। इसलिए से सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत कहा जाता है। समय किसी के लिए भी एक जैसी दर पर नहीं चलता। एक तेजी से चल रही वस्तु उसकी दिशा में धीरे से चल रही है।वस्तु से छोटी दिखाई देती है। यह असर काफी सूक्ष्म होता है। जब तक यह गति प्रकाश की गति के समीप नहीं पहुचती तब तक यह घटना दिखाई नहीं देती। कोई भी पिंड अगर तेज गति से या फिर प्रकाश की गति के आसपास प्रवाह करता है तो समय धीरे हो जाएगा ताकि प्रकाश की गति बनी रहे और प्रकाश की गति टूटे ना।

उदाहरण: मान लीजिए आपका एक दोस्त प्रकाश की गति से अंतरिक्ष यात्रा करने गया है।अंतरिक्ष विमान में होने के कारण उसे सब सामान्य लगेगा। उसके अनुसार समय बहुत धीरे चलेगा लेकिन जब वह पृथ्वी पर वापस आएगा तो वह अपने भविष्य में होगा। यहाँ यह पता चलता है कि समय किसी के लिए एक जैसी दर पर नहीं चलता। इसका मतलब यह है कि अगर आपके लिए 2 घंटे गुजरे हैं तो ब्रह्मांड में सभी के लिए 2 घंटे गुजरे हो ऐसा जरूरी नही। तेज गति में घूमने वाले विमानों के लिए समय बहुत ही धीरे गुजरता है उसी तरह ज्यादा ग्रेविटी वाले फील्ड में गुजरने वाले विमानों के लिए भी समय बहुत ही धीरे गुजरता है। यदि आप ब्लैक होल के नजदीक हो तो समय दूसरे लोगों की तुलना में धीरे गति से चलने लगेगा।

उदाहरण: मान लीजिए कि बम ब्लास्ट होता है। दो अलग-अलग लोग उस बम ब्लास्ट से 10 किलोमीटर और 15 किलोमीटर की दूरी पर हैं। उसकी आवाज को पहले आदमी तक पहुंचने में 5 सेकंड और दूसरे आदमी तक पहुंचने में 10 सेकंड का समय लगा।अगर पहले आदमी से यह पूछे कि बम ब्लास्ट कब हुआ था। वह कहेगा 5 सेकंड पहले और दूसरा आदमी कहेगा 10 सेकंड पहले। तो दोनों में से कौन सही कह रहा है दरअसल दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही हैं। इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि समय relative होता है, एब्सोल्यूट नहीं होता।

सर अल्बर्ट आइंस्टाइन की इसी उम्दा सोच ने सापेक्षता के सिद्धांत को जन्म दिया। जिसने भौतिक विज्ञान में एक नई सोच को पैदा किया। पूरे ब्रह्मांड में कोई भी गति प्रकाश की गति से तेज नहीं है। उनकी खोज के बाद उन्हें खूब नाम और शोहरत मिली। लेकिन कुछ समय बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि उनका यह सिद्धांत असल दुनिया में कार्य नहीं करेगा। कोई भी वस्तु एक सामान्य दर से प्रवाह नहीं करती सभी चीजें त्वरण करती हैं।

रेडियो का आविष्कार कब और किसने किया?

२०वीं शताब्दी में ऐसे बहुत से लोग थे, जो हमेशा नयी-नयी खोज में लगे हुए थे। ऐसे लोगों ने बहुत से नये और अभिनव उपकरणों का अनुसंधान तथा निर्माण किया। इसी २०वीं शताब्दी में, रेडियो विकास की पूरी परियोजना भी तैयार हो रही थी। इस बात को ले कर हमेशा ही विवाद होता रहा है कि आखिर रेडियो का वास्तव में किसने अविष्कार किया? जब भी रेडियो की अवधारणा के विकास की बात होती है, तो दो लोगों का नाम आवश्यक रूप से लिया जाता है– सर्बियन-अमेरिकन शोधकर्ता निकोला टेस्ला और इतालियन भौतिक विज्ञानी गुगलिलो मार्कोनी। रेडियो के आविष्कार के १०० वर्ष बाद भी, अभी तक लोग इस बात को ले कर संशय में हैं कि आखिर रेडियो के मूल रूप के आविष्कार का श्रेय किसको दें? कुछ लोग मार्कोनी को रेडियो का निर्माता समझते हैं, तो कुछ लोग इस बात को ले कर विवाद करते हैं की इसके वास्तव निर्माता तो टेस्ला ही हैं।

१८८४ में यूएस। जाने के बाद, टेस्ला ने टेस्ला कॉइल का आविष्कार किया। टेस्ला कॉइल एक ऐसा गैजेट है जिसे रेडियो वेव्स भेजने और प्राप्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। १८९५ में टेस्ला ने अपनी लैब से ५० मील दूर तक न्यूयॉर्क के वेस्ट पॉइंट तक रेडियो फ्लैग भेजा। टेस्ला ने १८९७ में, अपने रेडियो कार्य के लिए पेटेंट पाने के लिए अमेरिका में आवेदन किया। उसी के साथ उन्होंने एक ‘रेडियो-कंट्रोल्ड वेसल’ का निर्माण किया और उसे मैडिसन स्क्वायर गार्डन में, सन १८९८ में, प्रदर्शित भी किया।

इसी बीच मार्कोनी भी अपने  रेडीओ वेव्स प्रयोग कर रहे थे। १८९६ में मार्कोनी ने मोर्स-कोड आधारित रेडियो सिग्नल्सको करीबन ४ मील दूर इंग्लैंड भेजने में सफलता पाई। उसी साल, उन्होंने रेडियो का पेटेंट पाने के लिए इंग्लैंड में आवेदन किया। वह विश्व में रिमोट टेलीकम्युनिकेशन का पेटेंट पाने वाले पहले व्यक्ति ही थे।

१९०० में, अमेरिकी पेटेंट कार्यालय ने टेस्ला की लाइसेंस ६४५, ५७६ और ६४९, ६२१ की आवश्यक रूपरेखा को मार्च और मई के महीनों में स्वीकार कर लिया। टेस्ला के रेडियो लाइसेंस की वजह से, रेडियो इंटरचेंज के लिए प्रमुख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए टेस्ला पर और भी अधिक ज़िम्मेदारी आ गयी। उसी साल १० नवम्बर को मार्कोनी को अपने ‘ट्यूनड टेलीकम्युनिकेशन के लिए पेटेंट संख्या ७७७७ भी मिल गयी। सबसे पहले तो पेटेंट ऑफिस ने मार्कोनी के आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उसने अपने कार्य के लिए टेस्ला के लूप का प्रयोग किया था, और उसी की निर्भरता के आधार पर अपना आविष्कार किया था। परन्तु अत्यधिक संकल्प शक्ति से परिपूर्ण मार्कोनी ने अपने पिता की विरासत की मदद से अपने ब्रॉडकास्ट इनोवेशन को एक लाभदायी व्यावसाय में बदल दिया, और साथ ही साथ अपने रेडियो लाइसेंस को प्राप्त करने के लिए भी प्रयास करते रहे। १९०१ में, उन्होंने अपना पहला इंटरकांटिनेंटल प्रसारण भी प्रसारित किया।

मार्कोनी ने एक बार फिर पेटेंट के लिए आवेदन किया, और अंत में, १९०४ में, उन्हें UN पेटेंट ऑफिस ने, रहस्यमयी रूप से अपना फैसला बदलते हुए पेटेंट प्रदान कर दिया। १९०९ में मार्कोनी को फिजिक्स के क्षेत्र इस कार्य के लिए ‘नोबेल पुरस्कार, से सन्मानित किया गया। आज तक भी बहुत से लोग मार्कोनी को ही रेडियो के मूल आविष्कारक के रूप में जानते और मानते हैं।

व्हाट्सएप्प का आविष्कार किसने किया?

अगर स्मार्टफोन मोबाइल अप्प्स की बात की जाये तो आज ‘व्हाट्सएप्प’ सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा डाउनलोड किया जाने वाला अप्प है। दुनिया में सबसे ज्यादा सन्देश व्हाट्सएप्प के द्वारा ही भेजे जाते है व्हाट्सएप्प की स्थापना Yahoo के पूर्व कर्मचारी ब्रायन एक्टन और जॉन कोयॉम द्वारा २००९ में की गयी। व्हाट्सएप सन्देश भेजने की एक सबसे सरल ऑनलाइन एप्लीकेशन है और साथ-ही-साथ एक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म भी है।
Yahoo के कर्मचारी ब्रायन एक्टन ने २००७ में yahoo के साथ काम करना छोड़ दिया उसके बाद फुर्सत के कुछ पलों का मज़ा लेने के लिए दक्षिण अमेरिका चले गये। उस वक्त उन्होंने फेसबुक में नौकरी के लिए अर्जी दी थी मगर उन्हें नौकरी नहीं मिली

२००९ की शुरुवात में ही iPhone हासिल करके और उसकी क्रिया को समझने के बाद,उन्हें समझ में आ गया था कि ये iPhone का ये सात महीने पुराना एप-स्टोर, एप की दुनिया में एक बहुत बड़ा बदलाव लाने वाला है। इसलिए उसे बनाने में एक और सहयोगी अलेक्स फिशरमैन से इस अप्प पर काम करना शुरू किया।

सबने मिलकर दो साल की मेहनत से एक एप्लीकेशन बनाया जिसका नाम जॉन कोयॉम ने ‘व्हाट्सएप’ रख दिया, क्योंकि इसका स्वभाव ऐसा दिख रहा था की इसका प्रयोग उपयोगकर्ता को बतायेगा की ‘व्हाट इज़ हैप्पनिंग?’ (क्या हो रहा है)। फरवरी २४, २००९ में, व्हाट्सएप के जन्म के सात दिन बाद ही उन्होंने कैलिफ़ोर्निया में व्हाट्सएप एसपी (WhatsAppSp) को प्रक्षेपित किया।

जून २००९ में एप्पल ने ‘पुश नोटिफिकेशन’ पेश किया जिसकी वजह से इंजीनियरों को यह सुविधा मिली की जब भी उनके सामने आवेदन करने का कोई नया मौका आये तो वो लोगों को ‘पिंग’ कर सकें। तब कोयॉम ने अपने व्हाट्सएप में वह सुविधा जोड़ दी की, जब भी कोई व्हाट्सएप ग्राहक अपनी स्थिति में बदलाव करे तब उसके नेटवर्क में मौजूद सभी लोगों को इसका एक ‘पिंग’ के द्वारा पता चल जाए। फिर व्हाट्सएप ने अपने २.० संस्करण को बाज़ार में उतारा, जिसके बाद व्हाट्सएप के सक्रीय उपभोक्ताओं की संख्या में बहुत वृद्धि हुई और इसके करीबन २५०,००० ग्राहक (उपयोगकर्ता) बन गए।

उस समय कॉम, एक्टन से मिले , जो अभी तक बेरोजगार थे और जो एक असफल स्टार्टअप के साथ जूझ रहे थे। फिर दोनों ने साथ काम करने का निश्चय किया। अक्टूबर में एक्टन ने Yahoo के पाँच भूतपूर्व भागीदारों को इस बात के लिए मनाया की वह उनकी कम्पनी में $२५०,००० का निवेश करें। इसके बाद उन्हें व्हाट्सअप्प के सह-संस्थापक का दर्जा मिल गया और एक हिस्सेदारी भी। बीटा चरण में कुछ महीने गुज़ारने के बाद, नवम्बर २००९ में इस व्हाट्सएप एप्लीकेशन को iPhone के एप-स्टोर पर उतारा गया। कॉम ने फिर उस समय अपने एक पुराने साथी क्रिस पिफ्फेर, जो की लॉस एंजलिस में रहते थे, को आग्रह किया की वह व्हाट्सएप का ब्लैकबैरी संस्करण बनाएं। व्हाट्सएप का ब्लैकबेरी संस्करण बाज़ार में फिर दो महीने बाद ही आ पाया।

दिसम्बर २००९ तक iPhone में व्हाट्सएप के द्वारा इमेज (फोटो) भी भेजी जानें लगी। मध्य-२०११ तक तो व्हाट्सएप US के iPhone एप-स्टोर की शीर्ष २० डाउनलोड किये जाने वाली एप की सूची में शामिल हो गया।
फरवरी २०१३ तक तो व्हाट्सएप के प्रशंसकों और उपयोगकर्ताओं का आंकड़ा २०० मिलियन तक पहुँच गया, और व्हाट्सएप के कर्मचारियों की संख्या ५० हो गयी। व्हाट्सएप फेसबुक को बेचने से पहले, सीक्यूओइआ ने व्हाट्सएप में $ ५० मिलियन वापस निवेश किये। जिससे व्हाट्सएप का पूरा मूल्यांकन करीबन $ १.५ बिलियन तक पहुँच गया।

२४ अगस्त, २०१४ को कॉम ने अपने ट्विटर अकाउंट के हवाले से बताया की व्हाट्सएप के अब पूरे विश्व में ६०० मिलियन से भी अधिक उपयोगकर्ता हैं। व्हाट्सएप हर साल करीबन २५ मिलियन नए उपयोगकर्ता जोड़ता जा रहा है। जनवरी २०१५ की शुरुवात में व्हाट्सएप ने एक नयी ऊँचाई को छुआ। उस समय तक उसके उपयोगकर्ताओं की संख्या करीबन ७०० मिलियन तक पहुंच गयी और प्रत्येक दिन करीबन ३० अरब संदेशों का आदान-प्रदान होने लगा। अभी तक व्हाट्सएप के करीबन ८०० मिलियन उपयोगकर्ता हैं।

ईमेल का आविष्कार किसने किया?

आखिर ई-मेल का अविष्कार किसने किया, यह आज तक रहस्य ही बना हुआ है। १९७१ में APRANET के लिए ई-मेल बनाने का श्रेय वास्तव में ‘रे टॉमलिन्सन’ को दिया जाता है। १९७८ में, एक १४ वर्षीय बच्चे – शिव अय्यादुरै ने ईमेल फ्रेमवर्क पर अपना कार्य प्रारम्भ किया था। उसका प्रोजेक्ट था की उसे कागज़-आधारित ऑफिस मेल फ्रेमवर्क को इलेक्ट्रॉनिक रूप में बदलना था। १९८२ में उसने अपने इस उत्पाद को ‘ई-मेल’ के रूप में कॉपीराइट कराया था। अय्यादुरै का विवाद ये था कि जहाँ टॉमलिंसन ने त्वरित सन्देश भेजने के लिए केवल एक साधारण फ्रेमवर्क बनाया था, वहीँ अय्यादुरै ने ई-मेल का वह फॉर्म तैयार किया था जो की आज मौजूद है। इसीलिए ई-मेल के निर्माता का श्रेय उसे ही दिया जाना चाहिए ऐसा उसका कहना था।

इंटरनेट के कार्य प्रारम्भ करने से पहले ही ई-मेल का उपयोग उसी PC के विभिन्न ग्राहकों को संदेश भेजने के लिए किया जाने लगा था। परन्तु अगर अलग-अलग पीसी को आपस में किसी सिस्टम पर संपर्क साधना होता, तो यह प्रक्रिया थोड़ी जटिल हो जाती। समस्या यह थी कि आखिर अलग-अलग पीसी को अलग-अलग एड्रेस कैसे दें। ऐसा करने के लिए, एक ऐसे तरीके की ज़रुरत पड़ने लगी जिसके द्वारा हम ये बता सकें की आखिर सन्देश भेजना किसे है। ये एक पोस्टल फ्रेमवर्क की तरह ही था। ये ही कारण है की रे टॉमलिन्सन को ई-मेल का जनक कहा जाता है। टॉमलिन्सन ने एक APRANET के लिए एक वर्कर की तरह, बोल्ट बेरनेक और न्यूमैन के लिए काम किया। उसने ‘@’ प्रतीक का प्रयोग सन्देश को एक PC से दूसरे PC तक भेजने के लिए किया। उस समय, जो भी इंटरनेट के नियमों का उपयोग कर रहा था, उसके लिए बस इतना ही समझना काफी था की उसे उपयोगकर्ता के बाद ‘@’ प्रतीक लगा कर PC का नाम लिखना है। वेब उपयोग करने में अग्रणी जॉन पोस्टल, इस नये फ्रेमवर्क के प्रमुख ग्राहकों में से एक थे। उन्हें इस कार्य को एक ‘डिसेंट हैक’ की उपाधि देने के लिए भी जाना जाता है। और सच में ऐसा था भी और ऐसा अभी वर्तमान में है भी।

इंटरनेट के द्वारा बेशुमार सुविधायें प्रदान करने के बाद भी, आज भी, ई-मेल इंटरनेट का एक सबसे महत्वपूर्ण अंग बना हुआ है। पूरे विश्व में करीबन ६०० मिलियन लोग ई-मेल का प्रयोग कर रहे हैं। १९७४ तक ईमेल के कईं सारे सैन्य ग्राहक थे, क्योंकि APRANET ने इस बात के लिए उन्हें बहुत समय तक प्रोत्साहित किया था।

उस समय के बाद चीज़ें थोड़ी तेज़ी से होने लगीं। लैर्री रोबर्ट्स ने अपने प्रबंधक के लिए कुछ ई-मेल फ़ोल्डर्स बनाए ताकी उन्हें अपने मेल को अच्छे से रखने में आसानी हो। १९७५ में, जॉन विटटेल ने ई-मेल से सम्बंधित कुछ उत्पाद बनाए। १९७६ तक ई-मेल ने काफी लंबा सफ़र तय कर लिया, और उसका व्यापार मॉडल स्पष्ट दिखने लगा। २ से ३ साल के अंतर्गत ही APRANET की ७५% क्रियाओं को ई-मेल से जोड़ दिया गया।

प्रिंसिपल ईमेल मानक को एसएमटीपी (SMTP ), या सरल मेल ट्रांसफर प्रोटोकॉल कहा जाता था। उस समय एसएमटीपी बहुत बुनियादी था, लेकिन आज भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है।

वर्ल्ड वाइड वेब और उसके वेब इंटरफ़ेस की वजह से कईं ईमेल आपूर्तिकर्ता बहुत आसानी से उपलब्ध होने लगे, जैसे Yahoo और Hotmail। क्यूंकि ई-मेल सुविधाजनक था, इसलिए सभी के पास कम से कम एक ईमेल एड्रेस होने लगा, और इसी कारण इस अद्भुत माध्यम को ना केवल थोड़े बल्कि बहुत से लोगों ने गले लगा लिया और इसका प्रयोग शुरू कर दिया।

इंटरनेट का आविष्कार किसने किया?

आज हम जिस प्रकार के इंटरनेट के स्वरूप को जानते हैं और प्रयोग करते हैं, उस इंटरनेट के स्वरूप की उत्पत्ति के लिए हम किसी एक व्यक्ति को श्रेय नहीं दे सकते। इंटरनेट का वर्तमान स्वरूप बहुत से लोगों के सतत योगदान से प्राप्त हुआ है। इंटरनेट के वर्तमान स्वरूप की संरचना की शुरुवात १९६० के दशक के अंत में, कैलिफ़ोर्निया में हो गयी थी। जब ऑनलाइन विश्व का विचार विकसित ही हो रहा था, तभी कई शोधकर्ताओं ने पहले ही अपनी दूर दृष्टि से दुनिया में डेटा सिस्टम की उपस्थिति को बहुत ही प्रभावी ढंग से भांप लिया था। निकोला टेस्ला ने मध्य-१९०० में ‘वर्ल्ड रिमोट फ्रेमवर्क’ की संभावना को भांपा था और उसे प्रयोग करने और व्यवहारिक रूप देने का प्रयास भी किया था। १९४० के दशक में दूरदर्शी विद्वानों जैसे पॉल ओटलेट ने, किताबों और मीडिया के मोटर युक्त, और सुलभ क्षमता वाले फ्रेमवर्क के बारे में सोचा था।
अगर हम १९६० के पहले हुई सभी खोजो और विचारों को सम्मिलित भी कर लें, तो भी हम ये नहीं कह सकते की इंटरनेट की रचना मध्य-१९६० के पहले हो संभव हो पायी थी। मध्य-१९६० में MIT के जे.सी.आर. लिकलिडर ने पर्सनल कंप्यूटर के एक ‘इंटरगैलेक्टिक नेटवर्क’ की संभावना को पहचाना और बढ़ावा दिया।

इंटरनेट के अंतर्निहित विचार के लिए अगर हम किसी को श्रेय दे सकते हैं तो वह हैं लियोनार्ड क्लेनरॉक। उन्होंने ३१ मई, १९६१ में, अपने पहले पत्र को वितरित किया था, जिसका शीर्षक था, ‘इन्फॉर्मेशन फ्लो इन लार्ज कम्युनिकेशन नेट्स’। जैसा की पहले भी बताया गया कि १९६२ में जे.सी.आर. लिकलिडर IPTO के मुख्य निदेशक बन गए और फिर उन्होंने अपने गैलेक्टिक विज़न की दृष्टि को सबके सामने रखा। इसी प्रकार से, लिकलिडर और क्लेनरॉक के विचारों के साथ, रोबर्ट टेलर ने एक ऐसी प्रणाली की संभावना जताई जो बाद में चलकर ARPANET बनी। दिसम्बर, १९६८ में , नेटवर्क प्रणाली पर काम कर रहे लोगों ने अपनी पहली सभा आयोजित की। इस सभा का नेतृत्व एल्मर शापिरो ने किया और इस मीटिंग का सार उन्होंने SRI में अपनी रिपोर्ट ‘अ स्टडी ऑफ़ कम्युनिकेशन नेटवर्क डिजाईन पैरामीटर्स’ के रूप में दिया। इस मीटिंग में कई सारे प्रतिभागी थे, जैसे स्टीव कार्र, स्टीव क्रॉकर और रौन स्टाउटन। उन्होंने सभा में उन मुद्दों पर चर्चा की जो मेज़बानों के दिमाग में पहले से ही थे और जो आपसी बातचीत से सामने निकाल कर आये थे।

पॉल बरन, थॉमस मारिल और अन्य लोगों के काम करने से पहले ही लॉरेंस रोबर्ट्स और बैरी वेसलेर ने, ‘इंटरफ़ेस मेसेज प्रोसेसर’ (IMP IMP) का विवरण दे दिया था। बाद में, IMP सब नेटवर्क की रूपरेखा और निर्माण का ज़िम्मा जोल्ट बेरनेक और न्यूमन, इंक (BBN) को दे दिया गया था। इंटरनेट जैसे अभिनव विचार के लिए (जो की इतना विस्तृत है और जो निरंतर परिवर्तित हो रहा है) किसी भी एक व्यक्ति को इसका श्रेय नहीं दिया जा सकता। इंटरनेट की उत्पत्ति का श्रेय बहुत से शोधकर्ताओं, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों और विशेषज्ञों को देना होगा, जिन्होंने बहुत से नए आयामों और विचारों पर रौशनी डाल कर एक ऐसे ‘डाटा सूपरहाईवे’ की संरचना की, जिसे हम आज इंटरनेट के नाम से जानते हैं और प्यार करते हैं।

इंटरनेट का मुख्य व्यवहारिक मॉडल १९६० के दशक के अंत में, ARPANET की उत्पत्ति के साथ आया था। APRANET ने एक इकलौते सिस्टम की मदद से बहुत से कंप्यूटरों को आपस में जोड़ दिया था, जिससे की आसानी से सूचना का आदान-प्रदान होने लगा था। इन संशोधानोंका का विकास १९७० तक होता रहा। १९७० के दशक में ही शोधकर्ता रॉबर्ट काह्न और विनटन ने  TCP/IP बनाया, जो की बहुत से कंप्यूटर सिस्टम्स के बीच सूचना के आदान-प्रदान का मुख्य प्रोटोकॉल था। APRANET  ने १९८३ में  TCP/IP  को अपना हिस्सा बना लिया। १९९० में ऑनलाइन वर्ल्ड के सामने वापस चुनौती तब आई, जब PC शोधकर्ता टिम बर्नर्स ने ‘वर्ल्ड वाइड वेब’ बनाया। हालांकि, वर्ल्ड वाइड वेब को ही कुछ लोग इंटरनेट समझ लेते है, पर ऐसा नहीं है। वर्ल्ड वाइड वेब तो वास्तव में ऑनलाइन सूचना एकत्रीकरण का एक सबसे आसान और जाना-माना तरीका है। साइट्स और हाइपरलिंक्स की मदद से हम आसानी से किसी भी सूचना को ढूंढ सकते हैं। इंटरनेट के साथ-साथ अब वेब भी आधुनिक हो गया है और ऑनलाइन डेटा के अंतहीन भंडारण का एक प्रधान आधार बन चुका है।

माचिस कैसे बनता है?

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अलग-अलग निर्माता माचिस को अलग-अलग तरीके से बनाते हैं। लेकिन माचिस बनाने की मूल प्रक्रिया तकरीबन एक जैसी ही रहती है। माचिस की तिल्लियां बनाने के लिये लकड़ी ऐसी होनी चाहिए की जिस पर भिन्न-भिन्न रासायनिक तत्वों को आसानी से लगाया जा सके, और वह उन्हें कुछ हद्द तक सोख भी ले। साथ ही साथ लकड़ी की कठोरता भी इतनी होनी चाहिए कि वह उस पर जलाने के लिए लगाए जाने वाले दबाव को सहन कर सके और टूटे ना। केवल इसी प्रकार की लकड़ी को ही छोटी-छोटी तिल्लियों के रूप में काटा जाता है। आमतौर पर, माचिस की तिल्लियां बनाने के लिए या तो सफ़ेद देवदार की लकड़ी या फिर ऐस्पेन की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है।

माचिस की तिल्लियों को आकार दिये जाने के बाद उन्हें अमोनियम नाइट्रेट में डुबाया जाता है, जिससे की वह माचिस की तिल्लियां उसे सोख लें। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि माचिस की तिल्लियां ऊपरी रसायन (जो की जलाया जाता है) के ख़त्म होते ही बुझ ना जाए। दरअसल, माचिस की तिल्लियों के निर्माण की प्रक्रिया में माचिस की तिल्लियों के ऊपरी भाग को गर्म पैराफिन वैक्स में डुबाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि इस पैराफिन वैक्स में डूबी हुई लकड़ी की नोक को जब सिंथेटिक सतह पर रगडा जाता है तब इस रगड़ के कारण उसे आग पकड़ने में आसानी होती है। इसके बाद अमोनियम फॉस्फेट माचिस की तिल्लियां को जलते रहने में मदद करता है।

इन छोटी सी माचिस की तिल्लियों का सिरा दो भागों में बंटा होता है – नोक और उसका अंदरूनी भाग। नोंक में तो फॉस्फोरस सेस्क्यूफल्फाइड और पोटेशियम क्लोराइट का मिश्रण होता है। फॉस्फोरस सेस्क्यूफल्फाइड किसी कठोर सतह से रगड़ खाने पर बहुत आसानी से जल उठता है। और पोटेशियम क्लोराइट जलाने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। नोंक पर साथ ही साथ कुछ चूरा किया हुआ कांच भी होता है जिससे की माचिस की तिल्लिययों की उपभोग दर को नियंत्रण में रखा जा सके। इसके अतिरिक्त, ऐसा भी हो सकता है की नोंक को सफ़ेदी देने के लिए इसमें थोडा सा जिंक ऑक्साइड भी मिलाया गया हो। नोंक के आधार में सल्फर, रोजिन और थोड़ी सी मात्रा में पैराफिन वैक्स होता है जो माचिस की तिल्लियां को जलने में मदद करता है। आधार को रंग देने के लिए इसमें कईं बार ऐसा रंग भी डाला जाता है जो पानी में घुल सके।

माचिस का डिब्बा बनाने के लिए कार्डबोर्ड का प्रयोग किया जाता है। माचिस की तिल्लियों का उत्पादन अनेक चरणों में होता है। सबसे पहले तो माचिस की तिल्लियों को काटा जाता है, फिर उन्हें एक विशिष्ट तरीके से व्यवस्थित किया जाता है तथा इसके बाद इन्हें इकट्ठा किया जाता है। जब भी माचिस की तिल्लियों की ज़रुरत होती है, तो इन्हें एक पंक्चर हुए बेल्ट में लगा दिया जाता है। और जब माचिस की तिल्लियां सूख जाती हैं, तो वह बेल्ट उन तिल्लियों को ‘बंडलिंग ज़ोन’ में ले जाता है। इस बंडलिंग ज़ोन में एक बहुत से दांतों वाला पहिया घूमता रहता है, जो इन तिल्लियों को बेल्ट में से निकाल कर एक कंटेनर में डाल देता है। इस कंटेनर में इनका सही माप किया जाता है ताकि इन्हें माचिस के डिब्बे में आसानी से डाला जा सके। कंटेनर में से, इन तिल्लियों को, गत्ते के डिब्बों के अंदरूनी भाग में डाला जाता है। ये गत्ते के डिब्बे कंटनेर के नीचे लगी एक ट्रांसपोर्ट लाइन पर निरंतर चलते रहते हैं। एक बार में करीबन १० माचिस के डिब्बे भरे जाते हैं। संक्षेप में कहें तो बेल्ट माचिस के उत्पादन की प्रक्रिया को पूरा करता है, जहाँ माचिस की तिल्लियों को टैंक में डाला जाता है, सुखाया जाता है और फिर माचिस के डब्बों में भरा जाता है।

माचिस के डिब्बों के उत्पादन की प्रक्रिया में, सबसे पहले माचिस के डिब्बों के अंदरूनी और बाहरी हिस्सों को काटा जाता है, फिर उस पर प्रिंट किया जाता है और फिर उन्हें एक साथ जोड़ा जाता है। माचिस के डिब्बों का बाहरी भाग एक अलग ट्रांसपोर्ट लाइन पर चलता है, जो की प्राथमिक बेल्ट के समानांतर होता है। दोनों ही बेल्ट जल्दी ही रुक जाते हैं। उसके बाद माचिस के डिब्बे के अंदरूनी भाग को उसके बाहरी भाग के अंदर डाल दिया जाता है। और यह माचिस के डब्बे के अंदरूनी भाग को बाहरी भाग में डालने की प्रक्रिया, प्रत्येक एक सेकंड में एक बार दोहराई जाती है। माचिस की भरी हुई डिब्बियां फिर किसी परिवहन की मदद से एक मशीन तक पहुंचाई जाती हैं। यह मशीन इन माचिस की डिब्बियों को अच्छे से जमा कर एक बड़े गत्ते के डिब्बे में बंद कर देती है, जिससे की इन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके।

माचिस का आविष्कार किसने किया ?

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माचिस एक आम घरेलू चीज है जिसका उपयोग अग्नि को प्रज्ज्वलित करने के लिए किया जाता है।आमतौर पर, वर्तमान दिनों मे ‘माचिस’ छोटे लकड़ी की छड़ें या फर्म पेपर से बनी होती हैं। इसका एक छोर एक ऐसी सामग्री से ढका हुआ है जिसकी तिल्ली को रगड़ कर उत्पादित घर्षण से अग्नि को प्रज्वलितकिया जाता है। माचिस छड़ी कैसे अस्तित्व में आयी? यह सब फॉस्फोरस से शुरू हुआ। १६६९ में, फॉस्फोरस का शोध लगाया गया था और अब इसे माचिस हेड के हिस्से के रूप में उपयोग किया जाता है।

माचिस की तिल्ली बनाने का पहला प्रयास १६८० में हुआ था जब रॉबर्ट नाम के एक आयरिश भौतिक विज्ञानी ने फ़ास्फ़रोस और सल्फर से आग पैदा किया ।  दुर्भाग्यवश, उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप कोई उपयोग करने योग्य कार्य नहीं हुआ, क्योंकि सामग्री अत्यधिक ज्वालाग्राही थी।

उसके बाद एक शताब्दी बीत गई लेकिन शोधकर्ता उस वक़्त भी एक स्व-प्रकाश लौ बनाने के तरीके के बारे में सबसे अच्छी संरक्षित विधि को तैयार नहीं कर सके थे, जिसका उपयोग सामान्य जनता द्वारा किया जा सके। संरक्षित माचिस (safety-match) बनाने का हल्कासा प्रेरणास्त्रोत १७ वीं शताब्दी के मध्य में केमिस्ट ‘हेनिग ब्रांट’ के विविध संशोधनोंसे प्राप्त हुआ, जिसकी पूरी जिंदगी विभिन्न धातुओं से सोने बनाने के संशोधन में बित गयी थी। अपने शोध के दौरान, उन्होंने यह पता लगाया कि शुद्ध फास्फोरस कैसे निकालें और अपनी दिलचस्प दहनशील संपत्तियों का परीक्षण कैसे करें। इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने अपनी उत्प्रेरक जांच में फॉस्फर को अलग करने की विधि का संशोधन किया, उनके लिखे गए नोट्स नए शोध प्रवर्तकोंके लिए उनके भविष्य की संभावनाओंके लिए मिल का पत्थर साबित हुए।

जो आज हम उपयोग करते है उस छोटी सुरक्षित माचिस का विचार सबसे पहले संभवतः १८२७ में अंग्रेजी वैज्ञानिक और फार्मासिस्ट ‘जॉन वॉकर’ को आया, जिन्हे लगा की अगर हम माचिस के तिल्ली के सिर (Head) को अगर विशिष्ट रसायनों के साथ ढक लिया, और उन्हें सूखने दिया जाये तो बादमे उस सुखी हुई तिल्लीको कही भी स्ट्राइक करके आग लग सकती है। ये मुख्य घर्षण बिंदू थे, जिन्हें रगड़ने की आवश्यकता थी। मुख्य रासायनिक मिश्रण के रूप में एंटीमोनी सल्फाइड, पोटेशियम क्लोराइट और स्टार्च का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने सबसे पहले माचिस का प्रस्ताव ७ अप्रैल, १८२७ को शहर के एक विशेषज्ञ श्री हिक्सन को दिया था।वॉकर ने अपने शोध-विकास से थोड़ा लाभ कमाया। इसके बाद तो उन्होंने अधिक संशोधन करके दुनिया को छोटी सी माचिस से अचंभित कर दिया और अपने व्यवसाय को अधिक ऊंचाई पर लेकर खड़ा किया ।

जिस मैच-स्टिक को हम आज जानते हैं उसे “सुरक्षा माचिस” भी कहा जाता है, क्योंकि यह आग लगने पर ही रोशनी करता है। यह जानना कितना आश्चर्यजनक है कि कैसे एक छोटी सी मैच छड़ी अद्भुत काम कर सकती है! वास्तव में हमने आग को आज मुट्ठी में बंद कर दिया है जोकि कुछ समय पहले लगभग असंभव सी चीज थी।