चार्ल्स बैबेज कौन थे ?

चार्ल्स बैबेज का जन्म, लन्दन के एक आमिर घराने से सन 1791 में हुआ था ।

उनके माता पिता का नाम बेंजामिन और एलिज़ाबेथ था। उनके पिता लन्दन में बैंकर थे। बेंजामिन के 4 बच्चे थे लेकिन, बचपन में बस चार्ल्स और उनकी बहन मैरी अन्न ही बच पायीं। इकलौता बेटा होने के कारन बेंजामिन ने चार्ल्स को अच्छे अच्छे स्कूलों में भेजा। ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज के ट्रिनिटी collage से उन्होंने सन 1810 में पढाई पूरी की।

16 – 17 साल की उम्र में उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड के एक tutor से कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के लिए तैयारी की।

1810 में उन्होंने कैंब्रिज में दाखिला लिया और 1814 तक वो ग्रेजुएट हो गये। इस दौरान उन्होंने कैंब्रिज में बहुत कुछ किया। वे कैंब्रिज के टॉप क्लास के गणितज्ञ बन चुके थे।

उन्होंने जॉन हेर्चेल और जोर्ज पीकॉक के साथ मिलकर एनालिटिकल सोसाइटी की स्थापना की।

चार्ल्स बैबेज को father ऑफ़ कंप्यूटर के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने Difference Engine और Analytical Engine बनायी, हलाकि ये दोनों इंजन जैसा चार्ल्स बैबेज ने सोचा था वैसा नही बन पाए थे लेकिन उस समय के हिसाब से ये काफी पावरफुल चीज़ थे।

उन्होंने इतिहास का पहला कंप्यूटर बना दिया था।

Difference Engine गुणा और जोड़ करने में सक्षम था, Analytical Engine पहला ऐसा मशीन था जो प्रोग्राम किया जा सके यह सोच कर बनाया गया था, जैसा की आज मॉडर्न डे में हम कंप्यूटर को प्रोग्राम करते हैं।

हलाकि पोलिटिकल और इकनोमिक कारणों से उनका Analytical Engine इंजन कभी पूरा नही हो पाया।

चार्ल्स बचपन से ही तेज तर्रार थे। वे एक मैथमेटिकल और मैकेनिकल जिनिअस थे। कहा जाता है की चार्ल्स स्कूल में अलजेब्रा खुद ही सिख गये थे क्यों की वे अज्लेब्र से बहुत ही मन मोहित थे।

चार्ल्स को गणित में इतना इंटरेस्ट था की जब वे हाई स्कूल गये तब 3 बजे से सुबह 5 बजे तक छुपकर स्कूल जाते थे ताकि वे खुद से कैलकुलस पढ़ पाए।

25 साल की उम्र में वे रॉयल सोसाइटी के मेम्बर बन चुके थे। बाद में उन्हें Lucasian Professor of Mathematics का इनाम भी मिला। यह इनाम इसाक न्यूटन को भी मिला था।

चार्ल्स रिलिजन और भगवान में भी विश्वास करते थे। वे मानते थे की इस दुनिया का सबसे बड़ा प्रोग्रामर भगवान ही हैं।

ट्विटर Twitter का आविष्कार कैसे हुआ

फेसबुक की तरह ट्विटर भी एक सोशल मीडिया का स्त्रोत है, जो दुनिया भर के लोगों से जुड़ने में सहायक होता है तथा किसी भी विषय के बारे में जानकारी ग्रहण करने तथा व्यक्तिगत विचार व्यक्त करने में सहयोगी होता है।

जैक डॉर्सी, नोह ग्लाज़्, बिज़ स्टोन, इवान विलियम्स को ट्विटर के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। 21 मार्च 2006 को ट्विटर की स्थापना की गई थी।

सेन फ्रांसिस्को, केलिफोर्निया, यूनाइटेड स्टेट्स में ट्विटर का मुख्यालय स्थित है।

ट्विटर पर लिखित रूप से कोई जानकारी साझा करने या पोस्ट करने की प्रक्रिया को ट्विट करना कहा जाता है।

एक ट्विट में लिखने की अधिकतम सीमा 140 वर्णों की होती है अर्थात् एक ट्विट में 140 से अधिक वर्णों का इस्तेमाल नही किया जा सकता, परन्तु ट्विट करने की सीमा निर्धारित नही है। उपयोगकर्ता अपनी इच्छानुसार कितने भी ट्विट कर सकता है।

दुनियाभर में चल रहे चर्चित विषयों की जानकारी पाने के लिए तथा उन मुद्दों पर अपने विचार प्रकट करने के लिए ट्विटर एक अच्छा माध्यम है। ट्विटर में लोगों के द्वारा किसी विशेष विषय पर ट्विट किये जाते है, जिन्हें हम ट्विटर खाता (अकाउंट) बनाये बिना भी पढ़ सकते हैं, परन्तु उस ट्विट पर अपने विचार साझा करने के लिए या सवाल-जवाब के लिए ट्विटर खाता बनाना आवश्यक होता है।

कैसे बनाये ट्विटर पर अपना अकाउंट:

ट्विटर खाता बनाने का कार्य अत्यन्त सरल है। इसके लिए मोबाईल नम्बर से ट्विटर में साइन-अप करना पड़ता है, जिससे खाता निर्माण होता है|

ट्विटर पर हम जिनको फ़ॉलो करते हैं, उन्ही के ट्विट हमारी होमस्क्रीन पर दिखाई देते हैं। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि हम जिनके ट्विट पसन्द करते हैं तो इस देखने के लिए उन्हें ट्विटर पर फ़ॉलो करना पड़ता है। जैसे किसी सेलिब्रिटी के अद्यतन ट्विटस को देखने के लिए हमें उस सेलिब्रिटी को फ़ॉलो करना होगा।

कैसे कार्य करता है ट्विटर:

ट्विटर पर यदि हमे किसी व्यक्ति का कोई ट्विट पसन्द आ जाता है और हम उसे आगे शेयर करना चाहे तो हम उस ट्विट को दुबारा ट्विट करते हैं। इस प्रकार से ट्विटर पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किये गए ट्विट को दुबारा ट्विट करने की प्रक्रिया को रिट्वीट करना कहते हैं।

ट्विटर हैशटैग पद्धति पर आधारित है। ट्विटर में ट्विट करने के लिए सम्बन्धित व्यक्ति या विषय को मुख्य रूप से दिखाने के लिए आधार प्रदान करने के उद्देश्य से हैशटैग (#) का इस्तेमाल किया जाता है। इस हैशटैग के अनुसार ही उस विषय में चर्चा आगे बढ़ाई जाती है। खोजने के विकल्प का उपयोग आसान बनाने में भी हैशटैग का मुख्य योगदान है।

ट्विटर एप के कुछ विकल्प फेसबुक की तरह ही है। इस पर फोटो भी शेयर की जाती है। ट्विटर उपयोगकर्ता द्वारा किये गए ट्वीट्स व फ़ोटो को पब्लिक कर दिए जाने पर यह सभी को दिखाई देती है, परन्तु इसमें सिक्योरिटी सम्बन्धी विकल्प भी दिए होते हैं, जिससे प्रत्येक व्यक्ति द्वारा न देखे जाने की भी सुविधा होती है। इसे केवल अपने फॉलोअर्स तक सीमित रखा जा सकता है। जो लोग हमें ट्विटर पर फ़ॉलो करते हैं, उन्हें फॉलोअर्स कहा जाता है।

आज के समय में लाखों की संख्या में ट्विटर पर अकाउंट बनाये जा चुके है एवं रोजाना कई नए लोग इससे जुड़ रहे है| सोशल नेटवर्किंग ने दुनिया को जैसे आपकी मुठ्ठी में लाकर खड़ा क्र दिया है|

आप कही भी हो, अपने विचार लोगों के समक्ष रख सकते है एवं अपने रोल मॉडल के विचार भी जान सकते है| उम्मीद है आपको यह जानकारी पसंद आई होगी, आपकी ट्वीटर को लेकर क्या सोच है ये हमसे जरुर शेयर करे एवं कमेंट बॉक्स में अपनी राय अबश्य दे|

सामान्यतः लोगों का यह मानना है कि ट्विटर का इस्तेमाल सेलिब्रिटी व बड़ी हस्तियों के द्वारा ही किया जाता है। आये दिन समाचारों में भी सुनने में मिल जाता है कि अमुक सेलिब्रिटी के द्वारा किये गए ट्विट के संबंध में  शीत युद्ध हुआ या चर्चा हुई या किसी बड़ी हस्ती द्वारा किया गया ट्विट चर्चा का विषय बना। इस वजह से आम लोगों की धारणा बन गयी कि ट्विटर केवल विशेष व्यक्तियों द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली एप है, परन्तु यह केवल एक मिथ्या है, क्योंकि इसमें ऐसी किसी भी शर्तों का वर्णन नही किया गया है। फेसबुक की तरह ही ट्विटर एक ऐसी एप है, जो किसी भी व्यक्ति द्वारा सामान्य रूप से ट्विटर खाता बनाकर इस्तेमाल की जा सकती है।

कैसे बनी फेसबुक How Facebook was created?

सोशल मीडिया का जाना पहचाना स्त्रोत है- फेसबुक। आज के समय में युवाओं में फेसबुक सर्वाधिक प्रचलित है। अपने पुराने साथियों से जुड़े रहने व दुनियाभर में भिन्न-भिन्न लोगों से सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने में फेसबुक सहयोगी सिद्ध होती है।

सन् 2004 में हार्वर्ड के एक विद्यार्थी ने यह एप बनाई थी, जिनका नाम है- मार्क जुकरबर्ग। शुरुआत में एप का नाम “द फेसबुक” था। उस दौर में यह स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों में धीरे-धीरे उपयोग में लाई जाने लगी व इसके बाद पूरे यूरोप में इसका प्रचलन बढ़ गया। सन् 2005 में इसका नाम “फेसबुक” कर दिया गया तथा आज भी इसी नाम से प्रचलित है। आज विश्व भर में फेसबुक का प्रयोग जोर-शोर से हो रहा है और इसकी विशेषता यह है कि इसे विभिन्न भाषाओं में उपयोग करने के विकल्प भी उपलब्ध है।

फेसबुक के संस्थापक:

मार्क जुकरबर्ग इसके प्रमुख संस्थापक हैं तथा इनके साथ सहयोगी रहे एडुआद्रो स्वेरिन, डस्टिन मस्कोविट्ज़, क्रिस व्हूजेज  को फेसबुक के सह-संस्थापक के रूप में जाना जाता है।

फेसबुक के विषय में उल्लेख करने से पहले हमें इसके संस्थापक के जीवन के सम्बन्ध में कुछ जानकारी देनी आवश्यक है।

मार्क एलियट जुकरबर्ग का जन्म 14 मई 1984 को न्यूयॉर्क में एक यहूदी परिवार में हुआ था। जुकरबर्ग की धर्म के प्रति कोई आस्था नही थी, वे नास्तिक प्रवृति के हैं। इनके पिता का नाम एडवर्ड जुकरबर्ग है तथा माता का नाम कैरेन केम्परेन् है। इनकी पत्नी का नाम प्रिसिला चेन है। इनकी बचपन से ही कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में विशेष रूचि थी। इसी रूचि के फलस्वरूप इन्होनें फेसबुक बनाई थी।

फेसबुक का उपयोग व उपयोगिता:

फेसबुक उपयोग करने के क्रम में प्रथम कार्य खाता बनाने का होता है। इसके बाद अपनी फेसबुक प्रोफाइल तैयार करने हेतु निजी ब्यौरा देना होता है। प्रोफाइल हेतु अनेक विकल्प दिए होते हैं, जिसमें नाम, शहर, राज्य, फोटो, अध्ययन सम्बन्धी ब्यौरा, जन्मतिथि, कार्यक्षेत्र, नौकरी या व्यवसाय। इसमें से सभी विकल्पों को भरना अनिवार्य नही होता है, परन्तु सभी को रिक्त नही रखा जा सकता, क्योंकि कुछ विकल्प प्रोफाइल निर्माण हेतु आवश्यक व अनिवार्य होते है। इस प्रोफाइल के जरिये ही फेसबुक पर हम अन्य व्यक्तियों को ढूंढ सकते हैं तथा अन्य व्यक्ति हमें ढूंढ सकते हैं तथा फेसबुक मित्र बन सकते हैं।

फेसबुक पर समूह निर्माण की भी सुविधा उपलब्ध होती है। इसमें बहुत से लोगों का जुड़ाव होता है। यह समूह विद्यालय या कॉलेज या ज्ञान सम्बन्धी विषय का या हास्य या व्यवसाय या धर्म अर्थात् किसी भी प्रकार का समूह हो सकता है, जिसमें एकता रखने वाले लोगों को जोड़ा जाता है। इसमें जुड़ने के लिए व्यक्ति को आमंत्रण भेजा जाता है। वह स्वेच्छा से स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है। इसी के साथ स्वीकार करने के बाद चाहे तो स्वीकृति रद्द भी जा सकती है। इस प्रकार समूह के जरिये भी श्रंखलाबद्ध रूप से लोग आपस में जुड़ते रहते हैं।

फेसबुक पर कोई भी फोटो या अपनी फोटो डालना व शेयर करना, स्टेटस अपलोड करना जैसे हम कुछ विशेष कर रहे हैं या कहीं जा रहे हैं; सम्बन्धी जानकारी को अपने फेसबुक मित्रों के साथ बाँटना आदि सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं।

इसके अतिरिक्त फेसबुक पर स्वयं का पेज बनाने की भी व्यवस्था है। जैसे अपनी व्यैक्तिक कला सम्बन्धी प्रदर्शन करने के लिए या अपने किसी व्यवसाय या कार्य का विज्ञापन करने के लिए पेज बनाकर प्रस्तुतिकरण किया जाता है तथा फेसबुक पर लोगों को अपने पेज को पसन्द करने के लिए आमन्त्रित किया जाता है।

सुरक्षा विकल्प:

इन सब के अलावा फेसबुक उपयोगकर्ता के लिए सुरक्षा सम्बन्धी विकल्प भी दिए होते हैं, जिनमें उपयोगकर्ता अपनी व्यक्तिगत सूचना, फोटो, स्टेटस आदि को अनजान लोगों से छुपाने के लिए व कमेंट पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए ऐसे विकल्पों का चयन कर सकता है।

यदि उपयोगकर्ता किसी व्यक्ति के द्वारा फेसबुक पर सन्देश भेजने या अन्य किसी भी कारण से कोई परेशानी का अनुभव करता है तो इसमें ब्लॉकिंग का भी विकल्प होता है। इसमें ब्लॉक कर दिए जाने के बाद वह व्यक्ति फेसबुक की प्रोफाइल खोलने व सन्देश भेजने में असमर्थ हो जाता है।

फेसबुक के दुष्परिणाम या दुष्प्रभाव:

चूँकि फेसबुक इंटरनेट के द्वारा चलित एप है, तो सम्भवतः इंटरनेट के कारण बहुत से दुष्प्रयोग किये जा रहे हैं। कुछ लोगों द्वारा जानबूझकर लोगों से जुड़ने के लिए या परेशान करने के लिए अपनी असली पहचान उजागर न करते हुए नकली फेसबुक प्रोफाइल बनाई जाती है, जिसे फेक आई डी कहते हैं।

जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने के लिए फेसबुक पर जाति सम्बन्धी फोटो डाली जाती है, टिप्पणियाँ की जाती है तथा समूह बनाये जाते हैं, जिनसे जातिगत हिंसा को बढ़ावा मिलता है।

धर्म सम्बन्धी चर्चा हेतु बनाये गए समूह व धार्मिक भेदभाव को प्रदर्शित करने वाली फ़ोटो के द्वारा अभिन्न धर्मों के लोगों के मध्य आपसी रंजिश पैदा होती है। 

इसी प्रकार फेसबुक के माध्यम से ओर भी कई प्रकार के व्यक्तिगत विषयों पर हो रही चर्चा से आपसी मतभेद उत्पन्न होता है। कुछ रहस्य के रूप में रखी जाने वाली कुछ बातें सार्वजनिक हो जाने से झगड़े के कारण पैदा होते हैं|

मोबाइल का आविष्कार कैसे हुआ | The Invention of Mobile Phone in Hindi

आधुनिक युग में ऐसा कोई नहीं जो मोबाइल के प्रयोग से अछुता हो| बच्चे से लेकर बड़े तक मोबाइल का इस्तेमाल करते है| मोबाइल ने आज पूरे संसार को आपकी मुठी में लाकर खड़ा कर दिया है|

आज आप कही भी हो, हमेशा अपनों से जुड़े रह सकते है, कही भी किसी से बात कर सकते है, किन्तु कभी आपने यह सोचा कि मोबाइल को किसने बनाया, कैसे बनाया, कैसे यह विकास के अलग-अलग पहलुओ से होकर गुजरा और आज जो android डिवाइस जिसके आप आदी हो चुके है, कुछ समय पहले किसी ने सोचा तक नहीं होगा इसके बारे में|

यहाँ हम मोबाइल से जुड़े सभी तथ्यों एवं जानकारी के बारे में जानने का प्रयास करेंगे|

कैसे बना मोबाइल?

Martin Cooper और John F. ने 1973 ई. में सबसे पहले मोबाइल का अविष्कार किया जो Motorola का फ़ोन था एवं व्यवसायिक रूप से यह 1983 में प्रयोग में आना शुरू हुआ|

सिम कार्ड जिसके बिना मोबाइल को चलाना मुमकिन नहीं इसका अविष्कार 1991 में Munich Smart कार्ड Maker Giesecke and Devrient द्वारा बनाया गया था|

फर्स्ट Generation या 1G cellular Network का प्रारंभ जापान द्वारा 1979 ई. में किया गया था|

2G network की शुरुआत फ़िनलैंड द्वारा 1991 में की गई थी एवं ठीक 10 साल बाद 3G network अस्तित्व में आया जिसे जापान द्वारा बनाया गया| अब तक 4G नेटवर्क आ चुका है एवं 5G को लाने पर खोजबीन जारी है|

केवल 20 वर्षों में मोबाइल का प्रयोग करने वाले करीब 700 करोड़ users बने एवं इसकी लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढती चली गई|

सबसे ज्यादा smart मोबाइल बनाने वाली कम्पनीज में Samsung, Apple, Nokia आदि के नाम प्रसिद्ध है|

2014 तक अकेले Samsung ने दुनिया में प्रयोग होने वाले मोबाइल्स का 25% बनाया एवं Nokia का योगदान इसमें 13% रहा|

मोबाइल से जुड़े कुछ आश्चर्यजनक तथ्य:

सबसे पहले मार्किट में आने वाला मोबाइल Motorola का था जिसका नाम डायना टीएसी था जिसकी कीमत करीब 2 लाख रूपये थी एवं वजन में भारी था, इसलिए इसके मार्किट में उतारने से पहले कुछ हल्का किया गया| इसे १ बार चार्ज करने के बाद आप 35 से 40 मिनट तक बात कर सकते थे|

ब्रिटेन में सबसे पहले मोबाइल फ़ोन की शरुआत ‘एरिन वाइज’ द्वारा 1985 में वोडाफोन के कार्यालय में फ़ोन करके की गई थी|

वोडाफ़ोन कम्पनी को अपने लाखों ग्राहकों से जुड़ने के लिए 9 साल लगे किन्तु ओ2 नामक कम्पनी ने sellnet सेवा द्वारा केवल २ वर्षो में डस लाख का आंकड़ा पर करके वोडाफोन के एकाधिकार को खत्म कर दिया|

कोई भी वाहन चलाते समय मोबाइल के प्रयोग पर पाबन्दी लगा दी गई जिसमे भारत के साथ अन्य देशो में यह कानून लागू कर दिया गया|

वर्ष 2007 में एक नामी कम्पनी ने कुत्तों के लिए मोबाइल फ़ोन बनाया जिसमे GPS सिस्टम लगा हुआ था जिससे आप अपने कुत्ते को कही भी ट्रेक कर सकते थे एवं इसकी कीमत 25,000 थी|

Wireless World कांफ्रेंस में सबसे पहले टचस्क्रीन वाला smart फ़ोन पेश किया गया, इसके द्वारा आप मेल सेवा, कैलकुलेटर, कैलेन्डर, पेजर आदि का लाभ उठा सकते थे|

फरीदेलेहम नामक इंजिनियर ने 160 शब्द की टेक्स्ट सीमा की शुरुआत की जो कि जर्मनी से थे एवं एक अच्छे टाइपिस्ट थे|

साल 2012 में Samsung, Apple, एवं अन्य कम्पनीज के करीब 1अरब 70 करोड़ हैंडसेट बिके|

अब तक सबसे ज्यादा बिकने वाला मोबाइल फ़ोन का रिकॉर्ड नोकिया कम्पनी के 1100 मॉडल के नाम पर है, मार्किट में आने के साथ ही इसके करीब 25 करोड़ सेट बिक चुके एवं अभी तक इतने बड़े रिकॉर्ड को कोई कम्पनी नहीं तोड़ पाई|

केवल ब्रिटेन में 2011 में दो सौ अरब से अधिक टेक्स्ट मेसेज एक दूसरे को भेजे गये जिसमे से अधिकांश 11 से 16 साल के बच्चे थे| सबसे पहला sms 1992 में नील पोप्वोर्थ ने अपने एक दोस्त को भेजा था जिसमे उन्होंने लिखा था Marry Christmas|     

आधुनिक समय में इस्तेमाल होने वाले मोबाइल फ़ोन द्वारा आप नेट बैंकिंग, टिकेट booking, नेट सर्फिंग, बिज़नस प्रमोशन, एवं किसी भी प्रकार की जानकरी प्राप्त कर सकते है|

भारी वजन के साथ शुरू होकर आज एकदम हल्के एवं दिखने में आकर्षक smart फ़ोन हर प्रकार की रेंज में बाजार में उपलब्ध है| उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा की मोबाइल फ़ोन का इतिहास इतना जबर्दस्त एवं तेजी से बदलने वाला होगा|

आज के युवा अपना अधिकतर समय फेसबुक, Whtsapp, ट्विटर, आदि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिताते है, इसमें एक बहुत बड़ा भाग गेम्स के लिए भी जाता है|

अमेरिका में वर्ष 2007 में i-Phone को लांच किया जिसको लेने के लिए लोग रात भर लाइन में लगे थे पर कुछ समय बाद एप्पल का यह फ़ोन लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया|

अपनी बेजोड़ मजबूती के लिए मशहूर सोनिम xp फ़ोर्स मोबाइल को गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया गया है, इसे 84 फीट से नीचे फेंका गया एवं 2 मीटर पानी में डुबाया गया जिसके बाद भी मोबाइल को कोई नुकसान नहीं हुआ एवं पहले के जैसे वर्किंग मोड में रहा| इसके अलवा और भी फ़ोन है जो पानी में खराब नहीं होते|

अब तक के सबसे महंगे फ़ोन की कीमत 7,850,000 डोलर है जो एप्पल द्वारा बनाया गया है एवं इसमें 500 हीरे लगे हुए है जो 100 कैर्रेट के है, मोबाइल का पिछला कवर गोल्ड का बना हुआ है एवं देखने में यह शानदार है, एप्पल कम्पनी का प्रसिद्ध लोगो भी डायमंड्स का बना हुआ है|

शायद ही आपको पता हो कि मोबाइल बनाने से पहले नोकिया पेपर बनाने का काम करती थी इसके साथ ही यह प्लास्टिक एवं रबर के उत्पाद बनाया करती थी परन्तु मोबाइल जैसी डिवाइस बनाकर इसने सबको हैरान कर दिया|

अब तक के आकड़ो के अनुसार, फिलिपीन में सबसे ज्यादा टेक्स्ट मेसेज एक दुसरे को भेजे जाते है|

आज के समय में जियो ने इन्टरनेट सेवा की दरो को काफी हद्द कम करके भारत में इसके प्रयोग को और भी सुविधाजनक बना दिया है|

निष्कर्ष:

जैसा कि प्रत्येक अविष्कार के साथ होता है, इसके पॉजिटिव एवं नेगिटिव दोनों पहलु होते है| ऐसे बहुत से मामले सामने आये जिसमे मोबाइल की बैटरी में ब्लास्ट होने से लोग बुरी तरह जख्मी हुए, या मर गये|

ड्राइविंग करते समय या पेट्रोल पंप में मोबाइल का प्रयोग निषेध है, कई बार इसके अधिक इस्तेमाल से नींद न आना, सिर में दर्द रहना, एकाग्रता की कमी, जैसी समस्याओं का जन्म हो जाता है|

यदि आपको यह जानकारी अच्छी लगी तो हमसे अपने विचार जरुर शेयर करे|

साईकिल का आविष्कार The invention of a bicycle

साईकिल एक साधारण सा वाहन है, जिसे चलाने के लिए न तो पेट्रोल-डीजल या अन्य किसी ईंधन की आवश्यकता पड़ती है और न ही इसमें कोई मशीनरी होती है। यूँ तो साईकिल का आविष्कार कई सौ साल पहले 19वीं सदी में ही हो गया था, पर तब भिन्न-भिन्न सरल रचना वाली साईकिल का निर्माण किया गया था। धीरे-धीरे साईकिल के प्रारूप व संरचना में कई तरह के बदलाव आते गए तथा साईकिल का विकास होता गया।

19वीं व 20वीं सदी की शुरुआत व मध्य तक तो साईकिल का प्रयोग बहुतायत से होता था, परन्तु 20 वीं सदी के अन्त में तथा 21वीं सदी के शुरू होने पर धीरे-धीरे साईकिल का उपयोग होना कम हो गया। इसका कारण यही था कि अन्य मशीनरी युक्त वाहन जैसे कार व मोटरसाइकिल का प्रचलन चल पड़ा था और कहीं कुछ नौजवानों में साईकिल के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण भी पनपने लगा।

आइए अब साईकिल के आविष्कार की कहानी के बारे में बात करते हैं।

जर्मनी में सन् 1816 में फ़्रांस के रहने वाले एक आविष्कारक “जिन थेसन” ने साईकिल की तरह ही लगने वाले एक वाहन का निर्माण किया, जिसमें चार पहिये होते थे तथा इसे चलाने के लिए इन्सान को खुद चलना व दौड़ना पड़ता था। इस बात से यह अंदाजा लगाया ही जा सकता है कि इसे चलाना अत्यन्त कठिन कार्य रहा होगा।

सन् 1817 में “कार्ल डरेस” ने “डेण्डि हॉर्स” नाम की एक साईकिल जैसे वाहन का आविष्कार किया था। इसमें आगे-पीछे पहिये लगे होते थे। इसे गति देने के लिए इसपर बैठने वाले व्यक्ति को अपने पैरों से जमीन पर धक्का देना पड़ता था तथा फिर उस वाहन के आगे बढ़ने के साथ अपने पैर हवा में उठाने पड़ते ताकि रगड़ न लग सके तथा बार-बार इसी प्रक्रिया का दोहराव किया जाता। 

वर्तमान समय में जिस प्रकार की साइकिल का उपयोग किया जा रहा है, उसके आविष्कारक का नाम है- “किर्कपेट्रिक मैकमिलन।” इन्होंने सन् 1839 में आधुनिक साईकिल का मॉडल तैयार किया था।

सर्वप्रथम मैकमिलन के द्वारा ही लोहे की तारों वाले पहिये, लकड़ी के पैडल तथा हैंडल से समायोजित की जाने वाली साईकिल का निर्माण किया गया था।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि मैकमिलन द्वारा साईकिल का आविष्कार करने से पहले भी साईकिल जैसे ही दिखने वाले कुछ दुपहिया वाहनों का आविष्कार किया जा चुका था।

1863 में “पियरे लेलमेंट” ने एक साईकिल जैसी दिखने वाली मशीन का आविष्कार किया। यह साईकिल वर्तमान में चलने वाली साईकिल की भांति थी। इसमें ख़ासियत यह थी कि गति देने के लिए पैडल जोड़े गए थे। पियरे को भी पैडल युक्त साईकिल का आविष्कारक माना जाता है।

सन् 1866 में साईकिल की बनावट में अतिरिक्त परिवर्तन करते हुए ‘वेलोसिपिडे” नाम की एक साईकिल निर्मित की गयी, जिसके आगे वाले पहिये का आकार पीछे वाले पहिये की तुलना में अधिक बड़ा कर दिया गया था। इस आविष्कार में आर्थिक तौर पर बहुत कार्य किया गया, परंतु पहिये के बड़ा होने के कारण चालक को इसपर बैठना तथा चलाना कष्टदायी होता था। अतः यह आविष्कार ज्यादा समय तक चल नही पाया।

सन् 1885 में “जॉन केम्प स्टारले” द्वारा “रोवर सेफ्टी साईकिल” बनाई गयी थी।  यह एक समान आकार के दो पहियों वाली साईकिल थी। दोनों पहियों की गतिशीलता को जोड़ने के लिए इसमें चेन भी लगाई गयी थी। सन् 1895 में इन्होंने अपने से पूर्व निर्मित साईकिल में हुई खामियों तथा उससे होने वाली परेशानियों को ख्याल में रखते हुए नई विशेषताओं व डिजाइन वाली अलग-अलग साईकिल का भी आविष्कार किया था।

सन् 1890 “सेफ्टी बाइक” नाम की साईकिल का आविष्कार सामने लाया गया था। इसका ऐसा नाम रखने का एकमात्र कारण यही था कि चालन की दृष्टि से यह काफी सुरक्षा प्रदायी थी। 

सन् 1893 में “फ्लायर” नाम की एक साधारण सी साईकिल का प्रारूप भी पेश किया गया था।

नवयुवकों व नवयुवतियों में साईकिल को लेकर निम्न धारणा बनने लगी, जिससे साईकिल के प्रयोग में काफी कमी आई। यह दौर कुछ समय तक जारी रहा, परन्तु आज के समय में बीते 3-4 वर्षों में साईकिल चलाने का दौर लौट कर आ गया है। नौजवानों में फिर से साईकिल चलाने की प्रवृति व शौक पैदा ही गया है तथा झिझक खत्म हो गयी है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि साईकिल चलाना उत्तम स्वास्थ्य के लिए एक कारगार उपाय है। साईकिल से पूर्ण शारीरिक क्रिया होती है।

इसे हम व्यायाम का एक साधन भी कह सकते हैं। साईकिल चलाने के दौरान चालक के पैर  पैडल मारने के कारण लगातार घूमते है तथा इसमें शारीरिक ऊर्जा भी लगती है और कसरत भी हो जाती है। इससे शरीर के निचले भाग में रक्तप्रवाह उचित रूप से होता है तथा नसों व मांसपेशियों में भी मजबूती आती है।

इस प्रकार समय व्यतीत होने के साथ साईकिल के नए-नए आविष्कार होते गए। हर विकास की सीढ़ी में साईकिल के अलग-अलग आविष्कारक सामने आये, जिन्होंने अपनी साईकिल की रचना को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। आज बाज़ार में प्रत्येक के शौक, पसन्द व जरूरत के अनुसार कई तरह की साईकिल उपलब्ध हो जाती है|

कैसे हुआ पेन का आविष्कार? Invention of ball pen in Hindi

पेन एक ऐसी वस्तु जो बहुत ही साधारण सी मालूम पड़ती हैं, किन्तु उससे कहीं अधिक आवश्यक भी हो गयी है। आजकल के समय में पेन का इस्तेमाल करना आदत में शुमार हो गया है, दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। पेन न होता तो ज्ञान भी न बढ़ता, क्योंकि बौद्धिक ज्ञान को लिखित रूप न मिल पाता तथा प्रचार-प्रसार असम्भव हो जाता।

अब हम पेन के आविष्कार की बात करना चाहेंगे, कि कैसे पेन अस्तित्व में आया।

यह कहावत सब ने सुनी होगी कि “आवश्यकता आविष्कार की जननी है” अर्थात् जब इन्सान को कहीं भी असुविधा होती है तो उससे निकलने के लिए वह कोइ न कोई नई युक्ति खोज ही लेता है। इसी से सम्बंधित विषय पर आज हम चर्चा करना चाहेंगे। 

लेखन का कार्य तो प्राचीन समय से चलता आ रहा है। हजारों साल पहले भी लेखन कार्य किया जाता था, परन्तु तब लेखन हेतु पेन उपलब्ध नही होते थे। उस समय में दीवारों पर नुकीले पत्थरों की सहायता से कुरेद कर लिखित में संकेत दिए जाते थे। इसके अतिरिक्त लड़की को नुकीला बनाकर या पंखों की बारीक डंडी से लेखन कार्य किया जाता था। बाद में समय बीतने के साथ-साथ शिक्षा के स्तर में भी विकास हुआ तथा विज्ञान में भी धीरे-धीरे तरक्की होने लगी। बहुत से कुशल बौद्धिक क्षमता वाले ज्ञानी लोग हुए, जिन्होंने समय-समय पर नए-नए आविष्कार किये। उन्हीं में से एक आविष्कार पेन का भी हुआ।

पहले हम आपको फाउन्टेन पेन के बारे में जानकारी देना चाहेंगे, तत्पश्चात बॉल पॉइन्ट पेन के बारे में व्याख्या करेंगे।

फाउन्टेन पेन की निब अत्यन्त तीखी होती है।  इस पेन के भीतर स्याही डाली जाती है तथा पेन के इस्तेमाल के साथ-साथ यह स्याही कम होते होते खत्म हो जाती है तो इसमें पुनः स्याही भरी जा सकती है। यह पेन गुरुत्वाकर्षण के नियम के आधार पर कार्य करता है अर्थात् गुरुत्व बल के कारण ही इसकी स्याही नीचे की ओर आती है तथा छपती है।

पेट्रेक पौएनारु द्वारा सर्वप्रथम फाउन्टेन पेन का आविष्कार किया गया था। उनकी इस खोज के लिए फ़्रांस की सरकार ने सन् 1827 में उनके नाम इस पेन पर पेटेण्ट भी जारी किया।

फाउन्टेन पेन का आविष्कार के बाद इसमें कुछ सुधार करके “वाटरमैन पेन” का आविष्कार संयुक्त राज्य अमेरिका के लेविस ई वाटरमैन सन् 1884 में किया था।

बॉल पॉइंट पेन का आविष्कार अर्जेन्टीना के लाज़लो बीरो ने सन् 1944 में किया था। इनका जन्म 1899 में हंगरी में हुआ था तथा इनकी यहूदी पारिवारिक पृष्ठभूमि थी। जन्म से इनका नाम लेडिस्लाओ जॉस बीरो था, परन्तु बाद में लाज़लो बीरो के रूप में नाम परिवर्तित हुआ तथा इसी नाम से प्रसिद्ध हुए।

बीरो पेशे से पत्रकार थे।

आइये अब हम आपको बताते हैं कि बीरो को बॉल पेन का आविष्कार करने का विचार कैसे आया।

पत्रकार के रूप में लिखित कार्य करने के दौरान तब फाउन्टेन पेन का इस्तेमाल किया जाता था। इसमें समस्या यह थी कि कई बार लिखते लिखते इस पेन की स्याही का आवश्यकता से अधिक बहाव हो जाने के कारण तथा जल्दी न सूखने के कारण स्याही के धब्बे पड़ जाते थे तथा लिखावट खराब हो जाती थी। इस प्रकार से स्याही छूट जाने के कारण बीरो को परेशानी होने से ही बॉल पेन के विचार का जन्म हुआ।

उन्होंने ऐसा पेन बनाने के बारे में सोचा जो लिखने के साथ-साथ सूखती जाए तथा लिखावट में खराबी पैदा न होने पाये। इस प्रकार से उन्होंने पतली निब वाले पेन का आविष्कार किया, जिसमें छोटी से बॉल (गेंद) होती थी, जो लिखते वक्त घर्षण करती हुई घूमती रहती है और कागज पर छपती रहती है तथा कार्टेज से स्याही की पूर्ति करती थी।

बॉल पॉइंट पेन की निब स्टील, टंगस्टन व पीतल से ही निर्मित की हुई होती है। इटली, आयरलैंड व ब्रिटेन में तो आजतक भी बॉल पेन को “बीरो पेन” के नाम से ही जाना जाता है|

कम्प्यूटर का आविष्कार Invention of computer in Hindi

आज के तकनीकी युग में ऐसा कोई भी इन्सान नही है जो कम्प्यूटर के अस्तित्व के ज्ञान से अनभिज्ञ हो। कम्प्यूटर को संगणक भी कहा जाता है। बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ, कारोबार, देश-विदेश से आयात-निर्यात, उद्योग आदि में होने वाले कार्य व हिसाब-किताब तथा लेनदेन आदि सब कुछ बिना गमन के ही सम्भव हो गया है तो इसका एक मुख्य कारण कम्प्यूटर भी है। यह हमारी तकनीक द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य तोहफा है।

आजकल प्रत्येक क्षेत्र में चाहे बैंक हो या साधारण दुकान या बड़ी फैक्ट्री या अदालत या अन्य व्यवसाय अर्थात् लगभग सभी क्षेत्रों में कम्प्यूटर का अत्यधिक महत्व हो गया है। कम्प्यूटर की आवश्यकता, महत्व व विशेषताओं की बात की जाए तो ये शायद निरन्तर बनी ही रहेंगी तथा असीमित ही होती जाएंगी। 

आइये जानते हैं कि कम्प्यूटर कैसे अस्तित्व में आया।

कम्प्यूटर का आविष्कार चार्ल्स बैबेज ने सन् 1822 में किया था। इन्होंने सर्वप्रथम “डिफरेंशियल इन्जन” नामक एक कम्प्यूटर का निर्माण किया था।

चूँकि सबसे पहले कम्प्यूटर का अस्तित्व चार्ल्स बैबेज के द्वारा ही सामने लाया गया, इसीलिए उन्हें कम्प्यूटर का जनक (पिता) भी कहा जाता है।

इसके अतिरिक्त समय व्यतीत होने के साथ-साथ कई तकनीकशास्त्रियों द्वारा भिन्न-भिन्न तरह के कम्प्यूटर निर्मित किये गए, जिनके बारे में हम आपको जानकारी उपलब्ध करवाने जा रहे हैं।

बैबेज के पश्चात सन् 1938 में यूनाइटेड स्टेट्स नेवी द्वारा “टारपेडो डेटा कम्प्यूटर” बनाया गया। 

सन् 1939 में जर्मनी में सर कोर्नेड ज़ीउस द्वारा वेक्यूम ट्यूब्स की सहायता से एक कम्प्यूटर निर्मित किया गया। इसे “Z2” नाम दिया गया। बाद में धीरे-धीरे तकनीकी विकास के साथ-साथ इसी कम्प्यूटर में ओर अधिक नई युक्तियाँ जोड़ी गयी तथा बदलाव करके सन् 1941 में ओर बेहतर कम्प्यूटर बनाया गया, जिसे “Z3” नाम दिया गया।

सन् 1942 में भौतिकशास्त्री जॉन विंसेट तथा उनके साथी क्लिफोर्ड बेरी द्वारा वैक्यूम ट्यूब का प्रयोग करके प्रथम विद्युत कम्प्यूटर का प्रारूप तैयार किया गया।

सन् 1944 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आइकेन द्वारा रिले संगणना मशीन का निर्माण किया गया, इस कम्प्यूटर का नाम “मार्क-1” रखा गया था। यह आकार में अत्यधिक बड़ी थी।

सन् 1946 में पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के जॉन मौचलि और प्रेस्पर आईकेर्ट ने ‘इलेक्ट्रॉनिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटेड एन्ड कम्प्यूटर” (ENIAC) कम्प्यूटर का निर्माण किया, जो लगभग एक कमरे के आकार जितना बड़ा था तथा इसे बनाने के लिए लगभग 18000 वैक्यूम ट्यूब्स का इस्तेमाल किया गया था। यह वजन में भी अत्यधिक भारी था। इसे अमेरिका के सैनिक सहायता के लिए बनाया गया था। बाद में तकनीकी प्रगति के साथ-साथ सन् 1951 में इन्हीं भौतिकशास्त्रीयों द्वारा कॉमर्शियल कम्प्यूटर के रूप में “UNIVAC” कम्प्यूटर का भी विकास किया गया था।

सन् 1947 में ट्रांजिस्टर के आविष्कार के बाद कम्प्यूटर के विकास में ओर अधिक सहायता मिली, क्योंकि कम्प्यूटर में ट्रांजिस्टर का प्रयोग करने से ये आकार में छोटे हो गए तथा नई उन्नति की ओर कदम बढ़ाये गए।

सन् 1975 में पहले पर्सनल कम्प्यूटर (PC) को उजागर किया गया। इसे व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल के लिए विक्रय हेतु बाजार में उपलब्ध करवाया गया। इस कम्प्यूटर को  “MITS AITAIR 8800” के नाम से जाना गया।

सन् 1977 में विख्यात कम्पनी एप्पल द्वारा रंगीन ग्राफिक्स वाली विशेषताओं से बनाया गया प्रारूप “एप्पल 2” को पेश किया गया।

सन् 1981 में आई.बी.एम. ने माइक्रोसॉफ्ट डिस्क ओपरेटिंग सिस्टम (MS DOS) वाले कम्प्यूटर को लोकोपयोग के लिए पेश किया।

सन् 1984 में एप्पल द्वारा माउस व ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस की विशेषता के साथ “मैकिटोंश कम्प्यूटर” बनाये गए।

सन् 1996 में सर्वप्रथम हाथ में रखकर चलाने योग्य कम्प्यूटर का आविष्कार किया गया, जिसे “पाल्म पायलट” का नाम दिया गया।

इस प्रकार से आप समझ सकते हैं कि किस प्रकार से 19वीं व 20वीं सदी में भिन्न-भिन्न तरह के कम्प्यूटर के आविष्कार किये गए तथा समय बीतने के साथ-साथ जैसे-जैसे तकनीकी विकास होता गया, वैसे-वैसे कम्प्यूटर में नई विशेषताओं का भी विकास जारी रहा तथा कम्प्यूटर का आकार भी छोटा होता गया।

कम्प्यूटर विभिन्न प्रकार के होते हैं। इनके बारे में भी हम आपको कुछ जानकारी उपलब्ध करवाने जा रहे हैं।

कार्य करने के आधार पर कम्प्यूटर तीन प्रकार के होते हैं-

एनालॉग कम्प्यूटर-  खोज कार्यों व इंजीनियरिंग के क्षेत्र में एनालॉग कम्प्यूटर का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि इनका प्रयोग मापन में किया जाता है, जैसे- तापमान, गहराई, दबाव, गति आदि के उचित माप लेना।

डिजिटल कम्प्यूटर – ये कम्प्यूटर बाइनरी संख्या 0 व 1 के आधार पर कार्य करते हैं। डिजिट परिमाण प्राप्त करने के लिए इनका प्रयोग शिक्षा व बैंक के क्षेत्र मे तथा व्यावसायिक उपयोग में किया जाता है। 

हाइब्रिड कम्प्यूटर- यह ऐसे कम्प्यूटर होते हैं, जिनमे एनालॉग व डिजिटल दोनों ही विशेषतायें पाई जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में मापन की आवश्यकता के साथ-साथ परिणामों को डिजिट के रूप में भी पेश करना आवश्यक होता है, वहीं इनका उपयोग किया जाता है, जैसे- चिकित्सालयों में।

इनके अतिरिक्त आकार व उद्देश्य के आधार पर चार प्रकार के कम्प्यूटर होते हैं-

माइक्रो कम्प्यूटर- यह साधारण रूप से प्रयोग में लिया जाने वाला व्यक्तिगत कम्प्यूटर (PC) है। इसका प्रयोग दिन-प्रतिदिन के कार्यों व डेटा सुरक्षित रखने, संगीत सुनने व इंटरनेट आदि हेतु किया जाता है।

मिनी कम्प्यूटर- यह एक साथ कई कार्यों को करने के उद्देश्य पूरा करने वाला तथा एक से अधिक उपयोगकर्ताओं द्वारा संचालित मध्यम आकार का कम्प्यूटर होता है।

मेनफ़्रेम कम्प्यूटर- ये बहुत बड़े आकार के कम्प्यूटर होते हैं। जिनका प्रयोग भी बड़े उद्देश्यों के लिए कई फैक्ट्रियों व कम्पनियों में किया जाता है। 

सुपर कम्प्यूटर- यह नाम से ही स्पष्ट है कि अत्यधिक विशालकाय कम्प्यूटर, जिनका प्रयोग विज्ञान में अनुसन्धान सम्बन्धी व मौसम विभागों द्वारा किया जाता है। ये अत्यन्त तीव्र कार्यक्षमता वाले होते हैं।

भारत में 1 जुलाई 1991 में सर्वप्रथम “परम 8000” नामक सुपर कम्प्यूटर C-DAC द्वारा निर्मित किया गया|