मंगल ग्रह की जानकारी

मंगल ग्रह

मंगल ग्रह प्रोफाइल प्रोफाइल

त्रिज्या – 3,3 9 0 किमी गुरुत्वाकर्षण – 3.711 मीटर / वर्ग मीटर
मास– 6.3 9 × 10 ^ 23 किलो (0.107 एम⊕)
चंद्रमा डेमोस, फोबोस
सतह क्षेत्र – 144.8 मिलियन वर्ग किमी
सतह तापमान  -55 डिग्री सेल्सियस (माइनस 55 डिग्री )

मंगल का उपनाम है और हम इसे लाल ग्रह भी कहते हैं। ग्रह लाल रंग के धूल से ढका हुआ है जो इसे इसका लाल रंग देता है । ग्रह का वातावरण गुलाबी लाल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मंगल ग्रह पर जीवन के संकेत हो सकते हैं क्योंकि इसपर पानी है। मानव अस्तित्व के लिए पानी जरूरी है और फसलों की पोषण के लिए भी पानी चाहिए, नही तो पानी के बिना कुछ भी जीवित नहीं रह सकती हैं। नासा और इसरो द्वारा मंगल ग्रह के बारे में लगातार जानकारी इक्कठा की जा रही है वो भविष्य में नए नए राज खोलेगी, यहाँ हम मंगल गृह के बारे में कुछ तथ्य पेश कर रहे है जिसे आप पढना चाहते हैं

मंगल ग्रह पृथ्वी से बहुत ठंडा है।
मंगल ग्रह हमेशा धुल और आंधियो की चपेट में रहता है जो बहोत ही खतरनाक है
मंगल ग्रह पर कई ज्वालामुखी हैं और इसमें ओलंपस मॉन्स, पूरे सौर मंडल में सबसे बड़ा ज्वालामुखी है। यह 21 किलोमीटर ऊंचा है।

मंगल ग्रह पर एक पतला वातावरण है जो मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड से बना होता है। यदि इस ग्रह पर घना वातावरण होता है, तो यह सूर्य की गर्मी को संचित करने में सक्षम होता , जैसे वीनस करता है। लेकिन चुकी इसका वातावरण काफी पतला है, इसलिए मंगल ग्रह ठंडा है और सर्दी भरी रातो में वहा का तापमान -120 डिग्री होता है। हमारे पृथ्वी का जो वातावरण है वह मगल की तुलना में काफी सघन है जो सूर्य की उसमा को संचित कर के रखता है इसलिए हमें मंगल जैसी ठण्ड का सामना नही करना पड़ता।

ग्रह पर पानी का क्षरण संभव हो सकता है क्योंकि इसकी सतह पर कई घाटी, मैदान और चैनल हैं। ऐसा माना जाता है की मंगल ग्रह पर हजारो साल पहले नदिया और समुन्द्र बहा करते थे।

मंगल ग्रह की गुरुत्वाकर्षण बहोत ही कमजोर है। इसका मतलब यह हुआ की अगर आपका वजन पृथ्वी पर 100 किलो है तो आपका वजन मंगल ग्रह पर 37 किलो होगा।

मंगल ग्रह पर जमे हुए बर्फ कैप्स हैं जिसका अर्थ यह हो सकता है कि मंगल ग्रह पर जीवन का अस्तित्व था।
मंगल ग्रह पर भी पृथ्वी जैसे मौसम हैं।

मंगल ग्रह आकर में  पृथ्वी से बहोत छोटा है , लेकिन चन्द्रमा से बड़ा है। अगर हम इसकी तुलना सूर्य से करे तो अगर हम सूर्य को घर का दरवाजा मान ले तो मंगल एस्पिरिन टेबलेट के आकर का होगा।

सूर्य से मंगल चौथा ग्रह है जिसकी दुरी 228 मिलियन किलोमीटर है सूर्य से।

मंगल ग्रह पर दिन पृथ्वी से बड़ा होता है और यह 687 दिन में सूर्य का एक चक्कर लगता है।

मंगल ग्रह का सतह काफी खुरदुरा और पत्थरों से भरा पड़ा है।

मंगल ग्रह पर लोहे के खनिज काफी मात्रा में है और जब इनमे जंग लग जाता है तो इनका रंग लाल हो जाता है इसलिए मंगल गृह लाल दिखाई पड़ता है।

अगर हम मंगल ग्रह की तुलना पृथ्वी से करे तो पृथ्वी के भीतर 6 मंगल ग्रह समा सकते हैं।

एलियन क्या होता है

परग्रही, एलियंस

मुझे एलियंस तो पहले एक कल्पना लगते थे परन्तु , आजकल इतनी फ़िल्में, न्यूज़ और वैज्ञानिको के विचार-विमर्श सुनने के बाद मै भी काफी उत्सुक हो गया| मेरे मन में हमेशा ये प्र्शन आते की आखिर ये एलियन होते क्या हैं ? कहाँ से आते हैं ? क्यों आतें है ? आते भी हैं या नहीं ? और बहुत कुछ .

वैसे तो मुझे ये सारी बातें भ्रांतियां लगती थी, परन्तु ऐसे बहुत सी जानकारियां है जो आपको एलियंस के होने का विश्वास दिलातीं है | इस ब्रम्हांड में हमारे ही सौर मंडल की तरह कई सौरमंडल पाए जातें है , उनका भी अपना सूर्य होता है जिसके चारों ओर दूसरे ग्रह चक्कर काटतें है | एलियंस के बारे में मानना है की ये हमारे जैसे ही दूसरे सौरमंडल के ग्रहों से आतें है | पर अब भी इस बात के पुख्ता सबूत नहीं मिलते है |

हालाँकि, ये अपने आप में खुद एक प्रश्न चिन्ह है की क्या दूसरे ग्रहों में जीवन है? इस बात पर विभिन्न लोंगो के अलग – अलग मत है| कुछ कहतें है की एलियंस होते है , जबकि कुछ कहतें है की एलियंस नहीं होते |

है न कमाल का विषय ?

तो चलिए आज आपके साथ शेयर करूँगा एलियन से जुडी कुछ रीसर्च एंड इनसे जुडी कुछ रोचक बातें | अभी कुछ समय पूर्व अमेरिकी अनुसंधान संसथान के एक वैज्ञानिक ने यह दावा किया है की एलियन होतें हैं | असल में उन्होंने एलियन से सम्बंदित रीसर्च में कहा है की एलियंस एक तरह का बैक्टीरिया या जीवाश्म है जो कई वर्षों पूर्व अंतरिक्ष से धरती पर गिरे उल्कापिंडों में पाया जाता है |

नाशा के एक वैज्ञानिक ने धरती पर गिरे उल्का पिंडो का अध्यन कर ये तथ्य रखा है की एलियंस होते है | उन्होंने ये साइबीरिया और अलास्का में पाए गए असाधारण नमोनो पर शोध कार्य किया जिससे ये निष्कर्ष निकला की इस ब्रमांड में कई दुनिया है और हमारे आलावा भी दूसरे जीव है जो समय – समय के साथ अपनी उपस्थिति का अनुमान देतें रहतें है |एलियन अगर हैं तो धरती पर क्यों आतें है ? इसका भी कोई सटीक उत्तर नहीं है| वैसे तो कई लोगों ने यूएफओ देखने का दावा किया है , सबसे पहले 1440इस्वी पूर्व में किया गया था| अब आगे समय ही बताएगा की आखिर एलियन और धरती के बीच का क्या सम्बन्ध है और यह बात भविष्य में किस मोड़ पर पहुंचेगी |.

उल्कापिंड किसे कहते हैं

उल्का पिंड

आसान शब्दों में कहे तो उल्कापिंड एक ब्रह्मांडीय पत्थर है जिसका आकार छोटे पत्थर से लेकर बड़े पहाड़ जैसा हो सकता है या फिर उससे भी बड़ा और यह ब्रह्माण्ड में विचरण करता है

रात में आपने कभी आकाश की तरफ देखा है की एक लम्बा सा तारा टूटता हुआ दिखाई देता है | अक्सर गर्मियों में जब आप चांदनी रात में आसमान को ताकते हैं तो शायद आपने देखा होगा, जब तारा टूटता है तो एक लम्बी सी लाइन बनती चली जाती है |और, इसको लेकर लोंगो में तरह- तरह की मान्यताएं और भ्रांतियां सुनने को मिलती है | और यहाँ तक एक मान्यता मानी गयी है की, जब तक तारा टूटता रहता है यानि की उसका प्रकाश दिखाई देता रहता है और लाइन दिखाई देती रहती है, उस मध्य में अगर कोई अपने कपडे, आँचल, रुमाल इत्यादि में से किसी पर भी एक गांठ लगाके एक मनोकामना करता है और उसी समय में खोल देतें है तो उनकी मनोकामना पूरी होती है |

कुछ लोगों का मानना है की ये आसमान में विचरण करती हुई आत्माएं है | और ये आत्माएं क्या करतीं है ? जब वह अपनी जगह बदलतीं है, किसी भी एक जगह से दूसरी जगह जातीं है तो वो चमकतीं है | इसके पीछे जो भी मान्यताएं और अस्थायें हों, मगर सत्य यह है की ये उल्काएं होती है, धूमकेतु होतें है | ये छोटे -बड़े आकाशीय पिंड होतें है, जो निरंतर सूर्य की परिकर्मा करतें रहतें है|

और जब कभी कोई पिंड, छोटा हो या बड़ा हो घूमते- घूमते पृथ्वी के पास आ जाता है तो , पृथ्वी की आकर्षण शक्ति यानि गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी की ओर खिंचने लगता है | गुर्त्वाकर्षण का जो नियम है उसके अनुसार एक निश्चित दूरी तक पृथ्वी इस बल के कारण अपने से दूर से गुजरती हुई वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है | और इस खिंचाव के कारण जो पिंड का जो वेग है, वो बहुत ज्यादा बढ़ने लगता है | और वेग इतना ज्यादा बढ़ जाता है की जैसे ही वह हमारे वायुमंडल में प्रवेश करता है तो घर्षण के कारण इसमें आग लग जाती है | और आग लगके उसमें से गैसें निकलने लगती है | और ये जलती हुई गैस प्रकाशवान हो जाती है | और उल्का की चमक दिखाई देतीं है | और कभी – कभी ये आकर में अत्यधिक बड़े होतें हैं और जलकर छोटे हो जातें है | और इनमेंसे अधिकतर पिंड वायुमंडल में प्रवेश करते ही नष्ट हो जातें है और छोटे भागों में विभाजित हो जातेंहै | और जो बहुत बड़े होतें है और जलने के बाद भी उनका कुछ हिस्सा बचा रहता है , वो धरती तक पहुँच जातें है | ये उल्का पिंड या धूमकेतु कहलातें है |

आयाम किसे कहते है

आयाम यानि डाइमेंशन, जिस तरह से हम भौतिकी में किसी भी चीज को मापते है, जैसे तापमान को केल्विन में लम्बाई को मीटर में समय को घंटे में और करंट को एम्पियर में उसी तरह से ब्रम्हांड में हो रही सारी घटनाओं को आयाम में मापते है |स्ट्रिंग थ्योरी के अनुसार ब्रम्हांड में वास्तविक रूप में १० आयाम हो सकतें है | और एम थ्योरी के अनुसार ब्रम्हांड में ऐसे ११ आयाम हो सकतें है | जबकि बोजोनिक थ्योरी के अनुसार ब्रम्हांड में २६ आयाम हो सकतें है|

शुरुआत होती है शून्य आयाम से – कल्पना कीजिये की प्रकृति का बनाया हुआ कोई ऐसा जीव है जो शून्य आयाम में मौजूद है | अब यहाँ पर ध्यान देने वाली बात यह है की शून्य मतलब कुछ भी नहीं अर्थात शून्य आयाम में स्थित इस जीव का कोई भी आकर नहीं होगा न ही उसका कोई शरीर होगा |

शून्य आयाम को समझने के लिए हम एक काल्पनिक बिंदु मान लेते है , ध्यान दीजिये की इस बिंदु का कोई भी आकर नहीं होता है | अब इस बिंदु में मौजूद वो जीव न आगे जा सकता है न ही पीछे, न ऊपर जा सकता है न ही नीचे और यहां तक की वो जीव अपनी जगह पर घूम भी नहीं सकता |

मैं आपको बता दूँ की आगे आने वाले सभी आयामों का आधार शून्य ही है |

पहला आयाम – कल्पना कीजिये के शून्य आयाम के दो बिंदु है, जो एक दुसरे से कुछ दूरी पर है , अब इन दोनों बिंदुओं को मिला देतें ही तो इस अवस्था में जीरो आयाम में उपस्थित वह जीव केवल आगे और पीछे ही जा सकता है |

दूसरा आयाम – पहले आयाम में उपस्थित वो जीव आगे पीछे चलने के बाद दाएं और बाएं भी चल सके जैसा की आपने कभी सांप वाला गेम खेला ही होगा, | यही है दूसरा आयाम|

तीसरी आयाम में उस जीव की जगह पर हम खुद को रखतें है | अब आप देख सकतें है की इस तीन आयाम वाली दुनिया में हम आगे पीछे और दाएं बाएं जाने के साथ -साथ ऊपर नीचे भी जा सकतें है | इसी को ही तीसरा आयाम कहतें ही |

चौथा आयाम – चौथा आयाम है समय, जिसमें हम अभी चल रहें है , मैं आपको अवगत करा दूँ की ये तीनों आयाम और समय आपस में जुड़े हुए है | हम समय में एक सरल रेखा की तरह आगे बढ़ते चले जा रहें है | हम भूतकाल से भविष्य काल की ओर चलते चले जा रहें है, यही है चौथी आयाम| बाकी आयाम परिकल्पनाएं हैं जो वैगनिकों द्वारा बनाई गयीं है, जिसमें इंसान का जाना संभव नहीं है |

सौरमंडल के ग्रह और रोचक तथ्य

सूर्य, चन्द्रमा, और बाकी खगोलीय पिंड, हमारे ग्रह को हर ओर से घेरे हुए हैं। और आकाश में टिमटिमाते तारों और इन सब छोटी बड़ी सनरचनाओं को देखकर हम कितने रोमांचित हो उठते हैं। यही रोमांच जब वैज्ञानिक शोध का आधार बन जाता है, तब अनेकों नए सिद्धांत, नयी खोजें जन्म लेती हैं। और मानव अंतरिक्ष में अपनी स्थिति को और बेहतर समझ पाता है।

माना जाता है की आज से लगभग 46 करोड़ साल पहले अंतरिक्षीय गैसों का एक बहुत बड़ा बादल किसी ऊर्जा से उद्वेलित हुआ था। और इस हलके से उद्वेलन ने इस बादल में मौजूद कणों को इस के अपने अंतर्गुरुत्वाकर्षण के कारण एक दुसरे की ओर धकेलना शुरू कर दिया। और इसी हलके से उद्वेलन ने हमारे सौर मंडल की कहानी की शुरुवात कर दी। इस उद्वेलन से आपस में टकराते हुए बादल के कण घूमने और फिर गर्म होने लगे, और इस बढ़ते हुए तापमान और गति ने बादल के बेडौल आकर को एक गोल तश्तरी जैसी आकृति में बदल दिया। इसी तश्तरी के बीचों बीच इतने तेज़ घूर्णन और गर्मी के कारण हुई आणविक प्रक्रियाओं ने हमारे सूर्य का रूप ले लिया जो की आज तक जारी है।

और सूर्य तो केवल शुरुआत थी। धीरे धीरे तापमान कम हुआ, और तापमान में आये इन उतार चढ़ावों ने, कई भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं को जन्म दिया, जिनके परिणाम स्वरुप अलग अलग रासायनिक कण आपस में जुड़ने-चिपकने लगे। और जैसे जैसे कण जुड़ते गए वैसे वैसे खगोलीय पिंड बड़े होते गए और नन्ही ग्रहिकाओं का निर्माण हुआ।

फिर जैसे कण आपस में टकरा रहे थे, उसी तरह ग्रहिकाएँ भी आपस में टकराती-जुड़ती रहीं और और धीरे धीरे इतनी बड़ी हो गयीं के अपना खुद का गुरुत्व उत्पन्न कर सकें और अपने आसपास किसी तरह का पैटर्न या गणितीय करीना बना सकें। और यही ग्रहिकाएँ आज के हमारे सौरमंडल के ग्रहों में बदल गयीं।

हमारे इस विहंगम सौरमंडल से जुड़े और भी कई रोचत तथ्य हैं।

इसमें 1 सूर्य और 8 ग्रह

  1. मक्यूरि या बुध
  2. वीनस या शुक्र
  3. स्वयं पृथ्वी
  4. मार्स या मंगल
  5. बृहस्पति या जुपिटर
  6. शनि या सैटर्न
  7. युरेनस (अरुण)
  8. नेप्चून (वरुण)

हैं। इसके अलावा 5 बौने या गौण ग्रह जिनमे प्लूटो या यम, सेरेस, हॉमी माकेमाके और एरिस शामिल हैं।

इसके अलावा इन ग्रहों के कुल, अभी तक 181 चंद्रमाओं की पहचान हो चुकी है। और 566,000 क्षुद्र ग्रह और 3,100 उल्कापिंड भी इस विशाल अंतरिक्षीय क्रीड़ांगन की शोभा बढ़ाते हैं।

हमारा आकाश आश्चर्यों से भरा, अपने रहस्य खोलने के लिए केवल हमारी जिज्ञासा का इंतज़ार कर रहा है।

प्रकाश वर्ष किसे कहते है। What is light year in Hindi

प्रकाश वर्ष की परिभाषा
प्रकाश वर्ष खगोलीय दूरी का वह इकाई है, जो की 1 साल में प्रकाश द्वारा तय किया गया दुरी के बराबर है।

प्रकाश वर्ष खगोलीय दुरी का मात्रक है। चुकी ब्रह्माण्ड इतना बड़ा और विशाल है की हम इसकी दुरी किलोमीटर में नही नाप सकते इस लिए ग्रहों और तारो की दुरी नापने के लिए हमें एक अलग मात्रक की जरूरत पड़ती है जिसे हम प्रकाश वर्ष कहते हैं।

अगर हम खगोलीय दुरी को प्रकाश वर्ष में नही नापे तो हमारी पृथ्वी से नजदीकी तारे की दुरी 38,000,000,000,000 किलोमीटर होगी। ये तो सूरज को छोड़कर पृथ्वी से सबसे नजदीकी तारे की दुरी है, अब सोच लीजिये की सबसे दूर तारे की दुरी किलोमीटर में क्या होगी। शायद हम गणना भी ना कर पाए। इसलिए इस परेशानी को दूर करने लिए हम प्रकाश का इस्तेमाल करते है।

जैसा की आप जानते हैं की प्रकाश 300,000 किलोमीटर पर सेकंड की रफ़्तार से दुरी तय करता है तो चलिए आइये हम यह पता लगते हैं की

1 प्रकाश वर्ष में कितना किलोमीटर होगा

300,000 * 60 सेकंड * 60 मिनट * 24 घंटा * 365 दिन  = 9,460,800,000,000 किलोमीटर की दुरी

मतलब की 1 प्रकाश वर्ष 9,460,800,000,000 किलोमीटर की दुरी के बराबर होता है

चुकी ब्रह्माण्ड की तुलना में हमारा पृथ्वी बहोत छोटा है तो यहाँ हम किलोमीटर से काम चला लेते हैं लेकिन ब्रह्माण्ड में काम चलाना मुस्किल हो जाता है। अब आप समझ गये होंगे की 1 प्रकाश वर्ष में कितना किलोमीटर होता है।

प्रकाश वर्ष से ब्रह्माण्ड की दुरी नापने के अन्य फायदे

क्या आपको पता है की हम प्रकाश वर्ष से किसी तारे की उम्र का भी पता लगा सकते हैं ? जी हाँ , आप जितने भी तारे आसमान में देखते है वो अभी वैसे नही हैं जैसा हमने देखा। बल्कि आप वर्त्तमान ना देख कर भूतकाल में हैं।  क्यों की कुछ तारे पृथ्वी से इतने दूर हैं की उनका प्रकाश पृथ्वी पर हजारो, लाखो प्रकाश वर्ष के बाद पहुचता है।

तो अगर आपने किसी तारा को देखा जो की 1 प्रकाश वर्ष की दुरी पर है तो यह मान लीजिये की आप उस तारे को 1 साल पहले जैसा था वैसा देख रहे हैं और अभी जैसा है वैसा नहीं।

अगर वह तारा 1000 प्रकाश वर्ष की दुरी पर है तो आप उस तारे को 1000 साल पहले जैसा था वैसा देख रहे हैं। क्यों की उस 1 हज़ार प्रकाश वर्ष दूर तारे के प्रकाश को पृथ्वी पर पहुचते पहुचते 1000 साल लग गये।

सोचिये, ब्रह्माण्ड इतना बड़ा है की यहाँ प्रकाश वर्ष भी फीका पड़ जाता है लेकिन चुकी 1 प्रकाश वर्ष की दुरी तय कर किसी नजदीकी ग्रह पर जाना ही हमारे लिए मुस्किल काम है इसलिए हम फ़िलहाल प्रकाश वर्ष से की खुश हैं।

फोटो सोर्स

जब प्रकाश ब्रह्माण्ड में दुरी तय करता है तो वह फैलता है और उसका wavelength ( वेव लेंग्थ ) भी बढ़ जाता है, इसका मतलब यह हुआ की जो तारा हमें लाल दिखाई देता है वह पृथ्वी से करोडो प्रकाश वर्ष की दुरी पर है, और जो पिला दिखाई देता है वह पृथ्वी से हजारो या सैकड़ो प्रकाश वर्षा की दुरी पर है यानि की लाल वाले से नजदीक है ,और असमान में जहा काला दिखाई देता है वहा के तारे अरबो प्रकाश वर्ष की दुरी पर है क्यों की उनका प्रकाश का wavelengh इतना फ़ैल गया है की वह प्रकाश visible स्पेक्ट्रम से invisible स्पेक्ट्रम में चला गया है तो इसका मतलब यह हुआ है की प्रकाश तो आ रहा है लेकिन हम उसे आँखों से देख नही पा रहे हैं।

कौन सी मानव निर्मित वस्तु ब्रह्मांड में पृथ्वी से सबसे ज्यादा दूर है

Voyager 1 (वायेजर 1 ) जो की १९७७ में नासा द्वारा, ब्रह्माण्ड में दुसरे ग्रहों को ढूंढने के लिए छोड़ा गया था, अब वह ब्रह्माण्ड में एक ऐसा मानव निर्मित वस्तु है जो की पृथ्वी से सबसे दूर चला गया है।

यह उपग्रह आज भी काम कर रहा है और पृथ्वी पर बैठे लोगो को सन्देश भेजते रहता है। वायेजर 1 का अब पॉवर सप्लाई कम हो रहा  है और ऐसा माना जा रहा है २०२५ तक वायेजर 1 पृथ्वी पर सन्देश भेजना बंद कर देगा।

फरवरी २०१८ की डाटा तो माने तो वायेजर 1 पृथ्वी से २१ बिलियन किलोमीटर दूर जा चूका है।

नासा ने १९७० से ही दुसरे ग्रहों के बारे में जानकारी इकठ्ठा करना सुरु कर दिया था। वायेजर 1 को जुपिटर, सैटर्न और प्लूटो के बारे में जानकारी इकठ्ठा करने के लिए बनाया गया था लेकिन बाद में इसे सैटर्न का मून टाइटन तक के लिए डिजाईन किया गया।

वैसे तो अब वायेजर 1 हमारे सौर मंडल से काफी दूर जा चूका है और उसका अब कोई अगला ठिकाना नही है लेकिन नासा कहता है की वायेजर 1 हमारे आकाश गंगा में घूमते रहेगा हमेशा के लिए और आज से 40,000 साल बाद एक नजदीकी तारा Gliese 445 ( ग्लिएस ) से होकर गुजरेगा जो की 1.6 लाइट इयर की दुरी पर रहेगा।