ग्रहों के नाम हिंदी व अँग्रेजी

ग्रह यानि कि प्लेनेट (Planet),  यह शब्द ग्रीक भाषा के शब्द प्लेनेटिया से बना है। प्लेनेटिया का मतलब होता है- यात्री। 

हमारे सौरमण्डल के ग्रह भी यात्री के समान घूमते रहते हैं। ग्रह सूर्य की कक्षाओं में इसके चारों ओर गति करते हुए घूमते हुए चक्कर लगाते रहते हैं। 

पहले सन् 2006 तक ग्रहों की कुल संख्या 9 मानी जाती थी। नौवें ग्रह में Pluto (यम) को सम्मिलित किया जाता था। लेकिन उसी वर्ष “अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ” IAU द्वारा यह तथ्य पेश किये गए कि यम ग्रह सूर्य से अत्यधिक दूरी पर स्थित है, जिसे ग्रहों की श्रेणी में नही रखा जाना चाहिए। अतः यम ग्रह को उस श्रृंखला से बाहर करते हुए श्रेणी में कुल 8  मुख्य ग्रहों को स्थान दिया गया।

वर्तमान समय में हमारे सौरमण्डल में आठ ग्रह हैं। जो ये हैं-

पृथ्वी Earth

बृहस्पति Jupiter

मंगल Mars

बुध Mercury

वरुण Neptune

शनि Saturn

अरुण Uranus

शुक्र Venus

सबसे बड़ा व वजनी ग्रह बृहस्पति है। सबसे छोटा ग्रह बुध है और यह सूर्य के सर्वाधिक निकट स्थित है। शुक्र सबसे चमकदार ग्रह है। वरुण ग्रह सूर्य से सर्वाधिक दूर स्थित ग्रह है, इसे हरा ग्रह भी कहते हैं और सर्वाधिक ठण्डा ग्रह है। पृथ्वी को नीले ग्रह के नाम से जाना जाता है। मंगल को लाल ग्रह भी कहते हैं|

वैज्ञानिको ने ब्लैक होल की तस्वीरें कैसे ली?

ब्लैक होल को अब तक ब्रह्मांड में मौजूद सबसे रहस्यमय खोजों में से एक माना जाता रहा है| आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्लैक होल की सीधी तस्वीर लेना मुमकिन नहीं है क्योकि ब्लैक होल अपने पास किसी भी किरण, गामा किरन, प्रकाश, या प्रतिबिम्ब लेने वाली किसी भी रे को अपने अंदर खींच लेता है|

तो फिर अप्रैल 2019 को ब्लैक होल की जो तस्वीर विश्व भर में प्रसिद्ध हुई वो कैसे ली गई होगी इसी के बारे में हम आपको जानकारी देंगे|

क्या है ब्लैक होल?

ब्लैक होल हमारे सूरज से तकरीबन 650 करोड़ अधिक द्रव्यमान एवं 100 अरब किमी. दूर तक फैला हुआ एक ऐसा खड्डा है जो पृथ्वी से साड़े 5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है एवं यह अपने विस्तार में आने वाली किसी भी चीज जैसे तारे, उल्कापिंड, या मानवनिर्मित वस्तुओ को अंदर खीचं लेता है|

कैसे ली गई ब्लैक होल की तस्वीर?

ब्लैक होल की जो तस्वीर सामने आई है वह सीधी न लेकर आभासीय या वर्चुअल इमेज है जिसे ब्लैक होल के नजदीक उपस्थित घटना क्षितिज से मिले डाटा के द्वारा निर्मित किया गया है|

इस प्रक्रिया को VLBI या Very Long Baseline Infromatery भी कहा जाता है जिसमे विश्व में स्थापित 8 अत्यंत शक्तिशाली टेलिस्कोप द्वारा डाटा इकठा करके अर्जित किया गया|

इस विशाल टेलिस्कोप के संयोजन से अन्तरिक्ष में झांक पाना बेहतर हो गया एवं ब्लैक होल की आभासीय इमेज बनाई जा सकी|

ब्लैक होल की इमेज लेने के लिए 2017 से NASA द्वारा प्रयत्न किये जा रहे थे किन्तु नाकामयाब रहे पर अब 2019 में कामयाबी हासिल हुई|

खगोलविदों के लिए ब्लैक होल अभी भी एक पहली बना हुआ है एवं इसका तीव्र गुरुत्वाकर्षण बल एक दानव की भांति हर चीज को निगल जाता है| वैज्ञानिको का मानना है कि भविष्य में शायद इसकी रियल एवं मूल तस्वीर ली जा सकेगी|     

शुक्र ग्रह (Venus) के रोचक तथ्य

प्रेम और सौन्दर्य का प्रतीक माने जाने वाले शुक्र ग्रह को Venus नाम रोमन की पूजनीय देवी के नाम पर दिया गया है| सौरमंडल में इसे सूर्य से दूरी एवं इसके बड़े आकार के आधार पर छठा स्थान दिया गया है|

शुक्र को अवर ग्रह की श्रेणी में रखा गया है क्योंकी पृथ्वी से देखने पर यह सूर्य से ज्यादा दूर प्रतीत नहीं होता|

यहाँ हम शुक्र ग्रह से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन करेंगे परन्तु उससे पहले इसकी रुपरेखा को समझना अनिवार्य है|

रुपरेखा या The Profile of Venus:

ध्रुवीय विकास- 12,104 किमी.

सूर्य से दूरी- दस करोड़ बयासी लाख किमी.

उपलब्ध उपग्रह- एक भी नहीं

एक वर्ष- पृथ्वी के 224.7 दिनों के समान

वजन- 486732 अरब अरब किलोग्राम

भू-मध्य व्यास- 38,025 कि.मी.

Facts of Venus:

# शुक्र ग्रह पृथ्वी से काफी बातो में समान नजर आता है, जैसे कि इसका आकार, सरंचना, गुरुत्वाकर्षण बल इसलिए इसे पृथ्वी की सिस्टर भी कहा जाता है| दोनों का घनत्व एक जैसा है एवं क्रेटर की कमी है|

# शुक्र ग्रह का एक दिन पृथ्वी के एक साल से भी बड़ा होता है क्योंकी अपनी धुरी पर एक राउंड पूरा करने में शुक्र ग्रह को 243 दिन लगते है जो हमारे यहाँ साल से थोडा कम समय ही है एवं ये दिन सूर्य के चक्कर पूरा करने से भी अधिक है|

# शुक्र एक स्थलीय ग्रह है जो चारों तरफ से बादलों की मोटी परत से ढका हुआ है| सल्फ्यूरिक एसिड के ये बदल शुक्र को पूरी तरह आच्छादित किये हुए है जिससे इसकी सतह का पता नही लग पाता एवं तेज रफ्तार से हवाएं चलती है जिनकी गति कई बार 350 किमी. तक हो जाती है|

# पृथ्वी से समानता होने के कारण पहले ऐसा माना गया के यहाँ जीवन की सम्भावना हो सकती है किन्तु जब भेजे गये उपग्रहों ने यहाँ खोजबीन की तब पता लगा कि शुक्र पर जीवन का कोई नामोनिशान नहीं था न ही कभी सम्भव हो सकता है|

# शुक्र को सबसे गर्म ग्रह माना गया है क्योंकी इसका आसपास का बातावरण कार्बन डाई ऑक्साइड से निर्मित हुआ है जिससे ग्रीन हाउस गैसों का निर्माण होता है एवं सूर्य से आने वाली गर्मी से इसका तापमान 462 डिग्री c तक पहुच जाता है| वायुमंडल में इतने दबाव के कारण यहाँ जीवन सम्भव नहीं है इतना दबाव समुंद्र के 1 किमी. नीचे पाया जाता है|

# अब तक शुक्र पर 20 से अधिक यान भेजे जा चुके है एवं सबसे पहले रूस ने वेनिरा 1 मिशन को 1961 ई. में शुक्र पर भेजा किन्तु यह मिशन सफल नही हो सका| उसके बाद अमेरिका ने मेरिनर 1 को शुक्र पर भेजा पर वह भी सफल नहीं हुआ फिर मेरिनर 2 को भेजा गया जिससे काफी डाटा खोजने में सहायता मिली| अंत में रूस ने फिर से वेनिरा 3 को भेजा जो सतह तक जाने जाने वाला पहला यान बना| इसके पश्चात वेनेरा 4 ने शुक्र के चुम्बकीय फील्ड का पता लगाया जिसे पृथ्वी की तुलना में काफी कमजोर पाया गया|

# शुक्र पर कई जगह छोटे-छोटे गड्डे एक ही स्थान पर पाए गये है जिससे अनुमान लगाया गया कि टूटकर आने वाले उल्का पिंड शुक्र के गर्म वायुमंडल से टकराकर छोटे भागों में टूटकर इससे टकराए होगे|

# पहले रोमन एवं ग्रीक लोगों में यह मान्यता थी कि शुक्र एक नहीं बल्कि दो ग्रह है| किन्तु बाद में सच का पता लगने पर यह पाया गया की यह एक ही ग्रह है एवं आकाश में सबसे चमकने वाला ग्रह है इसलिए इसे एश्वर्य, वैभव, एवं प्यार का ग्रह माना गया एवं ज्योतिष शास्त्र में भी इसका काफी महत्व है|

# यूरोपियन एजेंसी ने 2006 में अपने भेजे गये space shuttle से शुक्र पर 1000 से अधिक ज्वालामुखीयों की खोज की जिसमे से कुछ एक ही सक्रिय अवस्था में है बाकी सब सुप्त है| इसके सबसे विशाल ज्वालामुखी का नाम Matt Mons है जो 5 मील तक ऊँचा है| इनसे निकलने वाले लावा के कारण शुक्र ग्रह का अधिकतम हिस्सा चट्टानी एवं चिकना है|

# प्राचीन समय में Babylonians शुक्र के द्वारा समय एवं तारीख का पता लगाया करते थे| अपनी असीम चमक के कारण इसे शुरू से ही “भोर का तारा” एवं “साँझ का तारा” कहकर पुकारा जाता है|

# शुक्र ग्रह अन्य सभी ग्रहों की विपरीत दिशा में गति एवं घूर्णन करने वाला इकलौता ग्रह है|  

बृहस्पति (Jupiter) ग्रह से जुडी रोचक जानकारी

अपने विशाल आकार एवं भारी वजन के कारण बृहस्पति को सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह माना जाता है| सूरज से दूरी के आधार पर यह पांचवे नम्बर का ग्रह माना गया है जिसे कुछ वैज्ञानिक गैस का राक्षस भी कहते है|

यदि चमक की बात करे तो इसका स्थान चौथा है, इससे पहले सूर्य, चन्द्रमा, एवं शुक्र ग्रह अधिक चमकीले होते है| देखने में यह पीले रंग का दिखाई पड़ता है, एवं अंग्रेजी में बृहस्पति को Jupiter कहा जाता है|

आज हम आपको बृहस्पति से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों से अवगत करवायंगे जिससे सौरमंडल के एक और अद्भुत ग्रह के बारे में आप जान सकेंगे, परन्तु पहले इसकी रुपरेखा के बारे में जानना आवश्यक है:-

बृहस्पति का वजन- 18.98.130 खरब किलोग्राम, पृथ्वी से कई सौ गुना अधिक

भू-मध्य व्यास- 1.42.984 कि.मी.

सूर्य से दूरी- 77.83.40.821 कि.मी.

ध्रुवीय व्यास- 1.33.709 कि.मी.

सतह का तापमान- -108c

उपलब्ध उपग्रह- 79

भू-मध्य रेखा की लम्बाई- 4.39.264 कि.मी.

रोचक तथ्य:

# अपने विशाल आकार एवं अत्यधिक द्रव्यमान के कारण यह सबसे बड़ा ग्रह माना गया है, जिसका वजन हमारी पृथ्वी से 317.83 गुना अधिक है, जो काफी ज्यादा है|

# बृहस्पति के उपर वायुमंडल को निर्मित करने के लिए कई प्रकार का बादलों की परतें नजर आती है जिनमे रासायनिक प्रतिक्रियाएं होती रहती है, इन्ही के कारण बृहस्पति में विभिन्न प्रकार के रंग नजर आते है|

# बृहस्पति की सतह ठोस न होकर गैसीय होती है एवं गहराई बढने के साथ इस गैसों का घनत्व भी बढ़ता जाता है इसलिए इसे गैस का दानव ग्रह भी कहा जाता है|

बृहस्पति अपनी धुरी पर तेजी से चक्कर लगाता है जिसके कारण इसका एक दिन अन्य ग्रहों की अपेक्षा काफी छोटा होता है एवं यह केवल 9 घन्टे 55 मिनट या 10 घन्टे का ही होता है एवं तीव्र गति से घुमने के कारण इसका आकार दूर से चपटा नजर आता है|

# यह 90% हाइड्रोजन, 10% हिलीयम, थोड़ी बहुत अमोनिया, मिथेन, एवं पानी व् कठोर चट्टानी कणों के संयोजन से मिलकर निर्मित हुआ है|

# यदि आप बृहस्पति ग्रह की तस्वीर देखेंगे तो इसमें लाल रंग की आँख के जैसी आकृति नजर आएगी जिसे बृहस्पति की लाल आँख भी कहा जाता है| इस ग्रह पर तकरीबन 350 वर्षों से तूफ़ान उठ रहे है जो कि इतने विशाल है, कि उसमे हमारी पृथ्वी के जैसी 3 या 4 ग्रह समा सकते है| बृहस्पति की लाल आँख के उभरने का कारण भी लाल बादलों का अधिक समय तक उसी अवस्था में बने रहना बताया गया है किन्तु यह अभी तक पता नहीं लग पाया कि ये लाल बदल इतने समय तक उच्च दबाव वाले स्थान में जैसे के तैसे कैसे बने हुए है|

# बृहस्पति पर जब सूरज की पराबैंगनी किरने पडती है तो इसके बादलों का रंग भी बदलता रहता है|

# बृहस्पति पर 360 कि.मी. प्रति घंटा की तेजी से तूफानी हवाए चलना आम बात है| इसपर दिखने वाले बदल अमोनिया हाइड्रो सल्फाइड एवं अमोनिया क्रिस्टल से बने होते है जिनका प्राक्रतिक रंग भूरा एवं नारंगी होता है|

# सर्वप्रथम गैलीलिओ ने सन 1610 ई. में बृहस्पति ग्रह को अपनी दूरबीन से देखा था एवं उन्होंने ही इसके उपग्रहों की खोज की थी, जिनके नाम है: आयो, गैनिमिड, युरोपा, और कैलिस्टो| इन उपग्रहों को “ गैलीलियन उपग्रह” के नाम से भी जाना जाता है|

# बृहस्पति का गैनिमिड उपग्रह बुध ग्रह से काफी बड़ा है जिसे अब तक का सबसे बड़ा उपग्रह माना गया है| युरोपा पर एक विशाल समुंद्र हो सकता है ऐसा वैज्ञानिको का मानना है इसी कारण इस उपग्रह को विशेष दर्जा प्राप्त है|

# बृहस्पति ग्रह अपने गुरुत्वाकर्षण द्वारा कई बड़े पथरों को पृथ्वी तक आने से पहले अपने में समा लेता है इसलिए इसे पृथ्वी का vacume cleaner भी कहा जाता है| यदि बृहस्पति ग्रह न हो तो पृथ्वी का विनाश होने में समय नहीं लगेगा| इसका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 2.4 गुना अधिक है आसान शब्दों में कहे तो यदि धरती पर आपका भर 40 kg है तो Jupiter पर यही भार 94 किलो होगा|

# गैलिलियो ने अपनी खोज में यह सत्य उजागर किया कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है| साथ ही बृहस्पति के उपग्रह उसका चक्कर लगाते है एवं अन्य ग्रह केवल पृथ्वी की परिक्रमा नहीं करते| उनके इस तथ्य का जोरदार विरोध किया गया जिसके चलते गैलिलियो ने सजा मिलने के डर से अपना बयान वापस लिया एवं माफ़ी मांगी|

# सबसे पहले पायोनियर को बृहस्पति पर डाटा इकठा करने के लिए 1973 में भेजा गया था| अब तक कुल 8 यान बृहस्पति पर भेजे जा चुके है जिसमे से गैलिलियो यान बृहस्पति पर 8 सालो तक रहा एवं उसने काफी महत्वपूर्ण जानकारी एकत्रित की|

# हिन्दू धर्म में बृहस्पति को देवताओं का गुरु माना गया है एवं रोमन काल में भी बृहस्पति को रक्षा करने वाला माना जाता था|

# बृहस्पति ग्रह का यदि पता हो तो आप इसे बिना किसी यंत्र की सहायता के भी देख सकते है| यदि बृहस्पति को एक तारा बनना हो तो इसे 65% तक और विशाल बनना होगा| 

आकाशगंगा क्या है Milky Way in Hindi

आकाशगंगा लाखों तारों का एक समूह होती है, जो गुरुत्वाकर्षण की शक्ति से एक-दूसरे के करीब होते हैं। इनका आकार अण्डाकार हो सकता है तथा कुछ आकाशगंगा अनियमित आकार में भी हो सकती हैं। 

हम पृथ्वी पर रहते हैं, जो कि एक ग्रह है। हमारे सौरमण्डल में पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य ग्रह भी मौजूद है। एक सौरमण्डल में कई ग्रह व अनगिनत तारे उपस्थित रहते हैं तथा यह विभिन्न गैसों व पदार्थों से युक्त रहता है। ऐसे ही कई सौरमण्डल मिलकर एक आकाशगंगा का निर्माण करते हैं। 

साधारण शब्दों में असंख्य तारों व ग्रहों तथा अन्य तत्वों व पदार्थों वाले कई सौरमण्डलों के मेल को आकाशगंगा कहते हैं। 

आकाशगंगा में भिन्नता की तरह इनके आकार में भी भिन्नता पाई जाती है। 

कई आकाशगंगायें अण्डे के आकार के समान होती है तथा इनके बाहरी ओर से भुजाओं की तरह एक आकृति निकलती हुई दिखाई पड़ती है। इसीलिए ऐसी आकाशगंगा को सर्पीली अण्डाकार आकाशगंगा भी कहते हैं।

कई आकाशगंगायें बड़े गोल आकार या वृत्त के आकार की होती है, जिन्हें दीर्घवृत्ताकार आकाशगंगा कहा जाता है। 

सबसे विशाल आकाशगंगा एबैल 2029 गैलेक्सी है। इसकी खोज 1990 में हुई थी। इसका व्यास 5.5 मिलियन प्रकाश वर्ष है, जो हमारी आकाशगंगा से लगभग 80 गुना बड़ा है। इस आकाशगंगा की रोशनी सूर्य से खरबों गुणा अधिक तीव्र है। यह समस्त ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी आकाशगंगा है। पृथ्वी से यह 107 करोड़ प्रकाश वर्ष की दूरी पर है।

पृथ्वी के सर्वाधिक नज़दीक मौजूद आकाशगंगा का नाम है- धनुबौनी। यह पृथ्वी से 70 हज़ार प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। इसकी खोज को अधिक समय नही हुआ है। सन् 1994 में इस आकाशगंगा के अस्तित्व का पता लगाया गया था।

सबसे दूरस्थ दिखने वाली एंड्रोमेडा आकाशगंगा पृथ्वी से 23लाख 9हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। इसे दूरस्थ दिखने वाली इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसे सरल तरीके से नंगी आँखों से देखा जा सकता है। इसमें लगभग 300 खरब तारों का समूह है। इसका कुल व्यास 1 लाख 80 हजार प्रकाश वर्ष है।

सबसे चमकदार आकाशगंगा मैगेलेनिक क्लाउड को केवल दक्षिणी गोलार्द्ध से ही देखा जा सकता है। इसका व्यास 9 हज़ार प्रकाशवर्ष है। यह पृथ्वी से 1 लाख 70 हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। यह अन्य सभी आकाशगंगाओं की तुलना में सबसे अधिक चमकती हुई दिखाई पड़ती है।

सबसे प्रसिद्ध आकाशगंगा “मिल्की वे” है। इसका व्यास 1 लाख प्रकाश वर्ष है। यह हमारी आकाशगंगा है अर्थात् इसी आकाशगंगा में हमारी पृथ्वी विद्यमान है। इस आकाशगंगा को शुद्ध हिंदी में “मन्दाकिनी” भी कहा जाता है। मन्दाकिनी अर्थात् गंगा की तरह हमारी आकाशगंगा को पवित्र माना गया है।

इसके अलावा इसे “क्षीरसागर” भी कहा जाता है।

हमारी आकाशगंगा का मिल्की वे व क्षीरसागर नाम रखने का एक मुख्य कारण है, जिसके बारे में आपको जानकारी देना आवश्यक है।

चूँकि अंग्रेजी ने मिल्क का अर्थ होता है- दूध और हिंदी में क्षीर का अर्थ होता है- दूध।

असल में जब इस आकाशगंगा को अंतरिक्षयान की सहायता से दूर से देखा जाता है तो यह दूध की तरह श्वेत (सफेद) रंगत की दिखाई पड़ती है। इसी वजह से इसका नाम मिल्की वे रखा गया। हमारी आकाशगंगा अण्डाकार है, जिसकी भुजाएं भी मौजूद हैं।

यह आवश्यक नही कि प्रत्येक आकाशगंगा किसी न किसी निश्चित आकार में ही हो। कुछ आकाशगंगायें अनियमित रूप से अनिश्चित आकार की होती हैं। 

ब्रह्माण्ड में पाई जाने वाली आकाशगंगायें अनन्त हैं। अब तक बहुत सारी आकाशगंगायें खोजी जा चुकी हैं। इनका विस्तार क्षेत्र अथाह है। हम अनुमान भी नही लगा सकते कि ब्रह्माण्ड में कितने तरह के ग्रह मौजूद है। इनका जहाँ तक विस्तार है, वहाँ तक शायद हम कभी भी नहीं पहुँच सकते।

ध्यान देने योग्य बात है कि यदि इतनी आकाशगंगायें अस्तित्व में हैं तो हो सकता है कि पृथ्वी के तरह कोई ओर भी ग्रह हो जहाँ जीवन सम्भव हो या शायद मनुष्यों की भाँति ही कोई प्राणी या जीव मौजूद हो। अगर इस बारे में विचार करें तो बहुत सी बातें दिमाग में आती है तथा विभिन्न सम्भावनाएं पैदा होती हैं और तरह-तरह के प्रश्न उठते हैं। 

हालांकि आज तकनीकी व वैज्ञानिक तौर पर इतनी अधिक प्रगति हो चुकी है कि साधारण मनुष्य के ज्ञान से परे नए-नए तथ्य व ज्ञान की प्राप्ति हुई है। ब्रह्माण्ड के बारे में इतनी गहरी बातों से अवगत होने से मनुष्य का ज्ञानवर्द्धन हुआ है|

ब्रह्माण्ड में मौजूद कणों का इतिहास

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ब्रह्माण्ड किन चीजों से बना है

मानव के धरती पर कदम रखने के बाद से मानव की मुख्य सोच यही रही है कि सारा ब्रह्माण्ड किससे निर्मित हुआ है। आरम्भ में यह धारणा थी कि ब्रह्माण्ड में स्थित सभी सजीव व निर्जीव पंच तत्वों से आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि व जल से मिलकर बने हैं। परन्तु बाद में रसायन शास्त्रियों ने तत्वों से अस्तित्व को सिद्ध किया और आज इन तत्वों की संख्या 110 तक पहुंच चुकी है। लगभग 600 ईसा पूर्व एक भारतीय मनीषी एवं दार्शनिक कणाद ने बताया कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अति सूक्ष्म कणों से मिलकर बना है।

सन् 1808 में प्रसिद्ध रसायन शास्त्री “जॉन डॉल्टन” ने वैज्ञानिक ढंग से परमाणु सम्बन्धी सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने रासायनिक क्रियाओं के आधार पर बताया कि तत्व एक विशेष अनुपात में क्रिया करते हैं तथा इसके आधार पर डॉल्टन ने बताया कि सभी तत्व परमाणु कहलाने वाले सूक्ष्म कणों से मिलकर बने हैं, जिन्हें विभाजित करना असम्भव है। 

सन् 1897 में वैज्ञानिक “जे.जे.थॉमसन“ने निर्वात नली में कैथोड किरणों का उत्पादन करके इनके आवेश एवं द्रव्यमान का अनुपात का मान ज्ञात किया। उन्होंने देखा कि कैथोड किरणें ऋणावेषित हैं, जिन्हें इलेक्ट्रॉन का नाम दिया। अतः थॉमसन के प्रयोग से परमाणु में ऋणावेश की उपस्थिति का पता लगा। 

“मिलिकन” ने अपने प्रयोग से इलेक्ट्रॉन पर आवेश ज्ञात किया। 

सन् 1911 में “लॉर्ड रदरफोर्ड” का स्वर्ण परमाणु पर अल्फ़ा कण प्रकीर्णन के प्रयोग में यह पता लगा कि परमाणु में धनावेश भी उपस्थित है। यह परमाणु के मध्य भाग में स्थित है तथा परमाणु से लाख गुणा छोटा है तथा उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाता है।नाभिक में स्थित इन धनावेश कण को प्रोटॉन नाम दिया गया। 

सन् 1932 में विज्ञान विशेषज्ञ “जेम्स चैडविक“ने एक ओर नाभिकीय कण की खोज की, जिसका द्रव्यमान प्रोटॉन के बराबर था तथा इनपर कोई आवेश नही पाया जाता। इनका नाम न्यूट्रॉन रखा गया। लम्बे समय तक न्यूट्रॉन, प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन को नाभिक के मूल कण माना गया।

समय व्यतीत होने के साथ भौतिकविदों ने अन्य नाभिकीय कणों की खोज की, जिनमें हैं- न्यूट्रिन,फोटॉन, म्यूऑन, मेसॉन, एंटी-न्यूट्रॉनआदि। 

सन् 1932 में “सी.डी. एंडरसन” ने इलेक्ट्रॉन के एन्टी कण पोजिट्रॉन की खोज की। अब यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि सभी कणों के एंटी कणों का अस्तित्व भी है।

इतने सारे कणों की खोज होने के कारण इनको अलग-अलग समूहों में विभाजित किया। शुरू में सभी कणों को मोटे तौर पर दो समूहों में बांटा। एक समूह को “लेप्टोन” तथा दूसरे समूह को “हैड्रॉन” नाम दिया गया।

हल्के कण जैसे  इलेक्ट्रॉन, म्यूऑन व न्यूट्रिन को लेप्टोन परिवार में रखा गया और भारी कण जैसे प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, व मेसॉन को हैड्रॉन परिवार में शामिल किया गया। सामूहिक रूप से इन्हें क्रमशः बेरीयोन व मेसॉन कहा गया।

बेरीयोन को आगे दो भागों में बांटा, जिनका नाम”न्यूमलियोन” व “हाइप्रोन्स” रखा। न्यूमलियोन में प्रोटॉन, न्यूट्रॉन व इनके एंटी कणों को रखा गया, जबकि हाइप्रोन्स में लैम्डा कण, सिग्मा कण व काई कण को रखा गया।

सन् 1964 में गैलमैन, ज़ीमान व जॉर्ज ज़्वेईग ने क्वार्क मॉडल को प्रस्तुत किया। इस मॉडल के अनुसार सभी हैड्रॉन का निर्माण क्वार्क कणों से मिलकर हुआ होता है। इन कणों पर अन्य मूलकणों की तरह पूर्ण आवेश नही होता है। इन पर इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन का आवेश +2/3 या -1/3 गुणा होता है। गैलमैन को इस क्वार्क मॉडल के लिए 1969 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला।

गैलमैन के मॉडल में तीन क्वार्क ही प्रस्तावित थे। इनको अप, डाउन व स्ट्रेन्ज नाम दिया गया। बेरियोन नामक कणों की रचना तीन क्वार्कों से होती है तथा मेसॉन नामक कण की रचना एक क्वार्क व एक एंटी क्वार्क से होती है। प्रोटॉन में दो अप व एक डाउन क्वार्क पाये जाते है। न्यूट्रॉन में एक अप व दो डाउन क्वार्क पाये जाते हैं। अप क्वार्क पर +2/3e का आवेश होता है तथा डाउन क्वार्क पर -1/3e का आवेश होता है।

बाद में इसी क्रम में चौथे व पाँचवे क्वार्क की खोज हुई, जिनका नाम चार्म क्वार्क व बॉटम क्वार्क रखा गया। 

इसी क्रम में क्वार्क परिवार के छठे सदस्य की खोज अमेरिका स्मिथ फर्मी नेशनल एक्सीलेटर लेबोरेट्री में कार्यरत वैज्ञानिकों के दाल ने 2 मॉर्च 1995 में की, जिसका नाम टॉप क्वार्क” रखा गया।

क्वार्कों के अंतिम व अविभाज्य कण से अभी तक कई वैज्ञानिक पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नही है। अब इन क्वार्कों से आगे चलकर प्रोटोक्वार्कों के अस्तित्व के बारे में परिकल्पना करने में लगे हैं। प्रोटोक्वार्क ही  आगे की खोज का आधारभूत प्रश्न है|

इसका मतलब क्या है,  जब वे कहते हैं कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है?

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यह सम्पूर्ण सृष्टि जिज्ञासाओं से भरी हुई है, मानव मस्तिष्क आदि काल से क्यों, कहाँ, कब जैसे सवालों का पीछा करता आया है। मगर वो जितना इसे जानने के करीब आता है, यह सवाल और विस्तार रूप ले कर उलझने बढ़ा देते हैं। यही वजह है कि सृष्टि ब्रह्माण्ड के बारे में इतना कुछ जानने के बाद भी, अभी भी ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिन्हें जानना बाकी है। इन्हीं में से एक है, क्या ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है? यदि हाँ तो कैसे ? कब ? और कहाँ ? आइये इन सवालों को जानने की कोशिश करते हैं।

यह जानने से पहले कि विस्तार कहाँ हो रहा है, यह जानना बहुत जरुरी है कि इस विस्तार का आकार क्या है। अगर आप यह सोच रहे हैं कि इस विस्तार में ब्रह्मांड की सारी आकाशगंगा एक दिशा में तेजी से बढ़ रही है और एक दिन वो सब आपस में मिल जाएंगी तो यह भी पुर्णतः सही नहीं है। क्योंकि समय के साथ इनकी गति और दिशा बदलती रहती है। और स्पष्ट रूप से जानने के लिए ब्रह्मांड के विस्तार को तीन आकारों में बांटा गया है।

१. बंद ब्रह्माण्ड – इस विस्तार में गोल आकार का निरंतर विकास होता रहता है।

२. खुला ब्रह्माण्ड – गोल ब्रह्माण्ड के खुल जाने के बाद विस्तार इस तरह का आकर लेता है।

३. सपाट ब्रह्माण्ड – इस विस्तार में ब्रह्माण्ड एक दम सपाट हो जाता है।

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्रह्मांड गोल होने के बाद भी उसका सपाट आकार में विस्तार होता है। और यही वजह है कि इसमें समय के साथ-साथ विस्तार गति में भी कमी आती जाती है। इसे इस उदाहर द्वारा भी समझा जा सकता है कि हम एक काले रंग का गुब्बारा लेते हैं जिसमें सफेद रंग के धब्बे बने हुए हैं। इस गुब्बारे को हमने अपना ब्रह्मांड मान लिया और इन सफेद धब्बों को आकाशगंगा। अब जैसे-जैसे गुब्बारे में हवा भरी जाती है यह सेफ धब्बे एक दुसरे से दूर होते जाते हैं। और कुछ ही देर बाद एक ऐसी स्थिति आती है जिसमें गुब्बारे को और अधिक फुला पाना संभव नहीं हो पाता। और यदि उसके बाद भी उसे फुलाया जाए तो वो फूट जाता है।

अगर बात हमारे ब्रह्माण्ड की करें तो उसके साथ भी लगभग यही होता है। जब ब्रह्माण्ड का विस्तार होता है, आकाशगंगा की दुरी एक दुसरे से बढ़ती जाती है। मगर इस दुरी के बढ़ने की गति धीमी होती है, इसकी वजह अलग-अलग आकाशगंगाओं का गुरुत्वाकर्षण है।