10 तथ्य जो सिद्ध करते हैं, कि पृथ्वी समतल नही है | Earth round in Hindi

प्राचीन समय से ही पृथ्वी के आकार को लेकर भिन्न-भिन्न राय प्रस्तुत की जाती रहीं तथा बहुत से मतभेद भी होते रहे थे। कुछ का मानना था कि पृथ्वी गोल है और कुछ कहते थे कि पृथ्वी समतल है। किन्तु बहुत बाद में यह सत्य सामने आया कि पृथ्वी समतल नहीं, बल्कि गोलाकार है|

प्रस्तुत लेख में कुछ तथ्य बताये गए हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी समतल नही है। ये तथ्य निम्न प्रकार हैं-

पहला तथ्य:

जब समुद्र में कोई जहाज चलता है तो आगे बढ़ते हुए वह जैसे-जैसे दूर जाता है वैसे-वैसे हम देख सकते हैं कि एक समय पर वह हमारे सामने से गायब हो जाता है व धीरे- धीरे निचला हिस्सा गायब होते होते पूरी तरह से दिखाई देना बन्द हो जाता है। इससे यह समझा जा सकता है कि यदि पृथ्वी समतल होती तो वह दिखाई पड़ना बन्द न होता, केवल दूर जाते हुए आकार में छोटा होता जाता। मगर पृथ्वी के गोल होने के कारण ही जहाज क्षितिज पर डूबता हुआ सा प्रतीत होता है। 

दूसरा तथ्य:

चन्द्रग्रहण के समय जब पृथ्वी; सूर्य व चन्द्रमा के बीच होती है तो सूर्य की रोशनी से पृथ्वी की छाया बनती है तथा वह छाया चन्द्रमा पर पड़ती है। इससे चन्द्रमा की चाँदनी छुप जाती है तथा यह छाया पूर्ण या आंशिक रूप से चन्द्रमा को ढँक देती है। यह क्षणिक प्रकिया है, जो कुछ ही समय में खत्म हो जाती है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि चन्द्रमा पर पड़ने वाली छाया का आकार गोल वक्रनुमा होता है अर्थात् स्पष्ट रूप से ऐसा लगता है जैसे किसी गोल वस्तु की छाया पड़ रही हो। अतः यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी का आकार गोल है। इसमें यह तथ्य इस बात की पुष्टि करता है कि पृथ्वी समतल नही है।

तीसरा तथ्य:

‘अपोलो अभियान’ के तहत कुछ लोगों को अन्तरिक्ष यात्रा पर भेजा गया था। उनके द्वारा अन्तरिक्ष यात्रा के दौरान चन्द्रमा से कई तस्वीरें खींची गयी थी। इन तस्वीरों में पृथ्वी की भी कुछ चित्र मौजूद थे। इनसे स्पष्ट रूप से यह साबित हो रहा था कि पृथ्वी गोल है, समतल नही हैं। उस समय में बहुत से लोगों की यह अवधारणा थी कि पृथ्वी समतल है। अतः”फ़्लैट अर्थ सोसायटी” के सचिव को ये तस्वीरें भेजकर पृथ्वी के समतल न होने का सबूत दिया गया था।

चौथा तथ्य:

प्राचीन समय में यूनानी लोगों द्वारा पृथ्वी के गोल होने के सम्बन्ध में कुछ चर्चा की गयी। जिसमे उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर यह बताया कि रात के अँधेरे में उत्तर दिशा में चमकने वाले ध्रुव तारे को देखते हुए उसी दिशा में आगे बढ़ने पर तारा ऊपर उठता हुआ प्रतीत होता है और इसके विपरीत भूमध्य सागर की दिशा में आगे बढ़ने पर तारा क्षितिज पर डूबता हुआ प्रतीत होता है। यदि पृथ्वी समतल होती तो ध्रुव तारा उत्तर दिशा में ऊपर की ओर दिखाई न पड़ता। इससे उन्होंने यह स्वीकार किया कि पृथ्वी गोल है, समतल नही है।

पांचवा तथ्य:

सन् 1519 में “विक्टोरिया” नाम के एक जहाज ने पृथ्वी का पूरा चक्कर लगाने के उद्देश्य से यात्रा की थी। यह यात्रा अटलांटिक महासागर से “सेविल” बन्दरगाह से आंरभ हुई थी तथा पृथ्वी का एक पूरा चक्कर लगाते हुए  जहाज वापिस उसी बन्दरगाह पर पहुँच गया था। इससे यह सिद्ध हुआ कि पृथ्वी गोल है, इसीलिए जहाज घूमकर उसी जगह वापिस आ गया। यदि समतल होती तो ऐसा होना सम्भव नही था।

छठा तथ्य:

यह बात तो सर्वविदित है कि पृथ्वी के चारों ओर समान दबाव होता है। इसी समदाब के कारण पृथ्वी का आकार गोल है या इसे यूं भी कह सकते हैं कि केवल गोल वस्तु के चारों ओर समान दबाव होता है। उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि जब पानी को ऊपर की ओर उछाला जाता है तो गुरुत्वाकर्षण के कारण वह नीचे आते वक्त उसमें चारों तरफ से समान दबाव पड़ता है, जिससे वह गोल बूंदों का रूप ले लेता है। अतः स्पष्ट होता है कि समान दबाव के कारण ही पानी की बूंदें गोल होती है तथा पृथ्वी भी गोल है।

सांतवा तथ्य:

आर्यभट्ट ने यह खोज की थी कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती रहती है तथा यह गोलाकार है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण ही दिन व रात की क्रिया घटित होती है।

आर्यभट्ट के द्वारा कर्क व मकर रेखा का अस्तित्व भी उजागर किया गया। पृथ्वी के आकार के सम्बन्ध में बहुत से तथ्य व अवधारणाएं पेश की गयी, जिनसे यह सिद्ध हुआ कि पृथ्वी समतल नही है।

आठवां तथ्य:

भास्कर आचार्य द्वारा पृथ्वी के समतल न होने के सम्बन्ध में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि”यदि पृथ्वी समतल है तो ताड़ की तरह बड़े व ऊँचे वृक्ष दूर से दिखाई क्यों नहीं देते।” अतः यह स्पष्ट है कि पृथ्वी का आकार गोल है, जिससे ऊँचे पेड़ व इमारतें दूर से दिखाई नही देती।

नौवां तथ्य:

किसी ऊँचे सपाट स्थान जिसके आगे मार्ग में इमारत या पेड़ जैसी कोई बाधा न हो और बहुत दूर तक देखा जाना सम्भव हो, वहाँ पर धरती पर खड़े रहकर क्षितिज को देखते हैं और उसी स्थान पर किसी घर या इमारत की छत या पेड़ या किसी भी स्त्रोत से ऊँचाई पर जाकर क्षितिज को देखने पर वह पहले से अधिक दूर दिखाई पड़ता है। यदि समतल होती तो बढ़ती ऊँचाई के साथ क्षितिज की सीमा नही बढ़ती। अतः इससे सिद्ध होता है कि पृथ्वी समतल नही है।

दसवां तथ्य:

एक ही समय पर जमीन पर रखी एक जैसी ऊँचाई वाली वस्तुओं की छाया एक समान नही होती है। अलग-अलग स्थानों पर समान ऊँचाई वाली वस्तुओं की परछाई एक ही समय में अलग-अलग होती है। इसका कारण यही है कि पृथ्वी गोल है। यदि पृथ्वी समतल होती तो सभी स्थानों पर एक जैसी ऊँचाई वाली वस्तुएं समान छाया बनाती। अतः स्पष्ट है कि पृथ्वी समतल नही है|

उम्मीद करते है, कि आपको यह रोचक जानकारी पसंद आई होगी, इससे सम्बन्धित यदि कोई भी प्रश्न हो, तो आप जरुर पूछे एवं हम जल्दी से जल्दी जवाब देने की पूरी कोशिश करेंगे एवं यदि आपके पास कोई और तथ्य हो तो हमसे शेयर करे|

कार्बोहाइड्रेट के फायदे व् नुकसान | Carbohydrates food in Hindi

क्या है कार्बोहाइड्रेट?

कार्बोहाइड्रेट् शरीर के लिए एक आवश्यक तत्व है, जिससे हमारे शरीर को ऊर्जा मिलती है एवं यह हमे रोजमर्रा के भोजन से प्राप्त हो जाता है|

चावल, गेहूं, बीन्स, आलू, एवं अन्य चीजों में भी इसकी प्रचुर मात्रा पाई जाती है| शारीरिक विकास के लिए भी कार्बोहाइड्रेट का महत्वपूर्ण योगदान रहता है, किन्तु इसकी अधिक मात्रा से शरीर को नुकसान भी हो सकता है|

एक स्वस्थ व्यक्ति को एक दिन में 225 से 335 ग्राम तक कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता होती है, जिससे शरीर को सुचारू रूप से कार्य करने के लिए ऊर्जा मिल जाती है, किन्तु इससे अधिक मात्रा लेने पर कई बार वजन बढ़ने की सम्भावना रहती है, इसलिए जो लोग फिट रहना पसंद करते है, उन्हें अपने भोजन में से कार्बोहाइड्रेट की मात्रा को घटाने के लिए कहा जाता है|

कार्बोहाइड्रेट के प्रकार:

कार्बोहाइड्रेट के कई प्रकार होते है, जिसमे से कुछ स्वास्थ्य के लिए अच्छे एवं कुछ नुकसानदायक होते है, जो इस प्रकार है:-

चीनी:

चीनी या शुगर अनेक उत्पादों में प्राक्रतिक रूप से विद्यमान होती है, जैसे दूध, सब्जिया, लगभग सभी प्रकार के फल आदि| इन पदार्थों में शुगर तीन प्रकार से मौजूद रहती है, लेक्टोज, फ्रुक्टोज, एवं सुक्रोज| शुगर हमारे शरीर को शक्ति प्रदान करता है एवं यह शरीर के लिए अनिवार्य भी है|

स्टार्च:

इसको भी शुगर का ही एक प्रकार माना जाता है, जो की आलू, फलियाँ, मटर, चावल आदि में पाया जाता है तथा मोटापे के लिए सबसे ज्यादा इसे ही जिम्मेवार माना जाता है|

फाइबर:

यह भी मुख्य रूप से शुगर का हिस्सा है, यह सोया, सेम, फाइबर युक्त सब्जियां, एवं फलो व् साबुत अनाज में पाया जाता है| फाइबर युक्त भोजन आसानी से पच जाता है एवं इससे पाचन प्रणाली भी ठीक रहती है एवं पेट सम्बन्धी समस्याए नहीं होती|

कार्बोहाइड्रेट के लाभ:

जैसा की पहले भी कहा जा गया है, की कार्बोहाइड्रेट शरीर को उर्जावान बनाये रखने के लिए आवश्यक है, इससे शरीर रोजमर्रा के कार्य करने में समर्थ रहता है एवं थकावट महसूस नहीं होती| हालांकि अधिक सेवन से मोटापा आ सकता है, किन्तु यदि इसके बिलकुल भी न लिया जाये तो शरीर में कमजोरी आना स्वाभाविक है|

यह पाचन शक्ति को भी मजबूत करता है, एवं भोजन आसानी से पच जाता है| इससे आप चुस्त महसूस करते है एवं विभिन्न प्रकार के रोगों से रक्षा करता है| यदि पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेट का सेवन किया जाये तो इसके नुकसान से बचा जा सकता है|

कार्बोहाइड्रेट के नुकसान:

प्रकृति में उपस्थित कोई भी उत्पाद का यदि जरूरत से ज्यादा प्रयोग किया जाए तो उसके लाभ से ज्यादा नुकसान ही होते है| आजकल के व्यस्त समय में उचित खानपान की कमी के चलते शरीर में कार्बोहाइड्रेट के बढने से विभिन्न प्रकार के रोग जन्म ले लेते है, जैसे मोटापा, दिल से सम्बन्धित रोग, यहाँ तक की दिमाग पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है, जैसे स्मरण शक्ति का कमजोर होना, आलसी बनना आदि|

चूँकि कार्बोहाइड्रेटयुक्त भोजन में अत्यधिक मात्रा में कैलोरीज होती है, एवं आज के युग में जंक फ़ूड का चलन जोर-शोर से प्रचलित है, जैसे बर्गर, पिज़्ज़ा, पास्ता आदि में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा जरूरत से ज्यादा होती है, जो शरीर को नुकसान पहुचाती है|

कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन खाने में स्वादिष्ट लगता है, किन्तु इससे डायबिटीज होने का भी खतरा रहता है क्योकि मनुष्य शरीर इतनी कैलोरीज पचाने में असमर्थ होता है|

कार्बोहाइड्रेट की मात्रा:

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है, कि कैसे तय करे की कार्बोहाइड्रेट की कितनी मात्रा का सेवन सही रहेगा? क्योकि इसे लेना भी आवश्यक है, एवं पूर्णत: छोड़ा भी नहीं जा सकता|

अलग-अलग व्यक्तियों की कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अलग-अलग होती है, जो व्यक्ति शारीरिक रूप से अधिक मेहनत करते है उनमे इसकी मात्रा अधिक होनी चाहिए, क्योकि इसका प्राथमिक कार्य शरीर को शक्ति देना है|

जैसे यदि आपको एक दिन में 2000 कैलोरीज की आवश्यकता है तो 40 से 50 प्रतिशत कैलोरीज कार्बोहाइड्रेट द्वारा पूरी की जाएगी| कार्बोहाइड्रेट के 1 ग्राम में 4 तक कैलोरीज होती है अत: एक स्वस्थ व्यक्ति को 225 से 335 ग्राम तक का रोज का सेवन अनिवार्य है, इसमें कभी-कभी कमी या बढ़ोतरी की जा सकती है परन्तु ज्यादा मात्रा में नहीं|

कार्बोहाइड्रेट के मुख्य स्त्रोत:

यदि आप में कार्बोहाइड्रेट की कमी है तो इससे कुपोषण होने का खतरा पैदा हो सकता है, अत: बाहर के हानिकारक पदार्थो के अलावा इसे प्राक्रतिक रूप से हासिल करे|

फाइबरयुक्त फल जैसे बेर, तरबूज, अंगूर, संतरा, नाशपति, बेरीज, खजूर आदि में प्रचुर फाइबर पाया जाता है एवं इससे स्वास्थ्य को भी कोई हानि नहीं होती, इनका इस्तेमाल कार्बोहाइड्रेट की कमी को पूरा करने के साथ-साथ शरीर में मिनरल्स एवं विटामिन्स की कमी को भी पूरा करता है|

शुद्ध किये हुए अनाज से बेहतर है की आप साबत अनाज का प्रयोग करे जैसे बाजार में मिलने वाला आटा काफी बारीक़ होता है जिसमे फाइबर की मात्रा ना के बराबर होती है अत: चोकोरयुक्त आटे का सेवन करे| इसके साथ ही रिफाइंड दालें एवं अन्य उत्पाद भी साबत प्रयोग करे|       

इसके अलावा फलियाँ, मटर, सेम आदि में फाइबर पाया जाता है, एवं इसमें कोलेस्ट्रोल एवं वसा भी नहीं होती न ही नुकसानदायक कार्बोहाइड्रेट होता है, इसे भी आप जब चाहे खा सकते है, एवं दिल के मरीज भी इसका प्रयोग कर सकते है| इसमें मैग्नीशियम, पोटेशियम, सेलेनियम आदि तत्व पाए जाते है जो शरीर के विकास के लिए आवश्यक है एवं विभिन्न रोगों से लड़ने में सहायता करते है|

डेयरी उत्पाद द्वारा भी कार्बोहाइड्रेट की कमी को पूरा किया जा सकता है, किन्तु यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि डेयरी उत्पाद में नकली शुगर नहीं होनी चाहिए केवल प्राक्रतिक शुगरयुक्त पदार्थ का सेवन किया जाना चाहिए|

अंतत: यह कहा जा सकता है कि कार्बोहाइड्रेट शरीर के विकास एवं पोषण हेतु अनिवार्य है, परन्तु यह भी सच है की इसके कई नुकसानदायक पहलू भी है| जब भी हम भोजन करते है तो पाचन तन्त्र उसे पचाता है एवं फिर उसे शुगर एवं स्टार्च में तोड़ता है, जिसमे इन्सुलिन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है|

फिर यही ग्लूकोज के रूप में शरीर को ऊर्जा देता है, यदि खाने में शुगर अधिक होगी तो बाद में यह फैट या मोटापा बन जाती है|

भारत में क्लोनिंग का क्षेत्र, उपयोग व हानि | Cloning in Hindi

क्या है, क्लोन?

सीधे शब्दों में कहा जाए तो एक क्लोन भी अणु, कोशिका, पादप व जन्तु या मानव की एकदम समान आनुवांशिक प्रतिकृति है। उदाहरण के तौर पर ट्यूमर उत्परिवर्तित कोशिका का क्लोन है। एक कोशिकीय जीव की संतति जैसे कि जीवाणु प्रोटोजोआ व खमीर जो कि अलैंगिक प्रजनन करते हैं,  अपने जनक के क्लोन होते हैं। अधिकतर उच्चवर्गीय जीव जैसे कि स्तनधारियों में समान अथवा समरूप युग्मनज एक दूसरे के क्लोन होते हैं।

भारत में भैंस का क्लोन:

हरियाणा प्रदेश के करनाल जिले के नेशनल डेयरी फ़ार्म इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने 1998 में भैंस का क्लोन तैयार करने में सफलता प्राप्त की। विश्व में पहली बार विकसित भैंस के इस क्लोन की सफलता के बाद मनचाही संख्या में रोगरहित, स्वस्थ और श्रेष्ठ किस्म की भैंस प्राप्त की जा सकी। भारत में क्लोनिंग का प्रयोग मुर्रा प्रजाति की भैंसों पर किया जा रहा है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने परखनली में पहला भैंसा 1992 में ही विकसित कर लिया था, जिसका नाम “प्रथम” रखा गया।

इसी प्रकार डी. एन. ए. या अन्य जैव सामग्री तथा कोशिकाएं प्राप्त करने के लिए सम्बन्धित व्यक्ति की अनुमति लेना जरूरी होगा। अगर इस जैव सामग्री से कोई व्यापारिक लाभ उठाया जाना सम्भव हो सका तो उसमे उस व्यक्ति को भी लाभ में हिस्सा मिलेगा, जिससे जैव सामग्री प्राप्त की गयी थी। 

इस बारे में पेटेंट के लिए आवेदन करने पर यह बताना होगा कि जैव सामग्री कहाँ से ली गयी है। समिति की इन सिफारिशों पर विचार विमर्श करने बाद यदि स्वीकृति मिलती है तभी इन्हें लागू किया जाएगा।

क्लोनिंग से हानि:

क्लोनिंग की प्रक्रिया अत्यंत खर्चीली है। धनवान लोग ही क्लोनिंग से होने वाले फायदों को प्राप्त कर सकेंगे।

क्लोनिंग से बड़े पैमाने पर भ्रूण हत्या होगी। डॉली का क्लोन तैयार करने वाली डॉक्टर इयॉन विल्युर के आँकड़ो के अनुसार 277 केन्द्रकों के संयोग से 27 भ्रूणों को 13 भेड़ों में ट्रांसफर किया गया, लेकिन केवल एक भेड़ ही बच्चे को जन्म दे सकी।

सन्तानोत्पत्ति में नर की भूमिका समाप्त हो जाने का खतरा पैदा हो जाएगा। क्लोनिंग के लिए जिस कोशिका से केन्द्रक लिया जाता है, वह नर या मादा में से किसी का भी हो सकता है, मगर क्लोनिंग के लिए मादा का डिम्ब कोशिका अति आवश्यक है। इससे नर की आवश्यकता है। इससे नर की आवश्यकता पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाएगा।

भारत में मानव क्लोनिंग पर प्रतिबन्ध:

भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन के सलाहकार डॉ. एम. एस. वालियानाथ की अध्यक्षता में एक समिति की स्थापना की थी। इस समिति ने भारत में मानव क्लोनिंग पर पाबन्दी लगाने की सिफारिश की। समिति की सिफारिशों के अनुसार जीव थैरेपी भी तभी की जा सकेगी, जब रोगी की जान बचाने का कोई ओर तरीका न बचा हो। मृत भ्रूण या गर्भपात वाले भ्रूण भी अनुसंधान के लिए तभी इस्तेमाल किये जा सकेंगे, जब माता-पिता से इसकी अनुमति प्राप्त कर ली गयी हो। 

क्लोनिंग के उपयोग:

इस तकनीक को पालतू पशुओं में अपनाकर उन पशुओं की संख्या में काफी वृद्धि की जा सकती है, जो आनुवंशिक रूप से कुछ खतरनाक व घातक बीमारियों जैसे कि बी.एस.आई. (बोवाईन स्पोंजिफार्म ऐंसेफेलाइटिस), गायों में पागलपन की बीमारी व आई.एफ. एम. डी. (खुरपका), मुंहपका रोग के लिए प्रतिरोधी हैं। 

लुप्त प्राणियों व जीवों की नस्लों को बचाने के लिए व उनका अस्तित्व कायम रखने के लिए और उनकी संख्या में निरन्तर बढ़ोतरी करने के लिए क्लोनिंग उपयोगी है।

अनुसंधान के क्षेत्र में भी उपयोग किया जा सकता है। यदि क्लोन किये गए पशुओं का अनुसंधान के लिए प्रयोग किया जाए तो अनुसंधान के आंकड़ों में उचित सांख्यिकीय समरूपता लायी जा सकती है।

मानव की मृत कोशिका के नव निर्माण के लिए भी क्लोनिंग उपयोगी सिद्ध हो सकती है। ऐसा करने से मानव शरीर के स्पेयर पार्ट्स बनाये जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई मानव पार्किन्सन रोग, पेशीय खिंचाव, मधुमेह व हृदय रोग से ग्रस्त हो तो क्रमशः टी-कोशिका, तन्त्र कोशिका व पेशियां प्रभावित होती हैं। ऐसी बीमारियों का इलाज सिर्फ इन प्रभावित कोशिकाओं को स्वस्थ कोशिकाओं से बदलकर ही किया जा सकता है।

निःसन्तान दम्पतियों द्वारा अपनी संतति पैदा करने के लिए पति या पत्नी में से किसी एक का क्लोन बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि किसी दम्पति के एक सदस्य में किसी घातक आनुवांशिक बीमारी के जीन्स मौजूद हों तो दूसरे सदस्य (जो कि आनुवांशिक रूप से स्वस्थ हो) का क्लोन बनाकर ऐसे दम्पतियों को सन्तान सुख उपलब्ध करवाया जा सकता है।

क्यों मनाया जाता है क्रिसमस?

क्रिसमस का इतिहास:

25 दिसम्बर को दुनियाभर में क्रिसमस के रूप में शानदार तरीके से आयोजित किया जाता है। यह ईसाई धर्म का प्रमुख त्यौहार है। पश्चिम के देशों में तो क्रिसमस का चलन बहुत ही ज्यादा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस रौनक भरे त्यौहार को मनाने का कारण क्या है? क्रिसमस का इतिहास क्या है?

कब हुआ था यीशू का जन्म?

चलिए आज क्रिसमस को मनाने का ऐतिहासिक कारणों के बारे में चर्चा करते हैं। ईसाई समाज का मानना है कि इस दिन “ईसा मसीह” यानी “यीशू” का जन्म हुआ था, तो 25 दिसंबर को उनकी जन्मदिवस की ख़ुशी के अवसर में मनाया जाता है।

असल में इतिहास सम्बन्धी कुछ खोजों से निकले तथ्यों से यह बात सामने आई कि 25 दिसम्बर को यीशू का जन्म नही हुआ था, बल्कि अक्टूबर में हुआ था। 25 दिसम्बर को सूर्य का उत्तरायण होता है तथा दिन के बड़े होने की शुरुआत इसी दिन से होती है। अतः गैर-ईसाईधर्मियों द्वारा सूर्य उत्तरायण दिवस के रूप में मनाया जाता था। यीशू के जन्म व मृत्यु के कई सौ सालों बाद; लगभग चौथी शताब्दी में सूर्य उत्तरायण के शुभ दिन को ही यीशू के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है।क्रिसमस को कुछ विशेष जगहों पर “सेंट स्टीफेन्स डे”और “फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेन्स” के नाम से भी मनाया जाता है।

ईसाईधर्मियों की यह मान्यता है कि यीशू ने “मसीहा” के रूप में जन्म लिया था। इसीलिए यीशू को “ईसा मसीह” कहा जाता है।

क्रिसमस के दिन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका के रूप में होते हैं “सांता निकोलस”। इन्हें क्रिसमस के जनक के रूप में भी जाना जाता है।

सांता निकोलस को अन्य कुछ नामों से भी सम्बोधित किया जाता है, जिनमें हैं- सांता क्लोज़, डेड मोरोज़, पेरे नोएल आदि। निकोलस के इतिहास के बारे में बात की जाए तो इनका जन्म यीशू के मृत्यु के लगभग 280 वर्षों बाद “मायरा” नामक स्थान पर हुआ था। अपनी आस्तिक प्रवृत्ति के कारण ये यीशू में पूर्ण श्रद्धा भाव रखते थे तथा उन्हें अपने भगवान के रूप में मानते थे। इनकी कम उम्र में ही माता-पिता का देहांत हो जाने के कारण वे अनाथ हो गए थे। बड़े होकर उन्होंने एक पादरी के रूप में अपना पद ग्रहण किया। यीशू के भक्त होने के साथ उनके दयालु स्वभाव के कारण इनका बच्चों के साथ अत्यन्त लगाव था। बच्चों की ख़ुशी के लिए वे उन्हें उपहार दिया करते थे। उनकी यह खासियत थी कि वे अर्द्धरात्रि में उपहार वितरित करते थे ताकि उनकी पहचान उजागर न हो सके। 

वर्तमान समय में आज भी क्रिसमस वाले दिन सांता के द्वारा उपहार दिए जाने की परम्परा चलन में हैं। क्रिसमस पर कोई भी निजी सदस्य लाल पोशाक पहनकर सांता का रूप लेकर उपहार देते हैं तथा परम्परा को कायम रखा जाता है।

क्रिसमस ट्री की कहानी:

क्रिसमस ट्री (पेड़) के बिना तो यह त्यौहार अधूरा ही रह जाता है। क्रिसमस वाले दिन क्रिसमस ट्री की भूमिका खास है। इस दिन पेड़ को खूब सजाया व रोशन किया जाता है। इसके पीछे की कहानी ये है कि जब ईसा मसीह अर्थात् यीशू का जन्म हुआ था तो उनके जन्म की ख़ुशी में एक सदाबहार फर के पेड़ को बहुत अधिक सजाया गया था तथा बल्ब व लड़ियों से जगमग करते हुए सब रोशन किया गया था। चूँकि क्रिसमस को यीशू के जन्मदिवस के रूप में दुनियाभर में मनाया जाता है तथा इसी के साथ क्रिसमस के मौके पर क्रिसमस ट्री भी सजाया जाता है।

सर्वप्रथम दसवीं शताब्दी में पेड़ सजाने की परम्परा को जर्मनी के एक अंग्रेज जिनका नाम “बोनिफेन्स टूयो” था, द्वारा शुरू किया गया था।क्रिसमस ट्री को पवित्रता व शक्ति का प्रतीक माना जाता है। लोगों की यह मान्यता है कि क्रिसमस ट्री से परलौकिक शक्तियों का दुष्प्रभाव नही पड़ता है तथा भूत-प्रेत सम्बन्धी बाधाएं नही आती है। ईसाई इस बात में विश्वास रखते हैं कि क्रिसमस ट्री सकारात्मक वातावरण बनाये रखता है तथा इससे घर का माहौल भी शांतिपूर्ण बना रहता है।

क्रिसमस वाले दिन कार्ड का आदान प्रदान भी किया जाता है। यह कार्ड आपसी मेलजोल बढ़ाने व ख़ुशी का सन्देश देने का प्रतीक होता है। इसे क्रिसमस कार्ड भी कहते हैं। इसके अलावा क्रिसमस डाक टिकट जारी करना भी प्रचलित विधि है। कई बार कुछ लोग दूर रहने वाले अपने परिजनों को कार्ड भेजते हैं। यदि यह कार्ड डाक द्वारा प्रेषित किया जाए तो इसमें क्रिसमस टिकट का उपयोग किया जाता है। ये सामान्य डाक टिकट की तरह ही होती है तथा वैसे ही उपयोग में ली जाती हैं

क्या विटामिन D की कमी से हो सकता है, बुजुर्गों में तनाव? | Deficiency of vitamin D in Hindi

क्या है, विटामिन D?

विटामिन D शरीर के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है, जो हमे सूर्य के प्रकाश एवं भोजन से प्राप्त होता है|

हाल ही में हुए अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने यह बात साबित की, कि विटामिन D के अभाव में शरीर कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हो जाता है, एवं बढती उम्र के साथ-साथ विटामिन D की कमी के घातक परिणाम हो सकते है|

हाल ही में हुए शोध में पेनकोफर नामक लेखक ने अपनी रिसर्च में इस बात का पता लगाया की, विटामिन D अनेक प्रकार के रोगों जैसे, दिल की बीमारी, तनाव, सोचने समझने की शक्ति, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, जोड़ों में दर्द आदि के लिए जिम्मेवार होता है, एवं यदि यह पर्याप्त मात्रा में आपके शरीर में मौजूद है, तो इन बीमारियों एवं अन्य कई स्वास्थ्य सम्बन्धित समस्याओं से लड़ने में सहायक होता है|

कैसे होती है, विटामिन D की कमी?

भोजन में जरूरी तत्वों की कमी एवं सूर्य के प्रकाश से वंचित रहना विटामिन D की कमी का प्रमुख कारण है| विटामिन D को हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना जाता है, यह शरीर में मौजूद कैल्शियम का अवशोषण करके उसे अन्य भागों तक पहुचाता है एवं शरीर की सभी कोशिकाओं को स्वस्थ रखने का कार्य करता है|

इससे हड्डियों को मजबूती मिलती है, एवं जोड़ो में सूजन या दर्द की सम्भावना भी कम रहती है| यह शीघ्रता से वसा में घुल जाता है एवं सूर्य की रोशनी में बैठने पर शरीर अपने आप इसका निर्माण करता है एवं प्रतिपूर्ति करता है|

विटामिन D की कमी के लक्षण:

यह बात स्मरण रखने योग्य है कि भोजन से केवल दस प्रतिशत तक विटामिन D की कमी की पूर्ति होती है, शेष नब्बे प्रतिशत कमी सूर्य द्वारा होती है, इसलिए यदि आप ऐसा भोजन करते है, जिसमे विटामिन D हो परन्तु सूर्य से वंचित है तो आपके शरीर में विटामिन D की कमी होना स्वाभाविक है, जिसके महत्वपूर्ण लक्ष्ण इए प्रकार है:-

हड्डियों में कमजोरी आना एवं जोड़ो में दर्द रहना

असमय बालों का झड़ना

पाचन क्रिया का कमजोर पड़ना

उदास एवं तनावग्रस्त रहना

बार-बार बीमार पड़ना या संक्रमित होना आदि|

बुजुर्गों में विटामिन D की कमी के कारण:

आधुनिक युग में बुजुर्गों में विटामिन D की कमी के अत्यधिक मामले सामने आये है, जिसमे यह तथ्य उजागर हुआ की, वृद्ध लोगों को सही आहार न मिलने एवं उनकी शारीरिक हालत कई बार ठीक न होने के कारण वे सूर्य के प्रकाश से वंचित रह जाते है, जिससे विटामिन D की काफी कमी हो जाती है|

बुजुर्गों में विटामिन D की कमी अवसाद का रूप धारण कर लेती है, जिससे उनका किसी कम में मन नही लगता एवं तनावपूर्ण स्थिति बन जाती है एवं कई प्रकार के रोग उनके शरीर को घेर लेते है, जैसे थकान अनुभव करना, जोड़ो में दर्द एवं सूजन, उदास रहना, घाव का जल्दी न भरना एवं पाचन सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है|

उपरोक्त लक्षण नजर आने पर जाँच के द्वारा विटामिन D की कमी का पता लगाया जा सकता है एवं उम्र के मुताबिक डाक्टर की सलाह से दवाई का सेवन शुरू किया जाना चाहिए|

विटामिन D की कमी से बचाव के उपाय:

विटामिन D की कमी को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय सूर्य की रोशनी में 20 से 30 मिनट तक बैठना है, यदि गर्मियों का मौसम है तो आप सुबह उगते सूर्य की किरणों में बैठे एवं सर्दियों में आप किसी भी समय सूर्य की रोशनी में बैठ सकते है|

इसके साथ ही विटामिन D से युक्त आहार जैसे दूध, पनीर, मछली, अंडे, मशरूम आदि का सेवन करे| लीवर या किडनी के रोगी विटामिन D की कमी से जल्दी प्रभावित होते है, अत: लीवर को ठीक करने हेतु आवश्यक दवाइयों का सेवन करे|

बुजुर्ग लोगों का विशेष रूप से ध्यान रखा जाये एवं उन्हें रोजाना धूप में थोड़ी देर बिठाया जाए| इसके साथ ही विटामिन D की अत्यधिक कमी खतरनाक साबित हो सकती है, इसलिए विशेषज्ञ की सलाह की सलाह से इससे सम्बंधित सप्लीमेंट्स एवं दवाइयों का सेवन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए|

विटामिन D की अधिक कमी होने से बच्चों को अस्थमा, वयस्कों में कैंसर, बाँझपन, एवं ओस्टियोमलेसिया नामक बीमारी हो सकती है| इसमें पांच वर्ष के बच्चो में विटामिन D की कमी होने के ज्यादा संकेत मिलते है इसलिए उनका खास ख्याल रखा जाना चाहिए|

सिर दर्द क्यों होता है? Why we have headache in Hindi

सिरदर्द होना आम समस्या है, परन्तु इसके होने की वजह आम हो; यह जरूरी नही है। कई बार सामान्य कारणों से सिरदर्द होने लगता है तथा कई बार सिरदर्द कुछ गंभीर रोगों की ओर इशारा करता है। इसके कारणों को तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिनमें हैं- 

आंतरिक कारण

बाह्य कारण

अन्य कारण

आंतरिक कारण-

इसमें शरीर के भीतर होने वाले कुछ विकारों या रोगों की वजह से सिरदर्द होता है। ऐसा सिरदर्द कई बार घातक समस्या की ओर भी संकेत करता है। आंतरिक कारण निम्नलिखित हैं-

मस्तिष्क सम्बंधी समस्या- मस्तिष्क शोथ या मस्तिष्काघात, अवसाद ग्रस्त होने से मस्तिष्क की नसों में खिंचाव व सूजन की समस्या पैदा होती है, जिससे सिरदर्द होने लगता है। यह चिंताजनक है क्योंकि कई बार गंभीर रोग का रूप भी ले सकता है।

गैस- खाली पेट रहने या तले व गरिष्ठ भोजन के सेवन से कई बार पेट में गैस बन जाती है तथा पाचन तन्त्र भी खराब हो जाता है। यह गैस शरीर में गति करती हुई सिर तक पहुँच जाती है तथा सिरदर्द का रूप ले लेती है।

तनाव- कई बार किसी विषय पर लगातार सोचने से चिंताजनक रूप ले लेता है, जिससे तनाव उत्पन्न होता है। तनाव के कारण हमारी नसों में खिंचाव पैदा हो जाता है। इससे सिरदर्द की समस्या खड़ी हो जाती है।

असन्तुलित रक्तप्रवाह- रक्त प्रवाह का सन्तुलन ऊँचा या नीचा होने से भी रुधिर वाहिकाओं में रक्त संचालन कम या ज्यादा होने से सिर में दर्द का अनुभव हो सकता है।

नींद की कमी- नींद की कमी के कारण दिमाग़ी थकावट हो जाती है तथा मस्तिष्क को आराम न मिलने के कारण नसों में दर्द हो सकता है, जिससे सिरदर्द का कारण पैदा होता है। इसके अतिरिक्त नींद पूरी न होने के कारण आँखों में भी थकान हो जाती है तथा आँखों की रोशनी पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। इसके कारण भी सिरदर्द हो सकता है।

बाह्य कारण-

बाहरी रूप से शरीर के किसी हिस्से में कोई परेशानी होने से भी सिरदर्द हो जाता है। ये कारण निम्नलिखित हैं-

कान के रोग- कान की नसों का सम्बन्ध सिर की नसों से होता है तथा कान के साथ ही सिर मौजूद होता है। कान का कोई रोग या कान दर्द होने के कारण आपसी समीप्य से वह दर्द नसों से होता हुआ सिर तक पहुँच जाता है। अतः कान की समस्या के साथ सिरदर्द की भी समस्या होना सामान्य है।

थकावट- कई बार लगातार काम करते रहने व भागदौड़ से शारीरिक थकान हो जाती है। यह थकान कई बार गति करती हुई हमारे सिर की नसों तक पहुँच कर उनमे दर्द पैदा कर देती है। अतः थकावट आना भी कई बार सिरदर्द का कारण बन सकता है।

फोड़ा या फुँसी- मनुष्य शरीर रोगों से घिरने में समय नही लेता। फोड़ा या फुँसी जैसी समस्या होना आम बात है। जब यह कान या सिर या गर्दन के आसपास हो जाते है तो इनमे मवाद के कारण चारों ओर रह रह कर होने वाले दर्द की समस्या खड़ी करते हैं। अतः सिर के आस पास फोड़ा या फुँसी होने पर सिरदर्द हो सकता है।

अन्य कारण-

इसमें वे कारण शामिल किये जाते हैं जो न तो शरीर के आंतरिक भाग से सम्बंधित है और न ही बाह्य भाग से। ऐसे अन्य कारण निम्नलिखित हैं-

चुस्त कपड़े- कई बार फैशन के चक्कर में फसे हुए तंग कपड़े पहनने से पेट पर दबाव पड़ने से नसों में कसाव महसूस होता है। यह दबाव भी कई बार सिरदर्द का कारण बनता है।

कैफ़ीन- कॉफी या चाय का अनावश्यक मात्रा में सेवन करने से कुछ नशा हो जाता है। जिससे सिर में भारीपन महसूस होता है तथा सिर घूमता रहता है। अतः कैफ़ीन की अधिक मात्रा भी सिरदर्द का कारण बनती है।

अधिक ठण्डा पदार्थ- कई बार अधिक ठण्डा पदार्थ का सेवन करने से अचानक से नसों में सिकुड़न हो जाती है। नसों में होने वाली इस हलचल से सिरदर्द की समस्या उत्पन्न हो सकती है।

वातावरण का असर- वातावरण का असर तो शरीर पर पड़ता ही है। मौसम में बदलाव के कारण शरीर में कई क्रियाएँ व प्रतिक्रियाएँ होना सामान्य बात है। शुरूआती सर्दी या गर्मी या वर्षाऋतु में कई बार शरीर में बदलाव के कारण सिरदर्द हो सकता है। अतः बदलता वातावरण भी कई बार सिरदर्द की वजह बन सकता है।

खुशबू- परफ्यूम या सेंट या डीयो आदि की महक से कई बार कुछ लोगो को एलर्जी होती है। अत्यधिक तेज सुगंध कई बार सिर तक पहुँच जाती है तथा सिरदर्द पैदा करती है। अत: ऐसे उत्पादों से दूर रहना बेहतर होता है|

फोन का अत्यधिक इस्तेमाल- फोन पर अधिक देर तक बात करने से या नजरें टिकाये रखने से मस्तिष्क की नसों को आराम नही मिल पाता तथा आँखें भी थक जाती है। इससे भी सिरदर्द की शिकायत हो सकती है।

शोर- शांतिप्रिय लोगों को अत्यधिक शोर सुनने की आदत नही होती है। लेकिन कई बार अधिक तेज आवाज़ उनके कानों व मस्तिष्क पर बजने से दबाव पैदा करती है, जिससे सिरदर्द हो सकता है।

लू लगना- गर्मी की अधिकता के कारण कई बार लू के आघात का सीधा असर सिर पर होता है। अतः अधिक गर्मी में भी कई बार सिरदर्द होने लगता है। अत: अत्यधिक गर्मी में घर से बाहर निकलने से परहेज करे|

उपर्युक्त वर्णित के अलावा रजोवृति या रजोधर्म, गर्भनिरोधक दवाइयों का सेवन, खान-पान में लापरवाही, विटामिन्स की अल्पता, शारीरिक तन्त्र में असन्तुलन, ज़ुकाम, गले के रोग, मिर्गी आदि अनेक प्रकार के कारणों से सिरदर्द हो सकता है। कई बार कुछ ठंडा खाने या पीने से भी सिर में दर्द हो जाता है, इसलिए अचानक कुछ ठंडा न खाए|

कई बार सिरदर्द कम होता है और कई बार अत्यधिक तेज़, जिसे केवल एक बार में सामान्य दवाई लेकर ठीक किया जा सकता है। परन्तु यदि सिरदर्द असहनीय हो जाए और दवाई लेने पर भी ठीक न हो तो ऐसी स्थिति में डॉक्टर से अवश्य सलाह लेनी चाहिए और यदि जरूरी हो तो कारण जानने हेतु आवश्यक जाँच भी करवाई जानी चाहिए, ताकि यह संतुष्टि हो जाए कि कहीं यह सामान्य सा लगने वाला सिरदर्द किसी गम्भीर रोग की ओर संकेत न करता हो|

ब्रह्माण्ड में मौजूद कणों का इतिहास

galaxy

ब्रह्माण्ड किन चीजों से बना है

मानव के धरती पर कदम रखने के बाद से मानव की मुख्य सोच यही रही है कि सारा ब्रह्माण्ड किससे निर्मित हुआ है। आरम्भ में यह धारणा थी कि ब्रह्माण्ड में स्थित सभी सजीव व निर्जीव पंच तत्वों से आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि व जल से मिलकर बने हैं। परन्तु बाद में रसायन शास्त्रियों ने तत्वों से अस्तित्व को सिद्ध किया और आज इन तत्वों की संख्या 110 तक पहुंच चुकी है। लगभग 600 ईसा पूर्व एक भारतीय मनीषी एवं दार्शनिक कणाद ने बताया कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अति सूक्ष्म कणों से मिलकर बना है।

सन् 1808 में प्रसिद्ध रसायन शास्त्री “जॉन डॉल्टन” ने वैज्ञानिक ढंग से परमाणु सम्बन्धी सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने रासायनिक क्रियाओं के आधार पर बताया कि तत्व एक विशेष अनुपात में क्रिया करते हैं तथा इसके आधार पर डॉल्टन ने बताया कि सभी तत्व परमाणु कहलाने वाले सूक्ष्म कणों से मिलकर बने हैं, जिन्हें विभाजित करना असम्भव है। 

सन् 1897 में वैज्ञानिक “जे.जे.थॉमसन“ने निर्वात नली में कैथोड किरणों का उत्पादन करके इनके आवेश एवं द्रव्यमान का अनुपात का मान ज्ञात किया। उन्होंने देखा कि कैथोड किरणें ऋणावेषित हैं, जिन्हें इलेक्ट्रॉन का नाम दिया। अतः थॉमसन के प्रयोग से परमाणु में ऋणावेश की उपस्थिति का पता लगा। 

“मिलिकन” ने अपने प्रयोग से इलेक्ट्रॉन पर आवेश ज्ञात किया। 

सन् 1911 में “लॉर्ड रदरफोर्ड” का स्वर्ण परमाणु पर अल्फ़ा कण प्रकीर्णन के प्रयोग में यह पता लगा कि परमाणु में धनावेश भी उपस्थित है। यह परमाणु के मध्य भाग में स्थित है तथा परमाणु से लाख गुणा छोटा है तथा उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाता है।नाभिक में स्थित इन धनावेश कण को प्रोटॉन नाम दिया गया। 

सन् 1932 में विज्ञान विशेषज्ञ “जेम्स चैडविक“ने एक ओर नाभिकीय कण की खोज की, जिसका द्रव्यमान प्रोटॉन के बराबर था तथा इनपर कोई आवेश नही पाया जाता। इनका नाम न्यूट्रॉन रखा गया। लम्बे समय तक न्यूट्रॉन, प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन को नाभिक के मूल कण माना गया।

समय व्यतीत होने के साथ भौतिकविदों ने अन्य नाभिकीय कणों की खोज की, जिनमें हैं- न्यूट्रिन,फोटॉन, म्यूऑन, मेसॉन, एंटी-न्यूट्रॉनआदि। 

सन् 1932 में “सी.डी. एंडरसन” ने इलेक्ट्रॉन के एन्टी कण पोजिट्रॉन की खोज की। अब यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि सभी कणों के एंटी कणों का अस्तित्व भी है।

इतने सारे कणों की खोज होने के कारण इनको अलग-अलग समूहों में विभाजित किया। शुरू में सभी कणों को मोटे तौर पर दो समूहों में बांटा। एक समूह को “लेप्टोन” तथा दूसरे समूह को “हैड्रॉन” नाम दिया गया।

हल्के कण जैसे  इलेक्ट्रॉन, म्यूऑन व न्यूट्रिन को लेप्टोन परिवार में रखा गया और भारी कण जैसे प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, व मेसॉन को हैड्रॉन परिवार में शामिल किया गया। सामूहिक रूप से इन्हें क्रमशः बेरीयोन व मेसॉन कहा गया।

बेरीयोन को आगे दो भागों में बांटा, जिनका नाम”न्यूमलियोन” व “हाइप्रोन्स” रखा। न्यूमलियोन में प्रोटॉन, न्यूट्रॉन व इनके एंटी कणों को रखा गया, जबकि हाइप्रोन्स में लैम्डा कण, सिग्मा कण व काई कण को रखा गया।

सन् 1964 में गैलमैन, ज़ीमान व जॉर्ज ज़्वेईग ने क्वार्क मॉडल को प्रस्तुत किया। इस मॉडल के अनुसार सभी हैड्रॉन का निर्माण क्वार्क कणों से मिलकर हुआ होता है। इन कणों पर अन्य मूलकणों की तरह पूर्ण आवेश नही होता है। इन पर इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन का आवेश +2/3 या -1/3 गुणा होता है। गैलमैन को इस क्वार्क मॉडल के लिए 1969 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला।

गैलमैन के मॉडल में तीन क्वार्क ही प्रस्तावित थे। इनको अप, डाउन व स्ट्रेन्ज नाम दिया गया। बेरियोन नामक कणों की रचना तीन क्वार्कों से होती है तथा मेसॉन नामक कण की रचना एक क्वार्क व एक एंटी क्वार्क से होती है। प्रोटॉन में दो अप व एक डाउन क्वार्क पाये जाते है। न्यूट्रॉन में एक अप व दो डाउन क्वार्क पाये जाते हैं। अप क्वार्क पर +2/3e का आवेश होता है तथा डाउन क्वार्क पर -1/3e का आवेश होता है।

बाद में इसी क्रम में चौथे व पाँचवे क्वार्क की खोज हुई, जिनका नाम चार्म क्वार्क व बॉटम क्वार्क रखा गया। 

इसी क्रम में क्वार्क परिवार के छठे सदस्य की खोज अमेरिका स्मिथ फर्मी नेशनल एक्सीलेटर लेबोरेट्री में कार्यरत वैज्ञानिकों के दाल ने 2 मॉर्च 1995 में की, जिसका नाम टॉप क्वार्क” रखा गया।

क्वार्कों के अंतिम व अविभाज्य कण से अभी तक कई वैज्ञानिक पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नही है। अब इन क्वार्कों से आगे चलकर प्रोटोक्वार्कों के अस्तित्व के बारे में परिकल्पना करने में लगे हैं। प्रोटोक्वार्क ही  आगे की खोज का आधारभूत प्रश्न है|

ध्वनि क्या है? What is sound in Hindi

dwani sound system

वह कम्पन जो किसी माध्यम से मनुष्य के कानों तक जाए व उन्हें सुनाई दे, ध्वनि कहलाता है।

ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है, जो कम्पन के कारण पैदा होती है तथा श्रवण इन्द्रियों तक पहुँचकर सुनाई देती है।

इसके संचरण के लिए किसी न किसी माध्यम का होना आवश्यक है। यह माध्यम केवल द्रव्य रूप में ही हो सकता है। इसी कारण ध्वनि तरंगों को यांत्रिक तरंग के रूप में जाना जाता है। 

ध्वनि तरंगों के रूप में होती है। यह दो प्रकार की हो सकती है-

अनुदैघर्य तरंग– इसमें ध्वनि संचरण के माध्यम के कण समानान्तर इसकी गति की दिशा या विपरीत दिशा में जाते है तथा कम्पन से ध्वनि पैदा करते हैं। ऐसी ध्वनि तरंगों को अनुदैघर्य तरंगें कहते हैं। द्रव, गैस व प्लाज्मा आदि द्रव्यों में ध्वनि अनुदैघर्य तरंग के रूप में संचारित होती है।

अनुप्रस्थ तरंग– इसमें ध्वनि संचरण के माध्यम के कण इसकी गति की दिशा या विपरीत दिशा में न जाकर लम्बवत होकर कम्पन करके ध्वनि पैदा करते हैं। ऐसी ध्वनि तरंगों को अनुप्रस्थ तरंगें कहते हैं। ठोस पदार्थ में ध्वनि अनुप्रस्थ तरंग के रूप में संचारित होती है। 

ध्वनि कैसे उत्पन्न होती है?

जब किसी कम्पन युक्त वस्तु में कम्पन पैदा  होता है, तो उससे निकलने वाली तरंगें पहले हवा में विद्यमान कणों को आगे धकेलती हैं, जिससे हवा दाब बढ़ता है, यह क्रिया संपीड़न कहलाती है। 

संपीड़न के बाद वह हवा के कणों को पुनः कम हवा दाब वाले क्षेत्र में विपरीत दिशा में पीछे की ओर धकेलती है, यह क्रिया विरलन कहलाती है। अतः संपीड़न व विरलन से ध्वनि तरंगों का निर्माण व संचरण होता है। इससे ध्वनि उत्पन्न होती है तथा संचारित होती हुई कानों को सुनाई देती है।

प्रतिध्वनि- जब कोई ध्वनि तरंग आगे संचारित होती हुई आगे किसी द्रव्य से टकराकर पुनः मूल स्त्रोत के पास लौट आती है, तो इसे प्रतिध्वनि कहा जाता है।

मनुष्य एक सीमित आवृति की ध्वनि को ही सुनने की क्षमता रखता है। यह आवृति है- 20 हर्ट्ज़ से 20 किलोहर्ट्ज़। मनुष्य के अतिरिक्त कई अन्य जीव इससे काफी अधिक आवृति वाली ध्वनि को सुनने की भी क्षमता रखते हैं। अत्यधिक तेज आवाज ध्वनि मनुष्य एवं जानवर दोनों के कानो के लिए हानिकारक साबित हो सकती है|

आवृति के अनुसार ध्वनि भिन्न-भिन्न रूपों में हो सकती है, जो निम्नलिखित है-

अपश्रव्य– 20 हर्ट्ज़ से निम्न आवृति की ध्वनि अपश्रव्य की श्रेणी में आती है। इसे मनुष्य के कान नही सुन सकते न ही इसे सुनने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

श्रव्य– 20 हर्ट्ज़ से 20 किलोहर्ट्ज़ आवृति वाली ध्वनि श्रव्य होती है, जिसे मनुष्य द्वारा सुना जा सकता है।

पराश्रव्य– 20 किलोहर्ट्ज़ से अधिक आवृति वाली ध्वनि अत्यधिक उच्च तरंगों से युक्त होती है तथा यह भी मनुष्य द्वारा नही सुनी जा सकती।

अतिध्वनिक– 1 गीगाहर्ट्ज़ से अधिक आवृति वाली ध्वनि तरंगें अतिध्वनिक कहलाती है।

यह आंशिक रूप से पैदा होती है। 

ध्वनि से सम्बन्धित अन्य कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु निम्नलिखित हैं-

तरंगदैघर्य– एक ही क्रम में आने वाले दो संपीड़नो या दो विरलनो के मध्य पाई जाने वाली दूरी को तरंगदैघर्य कहते हैं।

आवृति– किसीद्रव्य से एक ही समय में उत्पन्न होने वाले कम्पनों की कुल संख्या ही ध्वनि तरंगों की आवृति कहलाती है।

आवर्तकाल– एक कम्पन से दूसरे कम्पन उत्पन्न होने के लिए पहले कम्पन का पूरा होना आवश्यक है, जिसमें कुछ समय लगता है। अतः एक कम्पन को पूरा करने में जो समय लगता है, उसे ही आवर्तकाल कहते हैं।

आयाम– ध्वनि तरंगों के संचरण के माध्यम के कणों में जिस बिन्दु पर सबसे अधिक कम्पन पैदा होता है, वह आयाम कहलाता है|

ध्वनि के अनेकों रूप हो सकते है, जिसमे से कुछ प्रीतिकर होते है एवं अन्य नुकसान पहुचाने वाले, अत: स्वविवेक अनिवार्य है|

आधुनिक प्रजनन की विधियाँ

आधुनिक प्रजनन विधियाँ

कई बार पति या पत्नी की किसी शारीरिक विकृति के कारण प्राकृतिक तरीके से गर्भाधान व संतान पैदा करने की अक्षमता उत्पन्न हो सकती है, जो कि काफ़ी निराशाजनक होता है। 

परन्तु आज के समय में विज्ञान व तकनीकी जगत में प्रगति के कारण पति-पत्नी कुछ खास विधियों का उपयोग कर अपनी सन्तान का सुख प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए कुछ अलग-अलग प्रकार की विधियाँ काम में लायी जा सकती हैं। इन विधियों को “सहायक जननप्रौद्योगिकी” कहते हैं।

ये निम्नलिखित हैं-

#1 परखनली शिशु(Test Tube Baby)

#2 युग्मक अन्तःफेलोपियन स्थानांतरण(G.I.F.T.)

#3 अन्तः जीवद्रव्यीय शुक्राणु बन्धन(I.C.S.I.)

#4 कृत्रिमगर्भाधान(A.I.)

परखनली शिशु(Test Tube Baby):

किसी स्त्री की अंडवाहिनियों में विकार होने के कारण या पुरुष में पर्याप्त शुक्राणु निर्माण न होने के कारण स्त्री को गर्भधारण न होने की समस्या हो जाती है। अंडवाहिनी विकार की स्थिति में किसी अन्य स्त्री के गर्भाशय से अण्डाणु ग्रहण किये जाते है तथा उस स्त्री के पति के शुक्राणु से मेल करवाकर निषेचन प्रक्रिया सम्पन्न करवाई जाती है। इससे युग्मनज निर्मित होते हैं। जब यह युग्मनज 32-कोशिकीय अवस्था में पहुँच जाता है तो इसका उस स्त्री के गर्भाशय में रोपण कर दिया जाता है तथा भ्रूण विकास की शेष सम्पूर्ण प्रक्रिया गर्भाशय में धीरे-धीरे चलती रहती है। इस प्रकार से जन्म लेने वाला शिशु को परखनली शिशु कहा जाता है।

विश्व में सफलतापूर्वक प्रथम परखनली शिशु का जन्म इंग्लैंड में हुआ था, जिसका नाम लुईस जॉय ब्राउन है।

भारत में सर्वप्रथम परखनली शिशु 3 अक्टूबर 1978 में कोलकाता में हुआ था, जिसका नाम कनुप्रिया अग्रवाल है।

युग्मक अन्त

फेलोपियन स्थानांतरण(G.I.F.T.) इसे अंग्रेजी में GameteIntra Fallopian Transfer कहते हैं। कुछ स्त्रियों के गर्भाशय में शुक्राणु से प्रतिरक्षा करने वाले  पदार्थ पाये जाते हैं, जिससे शुक्राणु व अण्डाणु का मेल न होने के कारण निषेचन सम्भव नही होता अर्थात  अंडाशय निर्माण न होने की समस्या पाई जाती है, जिस कारण स्त्री में गर्भधारण की क्षमता नही रहती।

फेलोपियन स्थानांतरण विधि में फेलोपियन नलिका के भीतर शुक्राणु व अण्डाणु का निषेचन करवाया जाता है तथा शेेेष प्रक्रिया गर्भाशय में चलती रहती है।

अन्तः जीवद्रव्यीय शुक्राणु बन्धन(I.C.S.I.)

इसे अंग्रेजी में IntraCytoplasmic Sperm Injection कहते हैं। इस विधि में पुरूष के शुक्राणुओं को प्रयोगशाला में संवर्धन देकर सीधे ही स्त्री के गर्भाशय में अण्डाणु प्रवेश करवा दिया जाता है। यह परखनली शिशुविधि से थोड़ी ही अलग है।

कृत्रिम गर्भाधान(A.I.)

इसे अंग्रेजी में Artificial Insemination कहते हैं। कुछ परिस्थितियों में पुरुषों में सम्भोग के दौरान बनने वाले वीर्य में गर्भाधान योग्य पर्याप्त शुक्राणु नही निर्मित हो पाते हैं अर्थात् वीर्य में शुक्राणुओं की कम मात्रा के कारण स्त्री गर्भ धारण नही कर पाती। ऐसी स्थिति में कृत्रिम गर्भाधान विधि का उपयोग किया जाता है। इसमें पुरुष का वीर्य एकत्र करके उस स्त्री के गर्भाशय में स्थापित करवाया जाता है तथा गर्भग्रहण होने के बाद की शेष प्रक्रिया गर्भाशय में पूरी होती रहती है। 

सरोगेसी

कई बार स्त्री के गर्भाशय सम्बन्धी समस्या के कारण किसी प्रजनन विधि के बाद भी गर्भ का विकास करने की क्षमता नही होती है, तो ऐसी स्थिति में अन्य युक्ति काम में ली जा सकती है। 

स्त्री के अण्डाणु व उसके पति के शुक्राणु का परस्पर कृत्रिम तरीके से निषेचन करवा दिया जाता है। फलस्वरूप युग्मनज का निर्माण तथा फिर भ्रूण अस्तित्व में आता है। जब यह भ्रूण 32 कोशिकीय अवस्था में होता है तो किसी अन्य स्त्री की सहमति से उसके गर्भाशय में उस भ्रूण को रोपित कर दिया जाता है तथा भ्रूण विकसित होते हुए शिशु के रूप में जन्मता है। यह प्रक्रिया ही सरोगेसी कहलाती है तथा ऐसी स्त्री को सरोगेट मदर या परिचारक माँ कहा जाता है| आधुनिक समय में यह प्रक्रिया काफी प्रचलन में है|

भाप क्या है व इसके उपयोग

disel engine

भाप क्या है? 

जल को अत्यधिक ताप देने से इसका आयतन बढ़ता है तथा 100° सेल्सियस से अधिक गर्म होने पर यह जिस रूप में उड़ता है, उसे वाष्प या भाप कहते हैं। साधारण शब्दों में,जल को गर्म करनेसे निकलने वाली वाष्प को भाप कहते हैं अर्थात् जलवाष्प को भाप कहते हैं। यह गैसीय रूप में होती है।

जल को भाप में परिवर्तित करने के लिए जिस ऊष्मा की आवश्यकता होती है, उसे भाप की गुप्त ऊष्मा कहते हैं। 

इसके अलावा किसी अत्यधिक गर्म वस्तु पर पानी डालने से भी उसमे से भाप निकलती है।

यदि भाप की प्रकृति के बारे में बात की जाए तो यह दो तरह से हो सकती है- 

आर्द्र भाप व शुष्क भाप।

आर्द्र भाप- जब भाप में बूँदों के रूप में जल की कुछ मात्रा उपस्थित रहती है तो इसे आर्द्र भाप कहते हैं। यह सामान्यतः दृश्य होती है अर्थात् इसे देखा जा सकता है, क्योंकि जल की उपस्थिति के कारण यह सफेद रंग लिए हुए होती है।

शुष्क भाप- इसी के विपरीत जब भाप जलविहीन हो तो इसे शुष्क भाप कहा जाता है। यह अदृश्य होती है, क्योंकि जल के पूर्ण अभाव के कारण इसका कोई रंग नही होता।

भाप के उपयोग-

भाप के उपयोग का इतिहास बहुत बड़ा है। इसका उपयोग ऊष्मा को यांत्रिक ऊर्जा के रूपमें परिवर्तित करने के लिये किया जाता है। लगभग 300 ईसा पूर्व भाप को यांत्रिक ऊर्जा के रूप में प्रयोग करने का पहला श्रेय एलेक्जेंड्रिया के व्यक्ति को जाता है, जिनका नाम “हीरो” था। इन्होंने भाप से खिलौनों में गति  पैदा की थी अर्थात् भाप से चलने वाले छोटे-छोटे खिलौने निर्मित किये थे।

1698 ईस्वी में”सेवरी” नामक व्यक्ति द्वारा भाप से चलने वाली एक मशीन बनाई गयी। इस वाष्पयान का उपयोग खदानों तक पानी की व्यवस्था करने हेतु तथा कुओं से पानी निकालने के लिए किया जाता था।

सेवरी के बादभाप इन्जन के रूप में एक नया आविष्कार “टॉमस न्यूकॉमेन” द्वारा किया गया। उनके इस आविष्कार को न्यूकॉमेन इन्जन के नाम से जाना गया। लगभग 50 वर्षों तक इसका व्यावसायिक उपयोग किया गया।

टॉमस न्यूकॉमेनके इस आविष्कार के कारण सर जेम्स वाट को अपने आविष्कार के लिए एक दिशा मिली, क्योंकि न्यूकॉमेन द्वारा बनाये गए वाष्पयान की मरम्मत की जिम्मेदारी वाट को मिली थी। मरम्मत कार्य के दौरान यन्त्र में रुचि रखने वाले वाट ने अपनी बौद्धिक क्षमता का बाखूबी इस्तेमाल करते हुए यह पाया कि उसमे ईंधन बहुत व्यर्थ होता है तथा इसका सही उपयोग नही हो रहा है। बाद में इसमें सुधार करके नया रूप दिया गया। अतः मुख्य रूप से भाप का सबसे बड़ा उपयोग 19वीं सदी के आरम्भ में “सर जेम्स वाट“द्वारा भाप से चलने वाले इन्जन का आविष्कार करके किया गया।

सन 1884 में “सर चार्ल्स पेर्सन्स” द्वारा एक ऐसी मशीन का निर्माण किया गया, जिससे भाप की ऊष्मा को यांत्रिक ऊर्जा का रूप प्रदान किया जाता है। इस मशीन को वाष्प टरबाईन कहा जाता है। वर्तमान समय तक भी यान्त्रिक ऊर्जा के निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है।

इसके पश्चात् भाप से चलने वाली कई छोटी मशीनों का भी निर्माण किया गया।

आधुनिक समय में कई तरह से भाप का उपयोग किया जा रहा है।

शीत युक्तप्रदेशों में घरों में गर्माहट बनाये रखने के लिए भाप का इस्तेमाल किया जाता है।इसमें घर के सबसे नीचे वाले भाग में गर्म पानी से भाप पैदा की जाती है तथा नलिकाओं से होती हुई भाप कमरों तक पहुंचकर तापमान को बढ़ाती है। सौन्दर्य के क्षेत्र में भीभाप का उपयोग किया जाता है। चेहरे की स्वच्छता व रोमछिद्रों को खोलने के लिए भापका उपयोग किया जाता है।

स्वास्थ्य हेतुचिकित्सा क्षेत्र में भी शरीर को भाप प्रदान की जाती है। इसे वाष्पस्नान  कहा जाता है। इसमें भापयुक्त कक्ष का उपयोगकिया जाता है| इससे शरीर की विभिन्न प्रकार की बीमारियों का इलाज करने हेतु प्रयोग कियाजाता है, एवं आयुर्वेद में भाप का काफी महत्व है| इस प्रकार आज के आधुनिक युग में भाप का कई प्रकार से उपयोग किया जाता है, इसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता एवं इसके अविष्कार एवं प्रयोग का इतिहास भी काफी रोमांचक रहा है|उम्मीद है, कि आपको इस लेख से अच्छी जानकारी मिली होगी एवं कुछ नया खोजने की प्रेरणा प्राप्त हुई होगी|