इस्पात (स्टील) कैसे बनता है?

इस्पात या स्टील हमारे आसपास न जाने किन-किन रूपों में मौजूद रहता है चाहे वह हमारा घर हो, रसोई हो, ऑफिस हो या कुछ और| स्टील के प्रयोग बिना किसी भी निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती|

खाना बनाने के बर्तन से लेकर सड़को पर दौड़ने वाले वाहन, बड़े-बड़े पुल या समुंद्र में चलने वाले जहाज या हवा में उड़ने वाले प्लेन आदि सभी में स्टील का इस्तेमाल किया जाता है| क्या आपने कभी सोचा है कि इतनी महत्वपूर्ण धातु का निर्माण कैसे किया जाता होगा आइये जानते है इस बारे में|

क्या है स्टील एवं कैसे बनता है?

स्टील दो धातुओ कार्बन एवं लोहा के मिश्रण से निर्मित हुआ धातु है जिसे लोहे के साथ अन्य धातुओं को मिलाकर बनाया जाता है जिससे इसे पर्याप्त कठोरता मिल सके क्योकि शुद्ध लोहा नर्म होता है एवं उससे मजबूत निर्माण नहीं किया जा सकता|

1149 डिग्री के उच्च तापमान पर लोहे में केवल 2.14% कार्बन को मिक्स किया जाता है एवं इससे ज्यादा कार्बन मिलाने पर लोहा और अधिक मजबूत एवं अच्छी क्वालिटी का निर्मित होता है जिसे कास्ट आयरन कहा जाता है जिसमे जल्दी से जंग नहीं लगती|

कार्बन के साथ इसमें मजबूती एवं सुधार के लिए अन्य सहायक तत्व जैसे टंगस्टंन, मैगनीज, वेनेडियम, क्रोमियम आदि मिक्स किये जाते है|

क्या है स्टेनलेस स्टील?

स्टील का परिष्कृत रूप जो साधारण स्टील के मुकाबले ज्यादा टिकाऊ एवं बेहतर होता है उसे स्टेनलेस स्टील का नाम दिया गया| स्टेनलेस स्टील में अधिक क्रोमेयिम, निकेल, ताम्बा, आदि मिलाया जाता है जिससे इसे लॉन्ग लाइफ मिलती है एवं जंग या धब्बे लगने से यह खराब भी नहीं होता|

यह स्टील आम स्टील की तुलना अधिक ताप सहन कर सकता है| दरअसल इस स्टील का निर्माण 1871 ई. में किसी प्रयोग की भूलवश हुआ| खोजकर्ता बंदूक के बैरल को बनाना चाहते थे जो पानी आदि लगने से खराब न हो न ही जंग लगे और निर्मित हुआ स्टेनलेस स्टील का नमूना जिसका आज न जाने कहाँ-कहाँ प्रयोग किया जाता है|

स्टील एक ऐसी धातु है जिसे पुन: रीसायकल किया जा सकता है एवं इससे पर्यावरण को भी कोई खास हानि नहीं होती| स्टील के आधुनिक रूप स्टेनलेस स्टील ने उद्योगिक जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन किये एवं आज भी आप वर्षो पहले निर्मित हुए निर्माणों को जैसे का तैसा देख सकते है|

उम्मीद है आपको यह जानकारी पसंद आई होगी यदि आपके पास इससे सम्बंधित कोई रोचक तथ्य हो तो हमसे जरुर शेयर करे एवं अपनी राय रखे|

दर्द क्यों होता है?

शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द होना प्रत्यक्ष रूप से यही संकेत देता है कि शरीर के किसी आंतरिक या बाह्य भाग में कोई गड़बड़ या परेशानी है। बिना किसी शारीरिक समस्या के दर्द की समस्या पैदा नही होती है। यह समस्या आम भी हो सकती है और गंभीर भी।

मनुष्य के शरीर में अनगिनत नसों का जाल फैला हुआ होता है। एड़ी से लेकर चोटी तक की नसों का जुड़ाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क तक होता है, जिसके कारण शरीर के किसी भाग में दर्द होने पर नसों के माध्यम से यह संकेत मस्तिष्क तक पहुँचता है तथा हमें दर्द का अनुभव होता है।

नसों के इस उलझे हुए जाल के कारण कई बार ऐसा भी होता है कि तकलीफ तो शरीर के किसी एक भाग में होती है, परन्तु दर्द का अहसास उस भाग के अलावा दूसरे भाग में भी होता है। 

शरीर में दर्द होने के अनगिनत कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ ये हैं- कहीं चोट लगने, हड्डी टूटने या खिसकने, नसों में दबाव, मांसपेशियों में खिंचाव, कटाव या आघात, रोग आदि। दर्द आंतरिक रूप से या बाह्य रूप से या दोनों तरह से हो सकता है।

समय सीमा के आधार पर दर्द दो प्रकार के हो सकते हैं- 

स्थायी दर्द- वह दर्द जो जल्दी से खत्म नही होता है और किसी गम्भीर समस्या के कारण पैदा होता है। कई बार तो यह लाइलाज भी हो जाता है, जो कि मनुष्य के जीवित रहते हुए सदैव ही बना रहता है।

अस्थायी दर्द- ऐसा दर्द जो स्थिर न हो और कुछ अवधि के बाद खत्म हो जाता है। इसका उपचार भी सम्भव होता है या कई बार बिना उपचार के स्वतः ही सही हो जाता है। जैसे- घाव, सरदर्द, पेटदर्द आदि।  

असाधारण स्थिर दर्द की समस्या में व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए।

कई बार शरीर के किसी अंग में दर्द होता है तो वह नसों में खून के बहाव को भी प्रभावित करता है, जिससे रक्त चाप निम्न या उच्च हो जाता है। कई बार रक्त चाप सीमा से अधिक हो जाने पर नस के फटने जैसी गम्भीर स्थिति भी पैदा हो जाती है और जानलेवा भी हो सकती है। 

दर्द को ठीक करने के लिए अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों जैसे होम्योपैथी, एलोपैथी, आयुर्वेद, एक्युप्रेशर, सुजोक आदि में विभिन्न प्रकार के उपायों को अपनाया जाता है। प्रत्येक मनुष्य अपनी बौद्धिक क्षमता व इच्छा के आधार पर दर्द के निवारण के लिए किसी भी प्रकार की चिकित्सा पद्धति का चुनाव कर सकता है|

वाष्प स्नान (स्टीम बाथ) करने के फायदे और नुकसान क्या है?

बाष्प स्नान, स्टीम बाथ, या सोना बाथ, या भाप स्नान आदि नामो से पुकारे जाने वाले इस स्नान को लेना सेहत के लिए काफी फायदेमंद साबित हुआ है| स्टीम बाथ आप न केवल सर्दियों में बल्कि कभी भी ले सकते है|

इससे रक्त संचार ठीक रहता है एवं शरीर की मृत कोशिकाए निकल जाती है, जिससे त्वचा में नयी कोशिकाओं का बनना शुरू होता है एवं अच्छे से सफाई हो जाती है जिससे स्किन अच्छी एवं कोमल बनी रहती है|

स्टीम बाथ का फायदे:

स्टीम बाथ तनाव से मुक्ति पाने का अच्छा तरीका है इससे रोमछिद्र खुल जाते है एवं आपका शरीर खुलकर सांस ले सकता है|

त्वचा को प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन मिलती है एवं हानिकारक टोक्सिन शरीर से पसीने के रूप में बाहर निकल जाते है|

इससे मांसपेशियों को राहत मिलती है एवं किसी प्रकार के दर्द या सूजन में आराम मिलता है एवं इससे इम्यून सिस्टम मजबूत बनता है एवं रात को नींद भी अच्छी आती है|

इससे रक्त प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे त्वचा के रोग से छुटकारा मिलता है एवं यह त्वचा को निरोगी एवं सुंदर बनाता है|

तथ्यों में ऐसा माना गया है कि स्टीम बाथ नियमित रूप से लेने पर कैंसर निर्माण करने वाले सेल्स नष्ट हो जाते है जिससे कैंसर होने की सम्भावना कम हो जाती है|

स्टीम बाथ लेने के नुकसान:

स्टीम बाथ के 15 या 20 मिनट से अधिक नहीं लेना चाहिए एवं इसे केवल उपचार स्वरूप लेना ठीक रहता है|

स्टीम बाथ के बाद शरीर से काफी पानी निकल जाता है इसलिए स्टीम बाथ लेने के बाद पानी ज्यादा पीना चाहिए नहीं तो डिहाइड्रेशन की समस्या पैदा हो सकती है|

जिन्हें दिल की बीमारी की समस्या हो या गर्भवती महिलाएं एवं छोटे बच्चे अथवा बुखार आदि होने पर स्टीम बाथ नहीं लेना चाहिए|

प्लास्टिक किस चीज से बनता है?

आमतौर में हम अपने दैनिक जीवन में प्लास्टिक से बने विभिन्न प्रकार के सामानों का इस्तेमाल करते हैं, जिसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विश्व भर में पाये जाने वाले कुल तेल का लगभग 8 प्रतिशत प्लास्टिक को उत्पादित करने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होता है। 

प्लास्टिक का निर्माण सर्वप्रथम अमेरिकी वैज्ञानिक “जॉन वेस्ले हयात” द्वारा किया गया था। प्लास्टिक से तो बहुत सी चीजों का निर्माण किया जाता है, परन्तु आज के इस लेख में हम आपको यह बताना चाहते हैं कि प्लास्टिक का निर्माण कैसे होता है? 

प्लास्टिक कई तत्वों को मिलाकर निर्मित किया जाता है। इन तत्वों में कार्बन, सल्फर, क्लोरीन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन व नाइट्रोजन को सम्मिलित किया जाता है। चूँकि इसमें अनेक तत्वों का समावेश होता है तो सम्भवतः इसमें अणु व परमाणु भी पाये जाते हैं, जो परस्पर बन्धन में होते हैं। प्लास्टिक निर्माण की विधि में बहुलीकरण व संघनन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इन दोनों प्रक्रियाओं में अणुओं से बहुलक निर्माण की क्रिया में भिन्नता पाई जाती है।

प्लास्टिक कई प्रकार के होते हैं, इसीलिए इन्हें निर्मित करने की विधियाँ भी अलग-अलग होती हैं। उच्च संवेदनशीलता पॉलीथीन, पॉली कार्बोनेट, कम घनत्व पॉलीथीन, पोलिबूटिलीन टेरेफेथलेट, पॉलीथीन टेरेफेथलेट, पोलिवेनाइल क्लोराइड, पोलियुरेथेन, पॉली प्रोपाइलेन, नायलॉन, एक्रिलोनिट्रीयल, पॉलिफ्ल्फोन, पॉलिस्टीरिन, पोलिक्सिमेथेलिन, पॉलीमैथिल मैथक्राइलेट, पॉलिटेट्राफ्लोराइथेलेन, पोलिफेनेलिन सल्फाइड आदि प्लास्टिक के प्रकार हैं। 

इन भिन्न-भिन्न प्रकार के प्लास्टिक से ही भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। कुछ प्लास्टिक में अधिक घनत्वता पाई जाती है और कुछ कम घनत्व वाले होते हैं। 

प्लास्टिक के सम्बन्ध में कुछ नकारात्मक तथ्य ये हैं कि प्लास्टिक का विघटन आसानी से नही होता है। यदि प्लास्टिक या प्लास्टिक से बनी कोई वस्तु जमीन के भीतर रह जाए तो यह हजारों सालों तक नष्ट नही होती तथा मृदा की उपजाऊ क्षमता पर विपरीत प्रभाव डालती है। प्लास्टिक को जलाने पर इसमें से जहरीली गैसें निकलती है, जो पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनती है। प्लास्टिक हवा और पानी को अवरुद्ध करता है|

आग की खोज किसने की?

आग को मनुष्य के जीवनकाल में सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक माना जाता है| आज के समय में आग का कार्य भोजन पकाने से लेकर बड़े कारखानों में कार्य करना एवं परमाणु बम द्वारा देश तक नष्ट कर देने में योगदान रहा है|

शुरू में जब मानव आग के प्रयोग एवं इसके प्रभाव से अनजान था तब किसी समय में वह इससे डरता भी था किन्तु जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया मानव एवं आग का सम्बन्ध और भी गहरा होता गया|

हजारों वर्ष पहले आग को आदिमानव द्वारा खोजा गया| आदिमानव काल में मनुष्य जंगलो में रहा करते थे एवं जंगली जानवरों से बचने हेतु एवं अपना खाना पकाने के लिए आग का इस्तेमाल प्रारंभ किया गया|

गुफाओं में रहने वाले आदिमानव को बिजली गिरना, आग लगना आदि का बोध नहीं था किन्तु जब उसने देखा के जंगली जानवर आग से डरते है तो उसने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया एवं आग जलाना सीखा|  

कैसे जलाई जाती थी आग:

आग को जलाने के लिए हजारो साल पहले घर्षण विधि का प्रयोग किया जाता था जिसके लिए अरणी नामक यंत्र को बनाया गया जिसमे एक लकड़ी के टुकड़े को सूखी लकड़ी की छड़ी से कुछ देर तक रगड़ने पर चिंगारी पैदा होती थी एवं यही आग का रूप धारण कर लेती थी|

आदिमानव आग जलाकर इसे अपनी गुफा के प्रवेश पर रख देता था जिससे कोई जंगली जानवर अंदर न आ सके साथ ही यह उसे ठण्ड से भी बचाती थी|

आधुनिक युग में आग पैदा करना काफी सरल हो गया है किन्तु किसी समय में यह बहुत मुश्किल था एवं लोग इसका प्रशिक्षण लेते थे|

1830 ई. में दियासलाई की खोज ने आग जलाने का काम और आसान कर दिया एवं आज भी ठण्डे इलाको में लोग खुद को गर्म रखने के लिए आग जलाकर रखते है|  

फ्लोराइड क्या हैं? What is Fluoride

फ्लोराइड असल में एक प्राक्रतिक तत्व है जो मिटटी पानी में मौजूद रहता है एवं यह फ़्लोरिन के यौगिक समूह से मिलकर बनता है|

वैज्ञानिको ने बहुत पहले ही इस बात का पता लगा लिया था कि पानी में फ्लोराइड की अधिक मात्रा सेहत के लिए हानिकारक हो सकती है|

फ्लोराइड की अधिक मात्रा से सबसे ज्यादा हानि दांतों एवं हड्डियों को होती है| वैसे तो फ्लोराइड प्राक्रतिक रूप से हमारे दांतों की सुरक्षा करता है एवं कैविटी से बचाव करता है किन्तु इसका ज्यादा प्रभाव नुकसानदायक भी साबित हुआ है|

कैसे आता है पीने के पानी में फ्लोराइड?

जैसा कि हमने कहा कि फ्लोराइड मिटटी पानी आदि में पहले से ही मौजूद रहता है किन्तु कारखानों आदि के अपशिष्ट नदियों, झीलों आदि में जाने से फ्लोराइड की मात्रा बहुत बढ़ जाती है|

फ्लोराइड के सहतत्व जैसे सोडियम फ्लोराइड एवं फ्लोरोसिलीकैट आदि इसके साथ ही विद्यमान रहते है| कुछ जागरूक देश जो पानी को दूषित नहीं होते देते वे अपने पीने के पानी में फ्लोराइड मिलाते है जिससे दांतों को स्वस्थ रखा जा सके|

फ्लोराइड के अच्छे प्रभाव:

हमारे दांतों पर नेचुरल एनामल की परत होती है जो बैक्टीरिया से दांतों की सुरक्षा करती है परन्तु ज्यादा मीठा खाने या गर्म चाय कॉफ़ी पीने से यह परत कमजोर पड़ जाती है एवं दांत खराब होने लगते है|

फ्लोराइड एनामल की इस परत की रक्षा करता है एवं बैक्टीरिया को मारने में मदद करता है| यह दांतों में हानिकारक अम्ल का निर्माण नहीं होने देता जिससे दांत मजबूत बने रहते है एवं खराब नहीं होते|

आप अपने पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा का आसानी से पता लगवा सकते है एवं यदि वह निश्चित स्तर से ज्यादा है तो उसे कम करवाया जा सकता है| अपने पानी के बारे में आज ही अपने सप्प्लायेर से बात करे|  

कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम कैसे किया जाता है?

पर्यावरण विशेषज्ञों ने हाल ही में यह चेतावनी दी है कि ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा की दिन प्रतिदिन होती वृद्धि ने पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक जीव के लिए जानलेवा खतरा उत्पन्न कर दिया है जिसे यदि वक्त रहते रोका न गया तो खुली हवा में सांस तक लेना दुभर हो जायेगा|

अमेरिका में रोज होने वाले प्रयोगों में CO2 के उत्सर्जन को यंत्रो द्वारा नापा जाता है एवं अभी हुए नापन में यह आंकड़ा 10 लाख के भी पार चला गया जो कि खास चिंता का विषय बना हुआ है|

अभी हाल ही में हुए प्रयोगों के अनुसार एक नयी जानकारी सामने आई है जो कार्बन डाईऑक्साइड के प्रभाव एवं उसके उत्सर्जन को कम करने में सहायता करती है और हम यहाँ उसके बारे में चर्चा करेंगे|

क्या है कार्बन डाइऑक्साइड के प्रभाव को कम करने की तकनीक:

काफी प्रयोगों एवं शोध के बाद वैज्ञानिकों ने पालिमोर से विकसित एक कोर शैल कैप्सूल का अविष्कार किया है जिसे Lawrence Livemore National Laboratory में बनाया गया है|

इस कैप्सूल में सोडियम कार्बोनेट को भरा गया है जिसमे Co2 के प्रभाव एवं उत्सर्जन को कम करने का विशेष गुण पाया जाता है|

वैज्ञानिको का ऐसा मानना है कि शायद इस तकनीक की मदद से पर्यावरण को हुए नुकसान को भविष्य में रोका जा सकेगा|

सोडियम कार्बोनेट छोटी-छोटी बूंदों के रूप में कैप्सूल में खुद को सील रखता है एवं CO2 के साथ तेजी से प्रतिक्रिया करता है जो इसका अवशोषण भी करता है|

इसके साथ ही बिजली बनाने के लिए प्राक्रतिक गैस एवं कोयले को इस्तेमाल करने से भी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम होगा ऐसा माना जा रहा है| बेकिंग सोडा का इस्तेमाल अब तक सौन्दर्य प्रसाधन या केवल रसोई तक ही सीमित था किन्तु इसका ऐसा प्रयोग करना एवं उसमे सफलता प्राप्त करना एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है|

निष्कर्ष:

Co2 के उत्सर्जन के लिए ग्रीनहाउस गैसों का मुख्य योगदान रहता है एवं रोज Co2 के बढ़ते लेवल ने पर्यावरणविदो को अनचाही चिंता में डाल दिया है एवं उन्होंने सभी राष्ट्रों से यह निवेदन किया है कि कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने के लिए शीघ्रता से उपाय किये जाने चाहिए जिससे आने वाली तबाही को रोका जा सके|

यदि आपकी इस बारे में कोई राय हो तो हमसे जरुर शेयर करे या कमेंट बॉक्स में अपनी सलाह रखे, उम्मीद है कि आपको यह जानकारी पसंद आई होगी|

चंद्रमा पर हम माचिस जलाएंगे तो क्या होगा?

माचिस की तीली के एक सिरे पर जिलेटिन की सहायता से फास्फोरस की परत बनाई जाती है। जब उस सिरे पर घर्षण या रगड़ पैदा होती है तो उसमे आग उत्पन्न होती है। माचिस की तीली पर रगड़ के कारण उसमें ऊष्मा पैदा होती है, जो गैस का सृजन करती है व ऊष्मा से चिंगारी बनकर तीली जल उठती है। ध्यान देने योग्य बात है कि माचिस की तीली को जलने में गैस का योगदान होता है।

इस बात से तो आप सब अवगत ही हैं कि चन्द्रमा को पृथ्वी के एक उपग्रह के रूप में माना जाता है तथा चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूर्णन करता है। पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण अधिक प्रबल रूप से कार्य करता है, परन्तु चन्द्रमा पर गुरुत्व प्रभाव अत्यन्त कम है। 

अब यहाँ हम आपको इस तथ्य से अवगत करवाना चाहते हैं कि यदि चन्द्रमा पर माचिस की तीली जलाने का क्या प्रभाव होता है? 

इसका उत्तर है कि चन्द्रमा पर माचिस की तीली आग नही पैदा करती व नही जलती। इसका कारण यही है कि चन्द्रमा पर गुरुत्व प्रभाव अत्यन्त निम्न स्तर पर होता है। गुरुत्वाकर्षण की कमी होने की वजह से जब तीली पर रगड़ की जाती है तो उसमें ऊष्मा युक्त गैस की स्थिरता नही बन पाती और यह नही जलती है|

क्या हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है

ब्रह्मांड में सबसे अधिक मात्रा में पाए जाने वाली यह हाइड्रोजन ऑक्सीजन के साथ संयुक्त होकर जल का निर्माण करती है| हाइड्रोजन को एक उच्च श्रेणी का अपचायक माना जाता है एवं ऑक्सीजन एवं वायु की उपस्थ्ति में यह ज्वलनशील होता है|

हाइड्रोजन की खोज का श्रेय ‘हेनरी क्वेंडीस’ को दिया जाता है, जिन्होंने 1766 ई में इसकी खोज की| वैसे तो हाइड्रोजन को अनेक रूपों में इस्तेमाल किया जाता है, जैसे वनस्पति तेल बनाने, उर्वरक बनाने, ईंधन आदि क्योकि इसके जलने का ताप काफी ज्यादा होता है एवं विभिन्न तत्वों के साथ मिलकर यह अलग-अलग प्रक्रियाए करता है|

हाल ही में हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में शोध एवं अनुसन्धान किये जा रहे है| हाइड्रोजन गैस को ईंधन के रूप में यूज़ करना कारगर साबित हो सकता है एवं भारत के कुछ क्षेत्रों में हाइड्रोजन ऊर्जा के संयत्र स्थापित भी किये गये है|

हाइड्रोजन ईंधन के प्रयोग का उद्देश्य:

हाइड्रोजन को अनेक विधियों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है किन्तु इसे प्राप्त करने की सबसे सरल एवं सस्ती तकनीक ‘जल गैस’ विधि है|

हाइड्रोजन ईंधन का प्रयोग दुपहिया वाहन, तीनपहिया वाहन, विभिन्न औद्योगिक संयंत्रो एवं ऊर्जा निर्माण हेतु किया जाने के बारे में विचार किया जा रहा है एवं ऐसा अनुमान है कि कुछ ही समय में भारत में हाइड्रोजन इंधन से चलने वाले वाहनों का आवागमन होगा|

भारत में अनेक उच्च संघठनो में हाइड्रोजन निर्माण के लिए कार्यशालाए स्थापित की गई है जिससे हाइड्रोजन का भंडारण सर्वश्रेष्ठ रूप से कैसे किया जाए इस बारे में प्रयोग किये जाते है| हाइड्रोजन ईंधन का उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए करना एवं जन सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अभी इसपर और भी प्रयोग होना अभी बाकी है एवं ऐसा अनुमान है कि कुछ ही वर्षो में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे|

ठण्डी ज्वाला या कोल्ड फ्लेम क्या होता है? What is the Cold Flame

ठण्डी ज्वाला (कोल्ड फ्लेम), जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो रहा है कि यह ठण्डी ज्वाला अर्थात् ऐसी ज्वाला है, जो स्पर्श में आने पर गर्म नही लगती और त्वचा को जलाती नही है। 

साधारण रूप में अधिकतम 400℃ से निम्न तापमान से युक्त ज्वाला को ठण्डी ज्वाला कहा जाता है।

यह रासायनिक प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न होने वाली ऐसी ज्वाला है, जिसमें ताप की दर अत्यधिक निम्न अवस्था में आ जाती है।

सन् 1810 में “हम्फ्री डेवि” द्वारा अपने एक प्रयोग के दौरान कोल्ड फ्लेम की खोज की गयी थी।  

आम तौर पर आग (ज्वाला) में पाये जाने वाले अणु छोटे अणुओं में परिवर्तित होकर ऑक्सीजन के साथ मिलकर कार्बन डाई-ऑक्साइड का रूप लेकर ज्वलनशील हो जाते हैं, जबकि ठण्डी ज्वाला के कण अपेक्षाकृत बड़े होते हैं तथा एक-दूसरे से साथ श्रृंखलाबद्ध रूप से जुड़े रहते हैं, अतः ये कार्बन डाई-ऑक्साइड से मुक्त होने के कारण ज्वलनशील व गर्म नही होते हैं।

साधारण ज्वाला की तरह कोल्ड फ्लेम को आसान तरीके से प्राप्त नही किया जा सकता। कोल्ड फ्लेम को दिन की रोशनी में  स्पष्ट रूप से देखा नही जा सकता, जबकि अंधेरे वाली जगह में इसे पूर्णतया स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि ठण्डी ज्वाला का रूप साधारण ज्वाला से भिन्न है।

कोल्ड फ्लेम का रंग नीला दिखाई पड़ता है और कभी कभी बैगनी भी।

Normally (अक्सर ) जब हम आग जलाते हैं तो अणु छोटे छोटे टुकडो में टूट जाते हैं और ऑक्सीजन के साथ मिलकर कार्बन डाई ऑक्साइड बनाते है लेकिन कोल्ड फ्लेम में ऐसा नही होता।

कोल्ड फ्लेम में बड़े बड़े कण टूटते है जो फिर आपस में जुड़ जाते है इसलिए कोल्ड फ्लेम में बहुत कम मात्र में प्रकाश और कार्बन डाई ऑक्साइड निकलता है।

पृथ्वी पर सबसे घना धातु कौन सा है?

वैसे तो पृथ्वी पर हजारों प्रकार के विभिन्न धातु पाए जाते है जिसमे से कुछ बहुत कीमती एवं कुछ बेहद काम आने वाले होते है| पर अब तक खोजे जाने वाला पृथ्वी का सबसे घना धातु ऑस्मियम Osmium को माना गया है जो अपनी डेंसिटी के कारण सबसे अधिक घनत्व वाला माना जाता है|

क्या है ऑस्मियम?

अब तक सबसे वजनी माना जाने वाला यह धातु जिसकी केवल 2 फुट चौड़ी एवं लम्बी सिल्ली का कुल वजन एक व्यस्क हाथी के वजन के बराबर या इससे ज्यादा भी हो सकता है|

Osmium एक ग्रीक वर्ड Osme से लिया गया है, जिसका मतलब होता है खुशबु| Osmium की खोज एक ब्रिटिश केमिस्ट जिनका नाम था Smithson Tennant ने 1803 ई. में की थी|

यह सफेद ग्रे रंग का काफी कठोर धातु होता है जो हाई ताप पर भी नहीं पिघलता| इसकी महक बहुत तेज होती है इसलिए इसे यह नाम दिया गया है|

Osmium के कुछ रोचक तथ्य:

एटॉमिक Sign- Os

एटॉमिक नंबर- 76

एटॉमिक वजन- 190.23

बोइलिंग पॉइंट- 9.053.6 F

मेल्टिंग पॉइंट- 5491.4 F

ऑस्मियम को विभिन्न धातुओं के साथ मिलाकर चीजे बनाने जैसे इलेक्ट्रिकल समान, नीडल्स आदि के लिए उपयोग किया जाता है|  

प्राकृतिक आपदाएँ क्यों आती हैं?

बाढ़, सुनामी, चक्रवात, भूकम्प, हिमस्खलन, भूस्खलन, तूफ़ान, सुखा, ज्वालामुखी विस्फोट, बादल फटना आदि प्राकृतिक आपदाओं के उदाहरण हैं। क्षेत्रीय भिन्नता के  कारण आपदा में भी भिन्नता पायी जाती है अर्थात् धरती के भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदायें आती हैं। 

इसका कारण यही है कि मनुष्य द्वारा अनावश्यक रूप से प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की जाती है तथा प्राकृतिक संसाधनों का वृहत् रूप से उपयोग किया जाता है। इससे प्राकृतिक असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न होती है। प्रकृति के सन्तुलन को बिगाड़ने के नकारात्मक परिणाम में मनुष्य को गम्भीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। कई बार तो ये आपदायें जानलेवा भी सिद्ध होती हैं।

बढ़ता हुआ शहरीकरण व तकनीकी विकास के लिए पेड़ों की कटाई, सुरंगों का निर्माण करना, पहाड़ों को काटकर सड़क व पुल का निर्माण करना, जंगलों का दोहन आदि करके प्राकृतिक स्त्रोतों का धीरे-धीरे विनाश होता जा रहा है, प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ता जा रहा है और यही गतिविधियाँ प्राकृतिक आपदाओं को न्यौता देती हैं। मानव का स्वार्थ ही कहीं न कहीं प्राकृतिक आपदा का मुख्य आधार है और अपने स्वार्थ से स्वयं को ही गम्भीर हानिकारक स्थिति में डाल रहा है। प्राकृतिक आपदाओं से न केवल माल-धन की हानि होती है, अपितु जन हानि भी होती है।

मनुष्य द्वारा प्रकृति के नियमों की अनदेखी कर के प्रकृति से अधिक ताकतवर बनने की युक्तियाँ निकाली जाती हैं, परन्तु यह असम्भव प्रयास है और मनुष्य अपने इस प्रयास में कभी सफल नही हो पाता, क्योंकि जब प्रकृति अपना प्रकोप दिखाती है तो मानवकृत सभी युक्तियाँ महत्वहीन हो जाती है तथा सारे तकनीकी विकास असफल हो जाते हैं और अन्ततः मनुष्य प्रकृति के महाप्रकोप को झेलने के लिए मजबूर हो जाता है।

हमारे कानून में मनुष्य द्वारा अन्य मनुष्य के विरुद्ध अपराध कारित किये जाने पर दण्ड के प्रावधान दिए गए हैं, परन्तु उसी मनुष्य द्वारा जब सामूहिक रूप से प्रकृति के विरुद्ध कोई कार्य किया जाता है तो इस सम्बन्ध में कोई दण्ड का प्रावधान नही है, अतः प्रकृति द्वारा स्वयं ही मनुष्य को प्राकृतिक आपदा के रूप में दण्डित किया जाता है।

दुनिया के भिन्न-भिन्न इलाकों में किसी न किसी प्राकृतिक आपदा के कारण प्रतिवर्ष आर्थिक, भौगोलिक व जन हानि होती है, घर-शहर नष्ट हो जाते हैं, सभी व्यवस्थायें ठप हो जाती है और गम्भीर नुकसान का सामना करना पड़ता है। 

मनुष्य को समय रहते यह मान लेना चाहिए कि वह प्रकृति से ताकतवर नही बन सकता तथा प्रकृति से नियमों के विरुद्ध जाकर वह अपने दुःख का कारण स्वयं उत्पन्न करता है|

बर्ड फ्लू क्या है? What is Bird Flu

बर्ड फ्लू या इवियन इन्फ्लूएंजा एक प्रकार का वायरस है जो पक्षी एवं इंसानों को अपना शिकार बनाता है एवं मुख्य रूप से यह पक्षियों द्वारा इंसानों में फैलता है जिसके घातक परिणाम सामने आये है|

अभी तक बर्ड फ्लू से चिकन, टर्की, बतख, गूस, आदि में लक्ष्ण सामने आये जिसने इन्सान को भी अपना शिकार बनाया एवं कई लोग एवं पक्षी मारे गये|

इन्सान कैसे बनते है बर्ड फ्लू के शिकार?

ज्यादातर वो लोग जो इसे पक्षियों के सम्पर्क में रहते है, उन्हें पालते है या काटते है एवं यदि पक्षी इन्फेक्टेड है तो इन्सान में नाक, मुह, या आँखों के द्वारा आसानी से इन्फेक्शन फ़ैल सकता है|

बर्ड फ्लू लक्षण:

बुखार आना, उलटी एवं दस्त लगना, आँखों में सूजन एवं जलन होना, हमेशा नजला रहना, मांसपेशियों में दर्द रहना, सांस लेने में परेशानी, एनर्जी कमजोर होना, मसूडो में सूजन आना आदि बर्ड फ्लू के प्रभावी लक्षण है|

बचाव के उपाय:

इससे बचने के लिए आप उस स्थान पर जाने से परहेज करे जहा इसका अधिक प्रभाव है एवं इसे पक्षियों को भी न खाए|

इन्फेक्टेड मरीज के पास मुह एवं नाक ढककर जाए|

यदि आप मांसाहार के शौकीन है तो उसे अच्छे से पकाकर खाए|

इन्फ्लूएंजा टीके के बारे में अपने डॉक्टर से राय ले|

वैज्ञानिको ने ब्लैक होल की तस्वीरें कैसे ली?

ब्लैक होल को अब तक ब्रह्मांड में मौजूद सबसे रहस्यमय खोजों में से एक माना जाता रहा है| आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्लैक होल की सीधी तस्वीर लेना मुमकिन नहीं है क्योकि ब्लैक होल अपने पास किसी भी किरण, गामा किरन, प्रकाश, या प्रतिबिम्ब लेने वाली किसी भी रे को अपने अंदर खींच लेता है|

तो फिर अप्रैल 2019 को ब्लैक होल की जो तस्वीर विश्व भर में प्रसिद्ध हुई वो कैसे ली गई होगी इसी के बारे में हम आपको जानकारी देंगे|

क्या है ब्लैक होल?

ब्लैक होल हमारे सूरज से तकरीबन 650 करोड़ अधिक द्रव्यमान एवं 100 अरब किमी. दूर तक फैला हुआ एक ऐसा खड्डा है जो पृथ्वी से साड़े 5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है एवं यह अपने विस्तार में आने वाली किसी भी चीज जैसे तारे, उल्कापिंड, या मानवनिर्मित वस्तुओ को अंदर खीचं लेता है|

कैसे ली गई ब्लैक होल की तस्वीर?

ब्लैक होल की जो तस्वीर सामने आई है वह सीधी न लेकर आभासीय या वर्चुअल इमेज है जिसे ब्लैक होल के नजदीक उपस्थित घटना क्षितिज से मिले डाटा के द्वारा निर्मित किया गया है|

इस प्रक्रिया को VLBI या Very Long Baseline Infromatery भी कहा जाता है जिसमे विश्व में स्थापित 8 अत्यंत शक्तिशाली टेलिस्कोप द्वारा डाटा इकठा करके अर्जित किया गया|

इस विशाल टेलिस्कोप के संयोजन से अन्तरिक्ष में झांक पाना बेहतर हो गया एवं ब्लैक होल की आभासीय इमेज बनाई जा सकी|

ब्लैक होल की इमेज लेने के लिए 2017 से NASA द्वारा प्रयत्न किये जा रहे थे किन्तु नाकामयाब रहे पर अब 2019 में कामयाबी हासिल हुई|

खगोलविदों के लिए ब्लैक होल अभी भी एक पहली बना हुआ है एवं इसका तीव्र गुरुत्वाकर्षण बल एक दानव की भांति हर चीज को निगल जाता है| वैज्ञानिको का मानना है कि भविष्य में शायद इसकी रियल एवं मूल तस्वीर ली जा सकेगी|