कटे हुए सेब का रंग क्यों बदल जाता है?

जब सेब को काटा जाता है, तब बाहरी पर्यावरण में मजूद ऑक्सीजन सेब के ऊतकों के साथ प्रतिक्रिया करता है। यह अक्सीजन, क़लोरोप्लास्ट में मौजूद पोलीफेनोल ऑक्सिडेज़ एन्ज़ाइम्स के साथ प्रतिक्रिया कर, सेब उत्तकों में उत्पन्न होने वाले रंगहीन ओ-कीनोंस को भूरे रंग के एमिनो एसिड और प्रोटीन में बदल देता है।

इसमें भी, कुछ सेब बाकी सेबों से अधिक भूरे या अधिक जल्दी भूरे हो जाते हैं। इसका कारण भी यही केमिकल प्रक्रिया है। हालाँकि सभी सेबों के ऊतकों में ये पोलिफेनोल है, परन्तु सेब की कुछ किस्मों में दूसरों की बनिस्पत अधिक मात्रा में ये तत्त्व पाया जाता है। इसके अतिरिक्त, फल की उम्र, उसके पकने की प्रक्रिया, और वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन इत्यादि भी इस भूरे होने की प्रक्रिया में कई तरह के बदलाव ला सकते हैं।

औद्योगिक रूप से, कर्मचारी इस प्रक्रिया को काबू में लाने के लिए, या धीमा करने के लिए फल की किस्मों, और वातावरण की स्थितियों को पर विशेष ध्यान देते हैं। घरेलु तौर पर इस तरह का चुनाव शायद संभव न हो, और वातावरण की स्थितियां तो किसी भी तरह से काबू में लायी ही नहीं जा सकतीं। इसीलिए घर की रसोई में फल के पोलिफेनोल के ऑक्सीकरण के स्तर को कम करने या बाकी केमिकल्स की स्थितियों को काबू में करने पर ही ध्यान दिया जा सकता है।

जैसे, ताज़े कटे सेब को चीनी की चाशनी में डुबाने से ऑक्सीकरण की प्रक्रिया को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। नीम्बू या अन्नानास के रस जो की काफी मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भरे होते हैं भी इस काम आ सकते हैं। न केवल इनके रस का छिड़काव सेब को भूरा होने से बचा सकता है, बल्कि फल के स्वाद को भी काफी बढ़ा देता है।   ये रस फल के ऊतकों की सतह पर मौजूद पि एच को कम करते हैं, जिस से की सेब लंबे समय तक ताज़ा रह सकता है।

इसके अलावा पकने से भी इस प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है। सेब को काट कर यदि चार या पांच मिनट तक थोड़ी भाप में रखा जाये तो भी पोलिफेनोल कम हो जाता है, परन्तु इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए की इस से फल का स्वाद भी प्रभावित होता है।

सेब दरअसल अकेले ही ऐसा फल नहीं है, जो काटने पर भूरा हो जाता है, और न ही भूरा हो जाना किसी फल के ख़राब हो जाने का ही सूचक है। चाय  का खूबसूरत भूरा रंग भी इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है।

आदमी बीमार क्यों पड़ता है। Why we get sick in Hindi

सबसे साधारण शब्दों में बीमारी का अर्थ है शरीर में किसी भी तरह का छोटा या बड़ा असंतुलन। और यह असंतुलन अनेक कारणों से हो सकता है। प्राकृतिक रूप से हमारे शरीर की संरचना छोटे मोटे रोगों से लड़ने में सक्षम है, और सही आहार और कसरत से इस क्षमता को काफी हद तक और भी बढ़ाया जा सकता है। परन्तु कई रोग एसे भी हैं, जो इस क्षमता से बाहर हो ही जाते हैं।

ऐतिहासिक रूप से मानव ने बीमारियों को ईश्वर के कोप, और पापों के दंड के रूप में देखा है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के उद्भव से पहले, चिकित्सकों के पास जाने की बजाये पुजारियों और तांत्रिकों इत्यादि के पास जाया जाना एक बड़ी ही स्वाभाविक बात होती थी।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार रोग  संक्रामक और असंक्रामक, दो तरह के होते हैं। संक्रामक रोग जो की बाहरी जीवाणुओं जैसे की बैक्टीरिया, फंगस, परिजंतु या पैरासाइट्स और वायरस के कारण होते हैं। ये जीवाणु शरीर में वायु, भोजन या पीने के पानी के ज़रिये, या फिर खुले ज़ख्मों, इत्यादि के ज़रिये प्रविष्ट होते हैं और बीमारियां उत्पन्न करते हैं। शरीर की रोग प्रतिकारक क्षमता के अनुसार साधारणतया ऐसे छोटे मोटे रोगों से शुरुवाती स्तर पर ही बच कर, इन्हे और अधिक जटिल होने से रोका जा सकता है। परन्तु कई बार चिकित्सकीय परामर्श और सहायता भी लेनी पड़ सकती है।  साधारणतया ऐसे रोगों की जितना जल्दी हो सके जांच करा लेना ही सबसे अच्छा इलाज होता है।  संक्रामक रोग, समय के साथ बढ़ते और शक्तिशाली होते जाते हैं और इसिलए, बचाव ही सबसे सही  चिकित्सा मानी जाती है।

असंक्रामक रोग, जीवाणुओं से नहीं होते, ये ना ही फैलते हैं और न ही जीवाणु रोधक दवाओं से ठीक होते हैं। ये रोग, अधिकतर जीवन शैली और बाहरी कारणों से होते हैं। त्वचा का कैंसर, उदाहरण के तौर पर, जीवाणुओ से नहीं, अपितु बहुत अधिक समय तक सूर्य की रौशनी में होने की वजह से हो सकता है। ह्रदय के रोग, और दौरे भी जीवाणुओं से नहीं अपितु लम्बे समय तक असंतुलित जीवन शैली के कारण होते हैं।

इसके अतिरिक्त, अनुवांशिक कारण भी कई रोगों का एक बड़ा महत्वपूर्ण हैं। ह्रदय का रोग भी, न केवल गलत जीवनचर्या अपितु माता या पिता के द्वारा आने वाली पीढ़ियों की जीन में प्रवेश कर सकता है, और कई बार बहुत समय के बाद, जीवन के काफी आगे के पड़ावों पर सामने आता है।

हम बूढ़े क्यों हो जाते हैं। Why do we get old in Hindi

बुढ़ापा

वैज्ञानिक बहुत समय से बुढ़ापे के साथ आने वाली समस्याओं के निवारण के साथ साथ, खुद बुढ़ापे के कारणों पर भी शोध कर रहे हैं। अलग अलग शोधकर्ता बुढ़ापे के अलग अलग कारणों की बात करते हैं। कुछ का मानना है के हमारी सूक्ष्मकोशिकाएं समय के साथ इस्तेमाल के कारण पुरानी और जर्जर हो जाती हैं, और हमारे शरीर के कार्यकलापों के निर्वहन नहीं कर पातीं, और कुछ का मानना है के किसी भी मशीन की तरह पूरा शरीर ही इस प्रक्रिया के साथ पुराना होकर हमारे जीवन का बोझ ही नहीं उठा पता और केवल कुछ हद तक ही इस का इलाज संभव हो पाता है। और इसके अतिरिक्त भी, कई ऐसे वैज्ञानिक भी हैं जो मानते हैं के हमारी कोशिकाएं सही चिकित्सा और “मरम्मत” के सहारे हज़ारों वर्षों तक भी जीवित रह सकती हैं, परन्तु आधुनिक चिकित्सा विज्ञान दुर्भाग्यवश अभी उतना विकसित नहीं हुआ है। यानि यदि हमारा चिकित्सा विज्ञान इतना विकसित होता, तो शायद हम कई सौ वर्षों तक युवा रह सकते थे।

सन 1882 में जीवशास्त्र के वैज्ञानिक ऑगस्ट वाइसमैन के द्वारा प्रदत्त ‘सेल डैमेज थ्योरी’ के अनुसार शरीर टूट फूट या ‘वियर एंड टेअर’ का शिकार हो जाता है। जैसे किसी कार का इंजन या कपड़ा बनाने वाली मशीन इस्तेमाल के साथ पुरानी और बेकार हो जाती है, उसी तरह हमारा शरीर भी वर्षों के इस्तेमाल और सही रख-रखाव के आभाव में जल्दी बूढा हो जाता है। लेकिन यदि अच्छा रख-रखाव मिल भी जाये तो बुढ़ापे को दूर ही रखा जा सकता है, पूरी तरह से ख़त्म नहीं किया जा सकता।

कुछ नई खोजों के अनुसार मिटोकॉण्ड्रिआ में मौजूद डीएनए समय के साथ बदल जाते हैं, और इसी बदलाव को भी बुढ़ापे का मुख्य कारण माना जा रहा है। इसी खोज को आधार बना कर कुछ वैज्ञानिक मानते हैं की कैलोरी का कम उपभोग बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है, क्यूंकि अधिक वसा या फैट के कारण मिटोकॉण्ड्रिआ अधिक काम करती हैं और नतीजतन जल्दी बूढ़ी भी हो जाती हैं। पर ये सभी शोध अभी तक तो केवल वाद विवाद ही हैं, और सबसे सहज प्रक्रिया केवल सही भोजन, जीवनचर्या, सही कसरत और काम का संतुलन ही हैं।

दरअसल आधुनिक जीवन शैली ही जल्दी बुढ़ापे का सबसे सीधा कारण हो सकती है। शारीरिक मेहनत और अनियमित भोजन इत्यादि बुढ़ापे को बढ़ावा देने के साथ शरीर की रोग प्रतिकारक क्षमता को भी नुक्सान पहुंचाते हैं। और एक सोची समझी सन्तुलिक जीवन शैली काफी हद तक बुढ़ापे और उस से जुडी अनेकों समस्याओं का एक सरल उपाय हो सकती हैं

मच्छर खून क्यों पीते हैं। Why mosquito drink blood in Hindi

प्रकृति के हर आयाम की तरह मच्छर भी हमारे पर्यावरण के संतुलन और उसकी संरचना के लिए अत्यावश्यक हैं। पर इतिहास की शुरुआत से ही, मच्छर किसी न किसी रूप में मानव जाती को परेशान करते ही रहे हैं। हम सभी, कभी न कभी मछरों का शिकार ज़रूर हुए हैं। कभी वह तीखी और बेहद परेशान कर देने वाली “घूं घूं” की आवाज़ और कभी अँधेरे में उनके डंकों की यातना। मच्छर प्रकृति की उच्छृंखलता और उद्दंडता के प्रतीक से महसूस होते हैं। और हम भी उन्हें अपना शत्रु मान कर उनके विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए हैं। परन्तु ये ढीठ जंतु किसी न किसी तरह हर बार वापिस आ ही जाते हैं।

केवल मादा मच्छर ही खून पीती हैं। खून में मौजूद प्रोटीन उनके अण्डों की रचना के लिए नितांत आवश्यक होने के साथ बेहद दुर्लभ भी है। अपनी प्रजाति के जारी रहने और उसकी सुरक्षा और बढ़ोत्तरी की ज़िम्मेदारी मादा की ही होती है और प्रजनन क्रिया इस ज़िम्मेदारी का सबसे अहम् अंग है। प्राकृतिक रूप से ये अंडे देना मादा की सहज वृत्ति का अभिन्न भाग होता है। हालाँकि अपना पेट भरने के लिए मादा के लिए फूलों का पराग, या रस, काफी होते हैं और नर मच्छर की तरह वो भी इसी पर निर्भर भी रहती है। परन्तु अण्डों के लिए ज़रूरी ये प्रोटीन कहीं भी और उपलब्ध न होने की वजह से, मादा के पास केवल खून ही एक विकल्प रह जाता है।

एक बार में एक मादा मच्च्छर लगभग तीन मिलीग्राम तक खून पीती है। हालाँकि इतनी छोटी मात्रा हमारे लिए बिल्कुल नगण्य होनी चाहिए, परन्तु डंक के साथ होने वाली तीखी वेदना दरअसल हमारी परेशानी का मुख्या कारण होती है। और हो भी क्यों न ? ये वेदना, या लाल निशान और खुजली वगैरह, चुकी मच्छर खून पिने से पहले वे हमारे अन्दर अपने Sliva (थूक) डालते हैं ताकि जब तक वे खून पि रहे हों वहां की खून जमे ना। और इसी कारण हमे खुजली होती है।

मच्छर के डंक में कीटाणु और वायरस भी मौजूद रहते हैं और ये कीटाणु कभी कभी हमे बहुत बीमार कर देने के लिए काफी होते हैं। और इसीलिए जहां तक हो सके मच्छरों के डंक से बच कर रहने में ही भलाई है।

साथ ही हमे ये भी याद रखना चाहिए, के हमारा शरीर लाखो वर्षों के क्रमिक विकास के बाद, बहुत सारे छोटे मोटे रोगों के प्रति काफी मज़बूत बन चुका है, और हर बार मच्छर का डंक हमारे लिए इतना घातक हो ये कतई ज़रूरी नहीं है।

हमें सपने क्यों आते हैं। Why do we dream in Hindi

यह सवाल कितना जटिल है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकतें है की, सपनों के अध्यन के लिए शोध्कर्ताओं की एक अलग शाखा होती है जिसे “ओनैरोलोज़ी” कहतें है । सपनों को समझ पाना वाकई काफी मुश्किल होता है, किसी सामान्य जन के लिए भी और एक वैज्ञानिक के लिए भी। किसी भी प्रयोग में जब लोंगो से पूछा जाता है की आपने सपने में क्या देखा तो जबाव हमेशा अविश्वसनीय होता है।वास्तव में औसतन कोई भी इंसान उठने के १० मिनट बाद अपने सपने के ९० प्रतिशत को भूल चूका होता है।

इसलिए जब आप जागतें है तो आपको कुछ झलक मात्र याद रहतीं है, और आप याद करने का प्रयत्न करतें है कि आखिर आपने सपने में क्या देखा ।

जब आप सोते हैं तो आपकी केवल दो अवस्था हो सकती है-

१- तीव्र नेत्र संचलन

२- गैरतीव्र नेत्र संचलन

अगर आप किसी सोते हुए व्यक्ति के दिमाग कि विद्युतीय गतिविधि को देखो तो आप विचित्र चीजों का अनुभव करेंगे । शोधकर्ताओं ने यह पता लगया कि जब आप जागे हुए होते हो तब आपके दिमाग में जो हलचल होती है वैसी ही हलचल तब होती है जब आप तीव्र नेत्र संचलन की अवस्था में सोये हुए सपने देख रहें होतें है।इसका मतलब तीव्र नेत्र संचलन कि अवस्था में आपका मस्तिष्क अच्छी- खासी ऊर्जा का इस्तेमाल कर लेता है, जबकि हम कहतें है कि मस्तिष्क को आराम दे रहें है। परन्तु सोते समय कुछ ऐसे रसायन जैसे – हिस्टामिन,सेरोटोनिन नहीं निकलते जिस कारण जब आप सपना देखतें है तो अलग-अलग भावनाओं को महसूस कर पातें है पर आपकी शरीर नहीं हिलता है। लेकिन कुछ लोगों में कभी-कभी इन रसायनों का संतुलन बिगड़ जाता है और उनका शरीर हिलने लगता है, कुछ लोग तो नींद में चलते भी है जिसे हम स्वप्नाटन कहतें है तथा शोध में यह पता चला है कि हम तीव्र नेत्र संचलन की अवस्था में सपने देखतें।

अतः आप दिन के समय में जो भी करतें है या देखतें वो आपके मस्तिष्क में याददस्त कि तरह संचित हो जाता है, आपका अचेत मस्तिष्क सोने के समय में उन यादों को जाँच कर व्यवस्थित करता है , और उनके बीच में जो सम्बन्ध होतें है उनको मजबूत करता है तथा आपकी बेकार यादों को मिटा देता है ताकि हम अगले दिन उस याददास्त को और भी सही तरीके से इस्तेमाल कर सकें। जब ये सारी घटनाएं चल रहीं होती है तो आपका सचेत मस्तिष्क समझ नहीं पाता कि क्या हो रहा है? और जब यादें व्यवस्थित हो रही होती है तो आपको कुछ यादृच्छिक [अव्यवस्थित] छवियां दिखाई देतीं है और आपका सचेत दिमाग इन यादों से एक अर्थ निकलने कि कोशिश करता है, और इस तरह हम सपने देखतें है ।

हमें जम्हाई क्यों आती है। Why do we yawn in Hindi

लगभग-लगभग हर जीव को जम्हाई आती है । पेंगुइन्स इसे संभोगन के दौरान तो सांप हर भोजन के बाद अपने जबड़े को सही करने के लिए तो वही गिनी पिग अपने गुस्से को दिखाने के लिए जम्हाई लेते है । तो आखिर मनुष्य किस कारण से जम्हाई लेते है ?

हम मानते हैं की जब कोई व्यक्ति थक जाता तो उसे उबासी आती है परन्तु वैज्ञानिक दृश्टिकोण से देखें तो, जम्हाई आपके दिमाग को शारीरिक रूप से ठंडा रखने के लिए आती है, लगभग -लगभग कंप्यूटर के जैसे हमारे दिमाग को भी सही से काम करने के लिए एक सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है और यह अधिक तापमान को टालने की कोशिश करता रहता है ।और यह पता चला है की जम्हाई आपके हृदय गति को बढ़ाती, खून की दौड़ान तेज करती है और बहुत कुछ जो आपके दिमाग को ठंडा रखने के लिए आवश्यक होता है ।इस सबसे बढ़कर गहरी श्वास लेने से ठंडी हवा आपके मस्तिष्क में खून के तापमान को कम करती है ।

साथ ही जब आपके शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है तब जम्हाई आती है, जिसमे हम एक साथ धीरे-धीरे काफी मात्रा में ऑक्सीज़न अंदर खेंचते है और धीरे-धीरे साँस बाहर छोड़ते जिससे हमारे शरीर में ऑक्सीजन की पूर्ति हो जाती है और हम अच्छा और तरोताजा महसूस करतें है ।

पर यहां एक और सवाल भी है की, ऐसा क्यों होता है? की हम जब किसी को जम्हाई लेते देखतें है तो हमें भी जम्हाई आ जाती है ।

मनुष्य,प्राइमेट {स्‍तनपायी प्राणियों में सर्वोच्‍च श्रेणी के जीव} यहाँ तक की कुत्तों में भी जम्हाई संक्रमण पाया जाता है, ये लगभग सहानभूति जैसा होता है । यह जम्हाई संक्रमण बच्चों में लगभग ५ से १० की उम्र से शुरू होता है। यह वह उम्र होती है जहां बच्चे एक दूसरे की भावनाओं को समझना शुरू कर देतें है, तो जब वह किसी को जम्हाई लेते देखतें है तो उन्हें भी जम्हाई आ जाती है । परन्तु यह कुछ लोगों के साथ नहीं होता ।

ऐसे लोग जो आत्मकेंद्रित होतें है उन पर सामान्य लोगों की अपेक्षा जम्हाई संक्रमण विकार का असर कम होता है । अतः अगर आपको कम जम्हाई आती है तो आप उन कुछ लोगों में से हैं जो खुद से मतलब रखना पसंद करतें है ।

इसलिए यदि आपको जम्हाई आती है तो ये अच्छी बात है। पर अगर आपको बार- जम्हाई आ रही है तो यह आपके शरीर की तरफ से एक चेतावनी हो सकती है ।

छिपकली दीवार पर कैसे चलती है। How lizard climb on wall in Hindi

chipkali

आप सब ने अपने आस-पास दीवालों पर छिपकली को चिपके और चलते हुए देखा होगा। पर क्या आपको पता है की आखिर ये कैसे संभव होता है ? की छिपकली बिना किसी समस्या के कितनी भी चिकनी सतह पर आसानी से चलती रहती है । इस ब्लॉग में मै आपके साथ छिपकली के इस गुण के पीछे का विज्ञान साझा करूँगा ।

शुरुआत में लोगों का मानना था की छिपकली के पंजो में एक अजीब लिसलिसा पदार्थ पाया जाता है जिससे यह आसानी से चिकनी सतह और दीवाल पर चल पाती है, पर समय के साथ यह तथ्य झूठ साबित हुआ।

कुछ समय पश्चात एक नई अवधारणा आयी, वह थी – की छिपकली के पंजो एवं दीवाल के मध्य निर्वात जैसा माध्यम बन जाता है जो इनको चिपके रहने और आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलने में मदद करता है पर यह अवधारणा भी गलत प्रमाणित हुई ।उसके बाद जंतु वैज्ञानिकों द्वारा कई शोध किये गए, जिनमे उन्हें कई ऐसी भी जातियां मिली जिनमे पंजों के मध्य कोई निर्वात नहीं बन रहा था मगर वह आसानी से चिकनी सतहों पर चल पा रही थी । तो जंतु वैज्ञानिकों ने पुनः शोध करना शुरू कर दिया, दुनिया में छिपकली की लगभग छह हजार प्रजितयां पायी जातीं है,जिनमे अधिकतम में शोध करने के उपरांत जो निष्कर्ष निकला वह बेहद ही चौंकाने वाला था।

शोधकर्ताओं ने बताया की छिपकली के पंजों में बाल के जैसे अंदाजन दो लाख से अधिक अति छोटे सेल्फ जैसी रचनाएँ पायी जाती है, बात यहीं ख़त्म नहीं होती, ये जो महीन संरचनाएं होती है वह स्वयं २००० से अधिक भागों में विभक्त होतीं है| क्यूंकि यह अत्यंत महीन होती है इसलिए छिपकली कितनी भी चिकनी सतह पर आसानी से चल पातीं है। इस तरह छिपकली किसी भी प्रकार की सतह पर अपनी पकड़ अत्यंत मजबूत बना पाती है और बिना गिरे चल पाती है ।